Tuesday, July 13, 2021

हिम्मत



"विपुल बस थोड़ी हिम्मत और करले मेरे भाई...!हाँ बस फिर हम लोग भी आजाद पंछी की तरह अपनी ज़िंदगी जिएंगे..!"रमन और मंगल बोले।

"मैं बहुत थक गया हूँ मंगल.. अब नहीं दौड़ा जाता। तुम दोनों भाग जाओ ट्रेन का समय हो गया..!"इन तीनों में विपुल सबके छोटा और कमजोर था।

"ऐसे कैसे छोड़ दें..? मंगल कुछ दूर मैं पीठ पर लेता हूँ, कुछ दूर तुम.. क्यों ठीक है..?"पिछले तीन बरसों से दुख सहते और भीख माँगने को मजबूर रमन ने आज हिम्मत करके भीख मँगवाने वाले कालू भंडारी का सुरक्षा घेरा भेदकर अपने साथ मंगल और विपुल के साथ भाग खड़ा हुआ।

"उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।वो देख दो-तीन बसें रुकी हुई हैं।लगता है सब कहीं तीर्थयात्रा पर जा रहा है।जय शिव शंभू जयकारे? लगता है किसी शिव मंदिर दर्शन के लिए? जब तक यह लोग नाश्ता करते हैं हम सब बस की छत पर छुप जाते हैं।अगले स्टॉप पर सोचेंगे क्या करना है।

"ठीक मंगल..चल विपुल..!"तीर्थयात्री कुछ देर के लिए रुके और अपने खाने के लिए फल आदि लेकर फिर आगे बढ़ गए। तीनों इस मौके का फायदा उठाकर बस के छत पर चढ़कर लेट गए।

बारिश का मौसम था इसलिए बस के ऊपर सामान नहीं था और ना ही तन जलाने वाली धूप, जैसे ही ठंडी हवा लगी विपुल सो गया।

"सो गया बेचारा.. मंगल तुझे तो तेरे शहर का नाम पता है,हम लोग कहाँ जाएंगे..?"रमन ने पूछा।

"रमन एक बार शहर पहुँच जाएं फिर सोचते हैं..!"बारह साल के थे मंगल और रमन दस साल का,विपुल छोटा पाँच साल का नाज़ुक सा बच्चा था।

"मंगल हम तीनों तो भाग लिए, अब बाकी लोगों का क्या होगा..?"

"उन्होंने इस तकलीफ़ को स्वीकार कर लिया है रमन।अब शायद हमारे भागने के बाद,उनको भी थोड़ी हिम्मत आ जाए..!"शाम गहराने लगी थी।रमन भी सो गया था।बस चलती चली जा रही थी।ऐसी ही एक बस यात्रा में छः महीने पहले मंगल अपने परिजनों से बिछड़ गया था।

"क्या हुआ बेटा..?आप रो क्यों रहे हो? आपके घरवालें कहाँ हैं...?भीखू ने प्यार से सिर सहलाते हुए पूछा।

"वो लोग चले गए..!"मंगल रोते हुए बोला।

"चले गए..कहाँ..?"भीखू ने पूछा।

"हम सब यहाँ घूमने आए थे। मैं पापा के साथ बस में जाकर बैठ गया।माँ उस दुकान से कुछ खाने-पीने का सामान लेने लगी।तभी मैंने देखा माँ की बस में चढ़ते समय यह पायल गिर गई। पापा को बताया तो वो पापा फोन पर बात करने में व्यस्त थे।बस मैं पायल उठाने के लिए उतरा और बस चल दी,और..!" मंगल फिर से रोने लगा।

"ना बेटा रोते नहीं हैं।कितनी देर हो गई उन्हें गए..?" भीखू ने पूछा।

"थोड़ी देर पहले ही बस गई है।दुकान वाले अंकल बोले यही बैठो शायद ढूँढते हुए वापस आ जाएं..?"मंगल ने रोते हुए कहा।

"कहाँ से आए हो..?"

"वाराणसी.. शंकर भगवान के मंदिर हमारे घर से थोड़ी दूर पर ही है।पापा का नाम शंकरलाल मिश्रा वहीं मंदिर के पास पूजा सामग्री की दुकान लगाते हैं..!"मंगल ने बताया।

"अरे फिर तो मैं उन्हें जानता हूँ..!"

"सच्ची अंकल..?"

"हाँ बेटा.. मैं हर महीने महादेव के दर्शन को वाराणसी जाता हूँ। मैं परसों फिर जाने वाला हूँ,मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें सही-सलामत उनके पास पहुँचा दूँगा..!"भीखू की मीठी-मीठी बातों में मंगल फंसता चला गया।

"सच्ची अंकल..?आप मुझे ले जाओगे..?"मंगल खुश हो गया।
"हाँ सच्ची..आओ गाड़ी में बैठो..!"मंगल को साथ में लेकर भीखू अपने अड्डे पर चला आया।

"अंकल यह कैसी जगह है..?"मंगल वहाँ पर कुछ गंदे मिट्टी में सने बच्चे और कुछ विकलांग बच्चों को देखते ही समझ गया कि वो बच्चे चोरी करने वाले गिरोह के हाथ लग गया। जिनके बारे में उसके चाचा बताते रहते थे।

"अब तुझे यहीं रहना है समझे..?रमनवा इसे यहाँ के बारे में सब समझा देना,समझे..?"

"जी उस्ताद आप बेफिक्र होकर जाइए..!"रमन दस साल का लेकिन बहुत चालाक था।भीखू का बेहद खास था।भीखू चला गया तो रमन कुछ मैले-कुचैले कपड़े ले आया ।

"लो पहन लो जो बने..!"

"छी मैं नहीं पहनता यह गंदे कपड़े..!मेरे चाचा जी पुलिस में हैं।देखना वो और मेरे पापा कितनी जल्दी मुझे ढूँढते हुए आ जाएंगे..! मंगल ने कहा।

"ओय..ज्यादा चूँ चा मत करिओ यहाँ कोई न आने वाला।पहन ले शांति से नहीं तो उस टीम में शामिल हो जाएगा।वो सब तेरे जैसे ही थे।अब देखो, बेचारे कैसे हो गए..!"रमन ने विकलांग बच्चों की ओर इशारा करते हुए कहा।

"नहीं..!"मंगल ने डरकर गंदे कपड़े पहन लिए।

"ले यह कालिख अच्छी तरह पूरे शरीर में मलकर अब  मेकअप भी करलो।आज से तेरी ट्रेनिंग शुरू..!"यह कहकर रमन चला गया और कुछ देर बाद विपुल को लेकर लोटा।

"अरे तू अभी तक बैठा है..?"रमन ने कहा।

"यह भी भीख माँगता है..?"नन्हें विपुल को देखकर मंगल को बहुत खराब लगा।

"भीखू का कहा तो मानना ही पड़ेगा भाई, वरना वो तेरा यह हाल कर देगा..?"रमन ने विकलांग बच्चों की ओर इशारा किया।अपने हाथ से मंगल के शरीर में कालिख मल दी।बस उसी दिन से मंगल उन दोनों के साथ भीख माँगता और जो कुछ मिलता शाम को भीखू को सौंप देता।

एक दिन "रमन तुझे अपने मम्मी-पापा की याद नहीं आती ?तू यहाँ कैसे आया..?"

"आती है ना बहुत याद आती है।वो लोग मुझे रोज शाम को गार्डन में खेलने ले जाते थे।एक दिन उनके साथ ही गार्डन में खेल रहा था। मैं बॉल उठाने झाड़ियों के पीछे गया और वहाँ किसी ने मेरा मुँह दबोचकर गाड़ी में डाल दिया।मम्मी पापा के जब तक पता चला होगा तब तक तो मैं बहुत दूर यहाँ चला आया..!"रमन की आँखें छलक पड़ी‌।

"तेरा घर कहाँ है..?"मंगल ने पूछा।

"पता नहीं..? मैं जब यहाँ आया तब विपुल जितना बड़ा था।बस यह याद है कि मेरे घर के सामने हनुमान जी की बहुत बड़ी मूर्ति दिखाई देती थी..!"रमन बोला।

"ओह.. तुमने यहाँ से भागने की कोशिश नहीं की..?"

"ओय पागल है क्या.? ऐसा सोचना भी नहीं।अँधे, लूले लंगड़े होने से ऐसे ही सही..!"रमन बोला।

"यह विपुल कब से यहाँ..?

"दो साल का था जब यहाँ आया। मैंने नाम रखा है इसका,अच्छा है ना..?"रमन ने विपुल का सिर सहलाते हुए कहा।

"मैंने फ़ैसला कर लिया है..!"मंगल बोला।

"कैसा फैसला..?"

"मैं एक दिन भीख माँगते समय मौका देखकर यहाँ से भाग जाऊँगा। मैं अक्सर रेलवे स्टेशन पर भीख माँगता  हूँ। गाड़ियों के आने-जाने का समय पता कर लिया है।एक दिन किसी गाड़ी के शौचालय में छिप जाऊँगा और दो-तीन स्टेशन निकलने पर उतर के वाराणसी कौन-सी गाड़ी जाती है।यह पता करके वाराणसी अपने घर चला जाऊँगा..!"मंगल के चेहरे पर उमंग भरी चमक दिखाई दे रही थी।

"वाह बड़ा दिमाग चलता है तेरा..?खैर छोड़ो अभी चलो वापस अड्डे पर,तुझे घर पता है।भागने मिल गया तो घर चला जाएगा।हम दोनों को तो मजबूरी में यहीं रहना है..!"रमन बोला।

"नहीं रमन मौका मिला तो तीनों साथ जाएंगे। मेरे चाचा तेरे मम्मी-पापा को ढूँढ लेंगे।हम विपुल को भी साथ ले जाएंगे।तू बस मेरा साथ दे देना..!"

भीखू रोज सबके भीख माँगने की जगह बदल देता था।आज तीन दिन बाद स्टेशन के पास बने मंदिर में भीख माँगने का मौका मिला तो मंगल इसे गँवाना नहीं चाहता था।भागते समय मंदिर की सीढियों पर विपुल गिर गया और उसे चलने में तकलीफ़ होने लगी।

उस दिन मंगल की किस्मत साथ दे रही थी। तीर्थयात्रा की बस देखते ही वो रमन के साथ विपुल को लेकर बस की छत पर चढ़कर लेट गया। मंगल अपने कल के बारे में  सोच रहा था कि नीचे अचानक से जयकारे गूँजने लगे।

"हर-हर महादेव,जय शिव शंभू" रमन भी शोर सुनकर उठ गया।"क्या हुआ मंगल..?"

"रमन यह बस अब यहीं से वापस जाएगी।चल उतर जल्दी। विपुल उठ..!"तीनों फटाफट बस से नीचे उतर गए।सावन का महीना था हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी शुरू हो गई थी।

"अंकल कुछ खाने को दो ना ...?बहुत भूख लगी है। विपुल एक यात्री से खाना माँगने लगा।

"विपुल नहीं..माफ करना अंकल.. इसने बहुत देर से कुछ खाया नहीं इसलिए बस..!"मंगल उसे और रमन को लेकर भीगने से बचने के लिए एक दुकान के शेड के नीचे खड़ा हो गया।

"मंगल यह कौन-सी जगह है..?"

"जरा बारिश रुकने दे फिर देखता हूँ।अँधेरा है पर फिर भी सब मुझे पहचाना सा लग रहा है .!" अचानक मंगल बस से उतरे यात्री से पूछता है।

"अंकल हम लोग वाराणसी पहुँच गए..?"मंगल ने हवा में तीर छोड़ा।सीधे जगह का नाम पूँछकर वो फिर से किसी के चंगुल में नहीं फंसना चाहता था।

"हाँ पहुँच गए..हम बस स्टैंड पर हैं अभी। उसने मंगल को बिना देखे जवाब दिया।

"रमन हम वाराणसी पहुँच गए।वाराणसी मेरे घर..!अब मैं बारिश रुकने का इंतजार नहीं कर सकता।चलो हम पैदल घर के लिए चलते हैं आओ मेरे साथ..!"मंगल को बारिश में भीगना मंजूर था पर रुकने का इंतजार करना मुश्किल हो रहा था।

तीनों उत्साह से भरे बारिश में भीगते हुए चल दिए। वैसे ही जैसे पंछी पिंजरे से निकलकर आजाद पंछी मस्तमौला बनकर नभ में बिचरने लगता है।शिव जी के जयकारे जोर से सुनाई देने लगे थे। मंगल ऐसे आश्चर्य जनक तरीके से वाराणसी पहुँचा जैसे भोलेनाथ अपनी नगरी के नन्हे बालक को लेने खुद पुरानी दिल्ली गए थे।

"रमन मेरे पापा की दुकान..!!वो देख!! मंगल ने दोनों का हाथ पकड़ा और दौड़ पड़ा।

"पापा..!!!!"

"शंकरलाल चौंककर दुकान से निकलकर मंगल को देखने लगे।कालिख लगा शरीर फटे कपड़े देख एक बार को धोखा खा गए शंकरलाल।

"पापा..!" मंगल उनसे लिपट गया।

"मंगल मेरे बच्चे..तू कहाँ चला गया था मेरे लाल।यह? यह तेरी यह हालत..?महादेव तुम्हारी लीला अपरम्पार है। मंगल यह दोनों कौन हैं..?"

"पापा बाद में, अभी बहुत भूख लगी है। सुबह से हमने कुछ नहीं खाया..!"

"हे भगवान.. क्या हालत हो गई मेरे बच्चे की..!लो यह खाओ तीनों बैठकर..!" शंकरलाल ने तुरंत दोने लेकर प्रसाद के पेडे बच्चों को दिए और पानी की बोतल निकाली।

"दूबे जी.. शंकरलाल ने पड़ोसी दुकान वाले को आवाज लगाई।

"बोलो शंकरलाल.. क्या काम आने पड़ा। और यह क्या अब भिखारियों की आवभगत करने लगे..?"तीनों बच्चों को देखकर दूबे जी बोले।

"दूबे जी यह मंगल है और दो उसके साथी, शंभूनाथ की कृपा से मंगल हमें वापस मिल गया।जरा प्रभात को फोन करके पांच साल,दस साल, और मंगल के लिए एक एक जोड़ी कपड़े मँगा दो जल्दी फिर भोलेनाथ को जाकर माथा टेके..!"

"मंगल..? दूबे जी ने गौर से मंगल को देखा।हे शिव शंभू क्या हालत हो गई इस बच्चे की..?हम अभी फोन करके कपड़े मँगाते है..!"दूबे जी अपने बेटे को फोन लगाते हुए दुकान में चले गए।

"पार्वती हमारा बेटा मिल गया..!"शंकरलाल की खुशी संभाले नहीं संभल रही थी।

"क्या..? सच्ची कह रहे हो जी..?कहाँ है मंगल?कहाँ है वो..?"

"दुकनिया पर अपनी..!"

"हम अभी आवत है उसके चाचा के संग..! पार्वती भी दुकान पर आ गई थी।

"मम्मी..!"मंगल माँ से लिपट गया।

"ओ मोरी मैया..यह क्या हुआ? कितना कमजोर हो गया है मेरा बच्चा। हाड़ दिखाई देने लगे। दुष्टों ने क्या हालत कर दी मेरे राजदुलारे बेटे की..! पार्वती रोते हुए मंगल को बार-बार सीने से लिपटाए जा रही थी।

शंकरलाल ने प्रभात से कपड़े लेकर "पार्वती संभाल अपने को, अभी बच्चे बहुत थके हुए हैं। पहले नहला धुलाकर साफ कपड़ा पहना दे, फिर चल बोले बाबा के दर्शन कर लें..!"

"चलो तीनों मेरे साथ..!"पार्वती बच्चों को साथ लेकर घर चली गई।

भईया अपने मंगल का हाल देखकर लगता है किसी भिखारी गैंग के हाथ लग गया था..?"मंगल के चाचा शिवानंद ने कहा।

"हाँ लगता तो यही है।अभी बच्चों से कुछ भी पूछना ठीक नहीं? उनको भोलेनाथ के दर्शन कराकर सुला देते हैं।कल देखते हैं क्या करना है..? शंकरलाल ने कहा।

दर्शन करने के बाद पार्वती ने रमन और विपुल को भी मंगल के कमरे में ही सोने के लिए भेज दिया।

"धन्यवाद मंगल तेरी हिम्मत के कारण,भले ही यह तेरा घर है।पर हम आज फिर से घर में होने का सुख उठा रहे हैं..!"रमन ने कहा।

"चल अब भूल जा पुरानी बातें रमन..शिव जी की कृपा से तुझे भी तेरा घर मिल जाएगा।आ विपुल हम सब साथ में सोएंगे..! मंगल ने सबको अपने बैड पर लिटा लिया।

"मंगल अगर मेरे और विपुल के मम्मी-पापा का पता नहीं चला तो फिर हम लोग कहाँ जाएंगे..? क्या फिर से हमें.. मंगल बीच में बोल पड़ा।

"नहीं रमन ऐसा हरगिज नहीं होगा।घर नहीं मिलेगा तो  तुम दोनों मेरे पास रहोगे। मैं पापा से बात कर लूँगा,वो मना नहीं करेंगे..!"तीनों बात करते-करते सो गए।

"सूखकर काँटा हो गया मेरा बेटा। विपुल तो कितना प्यारा और मासूम है। जरूर किसी बड़े घर का बच्चा होगा..?"पार्वती बोली।

"हम्म लगता तो है भाभी।अब बड़े घर का हो या छोटे घर का, उनके पेरेंट्स के बारे में जानकारी निकालनी होगी..!"

"सही कहा देवर जी..अब आप भी सो जाइए..!"

"हम्म गुड नाईट..!"शिवानंद सोने चला गया। दूसरे दिन से रमन के बताए अनुसार शिवानंद बड़ी हनुमान जी की मूर्ति कहाँ-कहाँ है, पता लगाने लगा।

"भैय्या एक बड़ी तो दिल्ली में ही है।रमन के अनुसार वो उस समय विपुल जितना बड़ा यानि चार-पाँच साल का रहा होगा। मैं कल दिल्ली जा रहा हूँ।वहाँ पता करता हूँ चार पाँच या उससे एक साल पहले कितने बच्चे गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई है..?"

"ठीक है शिवानंद..!"शिवानंद को जल्दी ही इस मामले में कामयाबी हासिल हो गई। कुछ बच्चे उस टाइम पीरियड में गायब हुए थे।उसमें एक बच्चे की तस्वीर हूँबहूँ रमन से मिलती थी। पता करने पर पता चला कि वो लोग उसके बाद आगरा शिफ्ट हो गए। उनसे जब पूछा गया कि उनका बच्चा कैसे गायब हुआ तो उन्होंने वही स्टोरी बताई जो रमन ने बताई थी।
पुलिस ने फिर भी डीएनए टेस्ट करवाया। टेस्ट मैच होने रमन को उसके माँ बाप को सौंप दिया।

"मंगल मुझे भूल तो नहीं जाओगे..?रमन मंगल के गले लगते हुए बोला।

"नहीं कभी नहीं,यह लो मेरा फ़ोन नम्बर,हम रोज बात किया करेंगे!"मंगल ने अपना फोन नंबर दे दिया।

"बेटा जैसा तुम्हारा नाम है मंगल,वैसा ही तुमने हमारे जीवन में सब मंगल कर दिया। चलो चिंटू..?"रमन की माँ ने पूछा।

"चिंटू..?"मंगल ने आश्चर्य से पूछा।

"मम्मी मुझे प्यार से चिंटू ही बुलातीं थी। मैं इतने दिनों में अपना यह नाम भूल ही गया था..!"रमन जाने लगा तो विपुल रोकर लिपट गया। तीन बरसों से रमन ही उसका ख्याल रखते आया था।

"विपुल रोते नहीं हैं।सुन मेरे भाई, तुम्हारे मम्मी-पापा नहीं मिले तो मैं तुम्हें अपने पास बुला लूँगा। क्यों मम्मी आप रख लेंगी ना विपुल को..?"

"हाँ बिल्कुल बच्चे..पर अभी जाने दो,रमन की दादी के बार-बार फोन आ रहे हैं..!"विपुल आँसू पोंछता हुआ मंगल से लिपट गया।

छः महीने और बीत गए। आखिरकार विपुल के माता-पिता का पता भी चल गया। विपुल दिल्ली के ही रईस परिवार का बेटा था।जिसे पैसों के लिए किडनैप किया और पैसे लेकर किडनैपर बच्चे को सौंपे बिना भाग गए। पुलिस ने किडनैपर तो पकड़ लिए पर तब तक विपुल भीखू के हाथ लग गया था।बच्चा बोल नहीं पाता था ऊपर से कालिख पुता बदन, फटेहाल भिखारी के रूप में दिल्ली में होते हुए भी तीन साल तक उसका कोई पता नहीं चल पाया।

कानूनी कार्यवाही के साथ विपुल को उसके माँ बाप को सौंप दिया। मंगल की हिम्मत की हर ओर वाहवाही हुई। मंगल की हिम्मत और उसके द्वारा बताई जगह पर छापे मारकर कई बच्चों को पुलिस ने अपने कब्जे में लेकर अनाथालय भेज दिया। और उनके परिवार की तलाश शुरू कर दी।

बारिश का मौसम फिर लौट आया था।सभी बच्चे भीखू के चंगुल से आजाद हो गए,यह खबर सुनते ही मंगल छत पर बारिश के मजे लेकर नाचने लगा।इस आशा के साथ, देर-सवेर ही सही पर उन सबको भी एक दिन उनका परिवार जरूर मिलेगा।
©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️
चित्र गूगल से साभार


Sunday, June 6, 2021

हादसा


ज़िन्दगी का सफ़र 

है ये कैसा सफ़र 

कोई समझा नहीं 

कोई जाना नहीं....

श्रुति कान में हेडफोन लगाए आँखें बंद किए गाना सुनने में मगन थी।सुधांशु और नील आपस में गप्पे मार रहे थे। नील सुधांशु बचपन के दोस्त थे। सुधांशु कोई भी काम नील की जानकारी के बिना नहीं करता था।
श्रुति को मगन देख सुधांशु बोला। "इसका काम सही है..पूरा सफर गाने सुनने में निकाल देगी..!"
"सही है यार..! वैसे भी अँधेरे में बाहर कुछ दिखाई तो दे नहीं रहा, सुनने दे उसे..!"
सुधांशु के जरिए नील की मुलाकात श्रुति से हुई और दोनों जल्दी अच्छे दोस्त बन गए।श्रुति सुधांशु की बिजनेस पार्टनरशिप थी।अपने नए प्रोजेक्ट के सिलसिले में दोनों शहर से दूर कंचनपुर गाँव के पास काली पहाड़ी की जमीन देखने आए तो दोनों नील को साथ ले आए थे।
"सुधांशु हम बहुत लेट हो गए,रात होने वाली है।क्यों न हम लोग यहीं पास के गाँव में रहने की जगह देख लेते हैं। क्यों श्रुति तेरा क्या विचार है..?"नील ने पूछा।
"क्यों..? तुझे भूतों का डर लग रहा है क्या..?" सुधांशु हँसकर बोला।
"हँसने की बात नहीं है सुधांशु।नील सही ही कह रहा है।हम जिस रास्ते से आए वो एकदम वीरान है।वहाँ आस पास कोई बस्ती भी नहीं है। ऊपर से चारों ओर घना जंगल,ऐसे में रात को कहीं गाड़ी खराब हो गई तो क्या करेंगे..?"
"हाँ सुधांशु तू भले भूत-प्रेत पर विश्वास न करे,पर मैं तो करता हूँ। मैंने नानाजी के गाँव जाते समय बचपन में एक बार ऐसा कुछ देखा कि दुबारा कभी वहाँ गया ही नहीं..!"
"मेरा ऐसा कोई अनुभव नहीं पर फिर भी मैं इन सब बातों में विश्वास करती हूँ और अब रात भी होने आई है तो..?" श्रुति ने नील की बात का समर्थन किया।
"तो क्या हुआ..?चिंता मत करो श्रुति।मैं तुम लोगों को यहाँ लाया हूँ तो सुरक्षित घर पहुँचाने की जिम्मेदारी भी मेरी,हम दूसरे रास्ते से चलते हैं..अब चलें..?"सुधांशु ने कहा।
"सुधांशु दूसरा कोई रास्ता नहीं मैंने पता कर लिया। थोड़ी देर पहले सेवाराम कह रहा था कि शहर आने- जाने का यही एक रास्ता है..!"नील बोला।
"ओके फिर इसी से चलते हैं..आओ बैठो..!"सुधांशु ने गाड़ी का दरवाजा खोला।
"अगर रात को गाड़ी में कहीं कोई गड़बड़ हो गई तो..? मुझे तो दिन में ही वहाँ का सन्नाटा डरा रहा था।क्यों ना आज रात हम लोग कंचनपुर में ही रुक जाएं..?कल सुबह जल्दी शहर के लिए निकल लेंगे,क्यों नील..?" श्रुति बोली।
"हाँ यही ठीक रहेगा सुधांशु..!" नील बोला।
"यार तुम दोनों सच्ची बड़े डरपोक हो।श्रुति तेरी तो नयी गाड़ी है फिर भी डर रही हो..?यह बात तुम कल ही कह देतीं तो मैं अकेला ही यहाँ आ जाता, हा हा हा हा हा...!"सुधांशु हँसने लगा।
"हँसने की कोनहुँ बात नहीं है बाबूजी। मेमसाब और नील साहब सच्ची ही तो कह रहे हैं।रात के समय जाने में कौनऊ समझदारी नाही..!"सेवाराम ने कहा।
"अब तुम शुरू हो गए..?"
"झूठ नहीं बोलेंगे साब हमाई ज़िंदगी इस गाँव में बीती है। बचपन से बहुत कुछ सुने ऊ जंगल के बारे में,साँची कहत हैं हम साब‌।ऊ रस्ता दिन के लिए ठीक है,वहाँ से रात को जाना ठीक नहीं...!"
"चलो तुम अपना काम करो।हम हमारा देख लेंगे..!"यह कहकर सुधांशु ड्रायविंग सीट पर बैठ गया।
सच्ची कहत हैं साब, रात को वहाँ से हम गाँव वाले भी नहीं जाते।बात मान लेओ,हम गाँव में ही तोहार लोगन की सोवे की व्यवस्था करवाए देत हैं।भुरारे उठतई तुम ओंरे निकल लेना..!"सेवाराम बोला।
"नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं है सेवाराम।यार अभी तो सिर्फ आठ बजे हैं।हम लोग अभी निकलेंगे तो सुबह तीन बजे तक शहर पहुँच जाएंगेे..!"सुधांशु बोला।
सेवाराम की बातें सुनकर श्रुति और भयभीत हो रही थी।"क्क्या क्या सुना उस रास्ते के बारे में? हमें बताओ सेवाराम..!" श्रुति हकलाते हुए बोली।
"मेमसाब बहुत समय पहले यहाँ कुछ बहुत गलत हुआ था।इस काली पहाड़ी की जमीन खरीदने में कौनउ समझदारी नहीं है।यहाँ शहर वालों का कोई कारोबार शुरू नहीं होता..!"
"क्यों सेवाराम..?"श्रुति बोली।
बहुत लंबी कहानी है यह,यहाँ सिर्फ कंचनपुर, मधुपुर, मानपुर और एक दो और छोटे कस्बे हैं,बस वहाँ के लोग ही कारोबार कर पाते हैं। किसी भी बाहर वाले का कोई भी प्रॉजेक्ट आजतक शुरू नहीं हुआ..!"
क्या बात कर रहे हो..?ऐसा क्या है यहाँ,जो कोई प्रॉजेक्ट सफल नहीं होता..?नील ने पूछा।
सुधांशु साहब को हम पहले ही हिंट दिए थे कि यहाँ जो भी आया है,बर्बाद हुआ है।यहाँ के बारे में अच्छी तरह पता करलें।उसके बाद ही कोई निर्णय लें..!"सेवाराम कुछ कहता उससे पहले उसकी बात काटते हुए सुधांशु चिल्ला पड़ा। 
"कभी तो चुप रहा करो सेवाराम, तुम बहुत बोलते हो... और जाओ यहाँ से..!हम हमारा देख लेंगे, वैसे भी इन बेकार की बातों के लिए समय नहीं है।हम लोग अभी वापस जाएंगे..!"
"नहीं सुधांशु हम सेवाराम की बातें इग्नोर नहीं कर सकते..?"नील और श्रुति बोले।
"ठीक है तो तुम दोनों गाँव की बस सुबह-शाम चलती है।उससे आ जाना, मैं अकेला चला जाता हूँ..!" सुधांशु गाड़ी स्टार्ट करने लगा।
"ठीक है तुम नहीं मानते तो हम भी चलते हैं।साथ आए हैं तो परेशानी हो या सुख साथ भोगेंगे..!
"जइसन आपकी मर्जी साहब,हमार फर्ज हम पूरा कर दिए, आगे तोहार लोगन की किस्मत, ईश्वर रक्षा करें,चलत हैं हम..!" सेवाराम चला गया।
तुमने बेचारे सेवाराम को क्यों भगा दिया।वो तो हमारे भले की बात कह रहा था..?"..नील सुधांशु के ऊपर गुस्सा होने लगा।
"सुधांशु ऐसा क्या है वहाँ?क्या छुपा रहे हो तुम?सच अब तो यह जगह देखकर तो हमें भी निगेटिव फीलिंग आने लगी है..!"श्रुति ने फिर पूछा।
"कुछ भी नहीं..इन गाँव वालों का काम ही अफवाह फैलाना है..!"सुधांशु बोला।
"अभी भी वक्त है सुधांशु, एक बार औ विचार कर ले..?"
"हाँ नील मुझे भी कुछ ठीक नहीं लग रहा‌। चलो रात हो रही है, हम कंचनपुर चलते हैं..?"
"सच बताऊँ तो मुझे अब इस काली पहाड़ी के प्रॉजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं रही।हम सुबह जल्दी शहर के लिए वापस निकल लेंगे..!"श्रुति बोली।
"सुधांशु मुस्कुराया और गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।"वैसे तुम लोगों को बेवकूफ बनाना बहुत आसान है।यह आज प्रूफ हो गया..!"
"बेवकूफ..और हम,वो कैसे..?"नील और श्रुति बोले।

अरे यार तुम लोग बात ही बेवकूफी भरी कर रहे हो।नील।श्रुति पहले मेरी बात समझो।यह गाँव वाले बड़े ही सीधे-सादे होते हैं।शहर वालों से दूर रहने में अपनी भलाई समझते हैं इसलिए बेकार की बातें करके शहरी लोगों को डराते हैं ताकि कोई शहरी उनके गाँव में प्रवेश न करे...!"सुधांशु बोला।

"हम्म शायद तुम सही कह रहे हो..?"नील बोला।

एक बात बताओ..?यह जो फेक्ट्री लगी हैं।यह सब क्या गाँव वालों ने लगाई होंगी..?हो ही नहीं सकता..! क्या पता रात को हमे यहाँ रोककर डराने का प्लान हो?चलो अब चलते हैं,समय से निकलेंगे तो समय से पहुँच जाएंगे..!

हम्म तेरी बात सही है सुधांशु,कुछ भी हो सकता है।चल श्रुति अब और देर करने में कोई फायदा नहीं,तू आराम से पीछे बैठ जा।मैं आगे बैठ जाता हूँ..!"नील ने श्रुति को समझाते हुए कार की पीछे की सीट पर बैठा दिया। श्रुति ने इयरफोन लगाए और आँख बंद करके मोबाइल पर गाना सुनने लगी।

"यह गाँव वाले भी बड़े अजीब होते हैं ना सुधांशु..?सच बताऊँ,सेवाराम की बातें सुनकर मैं भी डर गया था।अब तो लगता है इस जगह के लिए किसी और पार्टी से इसे ज्यादा कमीशन मिल रहा होगा..?"

"हाँ नील यही बात होगी..? तभी तो मैंने कहा कि इन बातों पर विश्वास मत करो ,यह अफवाहें हैं बस..!"

तभी गाने सुनने में मगन श्रुति को अहसास हुआ कि किसी ने उसके पैरों को छुआ,उसे लगा शायद नील ने छुआ होगा।

"क्या बात है नील..छुआ क्यों..?"

"कहाँ क्या हुआ..?तुमने कुछ कहा श्रुति..?"नील ने गर्दन घुमाकर पूछा।

"तुमने मुझे क्यों छुआ..?" श्रुति बोली।

"मैंने..? नहीं तो..?तू सोई थी क्या..? मैं और सुधांशु तो कबसे बातें करते जा रहे हैं, तूने देखा नहीं..पूछ सुधांशु से..!"नील ने कहा।

"श्रुति लगता है,तू और तेरा दिमाग अभी भी वहीं गाँव में ही घूम रहे हैं..!" हाहाहाहाहा सुधांशु हँसा।

"हम्म शायद..?" श्रुति ने फिर आँखें बंद करके सोने की कोशिश की तो फिर एक सरसराहट अपने समीप महसूस की, चौंककर देखा तो कुछ भी नहीं था।

"नहीं यह मेरा भ्रम नहीं है नील.. कुछ तो है जो मुझे अजीब लग रहा है नील..प्लीज तुम पीछे आ जाओ मैं अकेले नहीं बैठूँगी नील.. !"

"जा भई तू उसके साथ ही बैठ, नहीं तो यह ऐसे ही डरती रहेगी..!" सुधांशु ने बीच जंगल में गाड़ी रोक दी।

नील उतरकर श्रुति के साइड का गेट खोलने लगा।रात के बारह बज रहे थे।चारों ओर घना अँधेरा और जंगल से अजीब सी डरावनी आवाजें और हवा की सरसराहट सिरहन पैदा कर रही थी। 

गाड़ी से बाहर खड़े नील को मन ही मन डर लग रहा था।"श्रुति यार लॉक तो खोल..गेट खुल नहीं रहा तो मैं अंदर कैसे आऊँ..?" नील झल्ला उठा।

"लॉक तो खुला है नील?रुको मैं अभी अंदर से भी गेट खोलती हूँ..!" श्रुति गेट खोलने की कोशिश करने लगी पर कार का दरवाजा जरा भी टस से मस नहीं हो रहा था।

"अरे यार रात यहीं बितानी है क्या..? क्या कर रहे हो तुम दोनों..? कोई लॉक नहीं लगा, मैं सब चैक कर चुका हूँ..!"

सुधांशु ने अंदर से सारे सिस्टम चैक करके देखकर बोला "लगता है किसी कारण से गेट तो जाम नहीं हो गया?नील एक काम कर, तू अंदर आ और अपनी सीट को थोड़ा झुकाकर अंदर से ही पीछे चला जा बेकार में देर हो रही है..!"

"ओके यही ठीक रहेगा..!" नील अपनी सीट पर बैठने के लिए गेट ओपन करने लगा।"अरे यह क्या..?अब यह भी नहीं खुल रहा सुधांशु..ऐसा कैसे हो सकता है..?"

"क्या..?"सुधांशु चौंका।

"जरूर कुछ गड़बड़ है सुधांशु, मुझे लगता है सेवाराम सही कह रहा था..? नयी गाड़ी में ऐसी समस्या हो ही नहीं सकती..!"गाड़ी के दरवाजे खोलने की कोशिश में नील के पसीने छूटने लगे।

"क्या कुछ भी अनाप-शनाप बोल रहे हो नील..? तुम दोनों खुद डर के मारे दरवाजा भी नहीं खोल पा रहे..? और बेकार की बातें और करने लगे, हद्द है यार...!" सुधांशु चिल्लाया।

"सुधांशु माँ कसम, मैं झूठ नहीं कह रहा हूँ। अच्छा तू देख तेरी तरफ का दरवाजा खुल रहा है क्या..?" नील ने कहा।

"हाँ मेरा तो खुल रहा है यह देखो। सुधांशु ने सीट पर बैठे ही दरवाजा खोलकर दिखाया। एक काम करो, तुम यहाँ से अंदर आओ,मैं बाहर निकलता हूँ। चलो जल्दी अब देर मत करो..!"सुधांशु जैसे ही बाहर निकला वैसे ही वो भी गेट खट् से बंद हो गया।

"अरेरेरे यह कैसे बंद हुआ..?यह कैसे हो सकता है..?" अब तो सुधांशु के भी पसीने छूट गए।उसे भी अनहोनी की आशंका सताने लगी थी।

"श्रुति तेरी गाड़ी में पहले भी ऐसी समस्या हो चुकी है क्या..?"नील ने पूछा।

"नहीं नील गाड़ी तो एकदम नयी है।हाँ पहली बार इतनी दूर लेकर आए हैं।पर उससे तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए..?फिर यह कैसे हो रहा है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा..?"

"समझ में तो हमारे भी कुछ नहीं आ रहा है श्रुति..!यह क्यों नहीं खुल रहे..!" सुधांशु सिर पर हाथ रखकर बोला।

"उफ़ एक तो घनघोर अँधेरा ऊपर से यह डरावनी आवाजें,नील.. सुधांशु.. कुछ करो मुझे बहुत डर लग रहा है।गाने सुनने के कारण मेरे मोबाइल की बैटरी डिस्चार्ज हो गई है। मुझे तुम लोग भी दिखाई नहीं दे रहे हो..!"श्रुति रोने लगी।

"श्रुति रो मत,हम दोनों कोशिश कर रहे है ना.. एक काम कर तू आगे आकर गाड़ी की सभी लाइट्स ऑन कर दे, रोशनी हो जाएगी।तब तक हम गाड़ी के लॉक खोलने की कोशिश करते हैं।तू चैक करके देख कहीं गलती से गाड़ी लॉक तो नहीं हो गई..?"नील बोला।

"हम्म यह हो सकता है श्रुति, नील सही कह रहा है, तू आगे जाकर लॉक खोलने की कोशिश कर..!"

"नील अपने मोबाइल से श्रुति को जरा रोशनी दिखा मेरा फोन गाड़ी के अंदर ही रह गया..?" सुंधाशु जेब टटोलते हुए बोला।

"मेरे मोबाइल की बैटरी तो शाम को ही डिस्चार्ज हो गई थी सुंधाशु..!"

"मैं क्क् कोशिश करके देखती हूँ,पर मुझे बहुत डर लग रहा है नील।हमें रात वहीं रुक जाना चाहिए था..!"श्रुति लड़खड़ाती जबान से बोली।वह डर के मारे बुरी तरह काँप रही थी।

अँधेरा इतना घना था कि कार के अंदर श्रुति भी नहीं दिख रही थी।सितम्बर का महीना था तो चाँद भी बदली में छुपा हुआ था।

श्रुति उठने लगी तो अचानक...घर्र घर्र की आवाज के साथ कार अपने-आप स्टार्ट हो गई,यह देख श्रुति की चीख निकल गई।"यह क्कैसे..नील.. सुधांशु मुझे बचाओ.. !"श्रुति डर से चीखने लगी और एक झटके से गाड़ी स्टार्ट होकर तेज रफ्तार के साथ आँखों से ओझल हो गई।

"हे भगवान यह सब क्या हो गया।हम सेवाराम की बात मान लेते तो सही रहते सुधांशु।अब हम श्रुति को कैसे ढूँढेंगे..?"नील सिर पकड़कर बैठ गया।

"वो तो हमारे साथ आ ही नहीं रही थी। तेरे कहने पर उसे साथ में लेकर आया था।अब उसके भाई को क्या जवाब दूँगा..?"

"अब क्या करेंगे, और क्या बताएंगे श्रुति के भाई को सुधांशु..?"

"तू सही कह रहा है नील, श्रुति की गाड़ी उसे लेकर अपने-आप गायब हो गई, इस बात पर कौन विश्वास नहीं करेगा..?"

चररड़..मररड़..सूखे पत्ते चरमराने की आवाज आने लगी। ऐसा आभास हुआ जैसे कोई उनकी और चला आ रहा है।

"इस बारे में हम बाद में सोचेंगे नील।पहले तो अपनी सुरक्षा की सोचो।सुनो सूखे पत्ते की आवाज से लग रहा है कि कोई इधर आ रहा है।तेज हवाओं के कारण पेड़ों की डालियाँ से किरर्र करर्र की डरावनी आवाजें आ रही थीं।

"अब क्या करें..?"

"आग जला लेते हैं।हाँ यही सही होगा..!"तुरंत दोनों ने आसपास की सूखी टहनियाँ और पत्ते जमा किए और सुधांशु ने अपना रुमाल को सिगरेट लाइटर से आग लगाई और उस ढेर को आग लगा दी।

नील आँखें मल मलकर चारों ओर देखने की कोशिश कर रहा था ‌पर हर और सिर्फ़ अँधेरा और घना जंगल ही नजर आ रहा था।"सुधांशु यहाँ इतने पेड़ हैं पर ऊपर चढ़ने लायक एक भी नहीं कि हम उस पर चढ़कर यह देख सकें कि आसपास कोई बस्ती में रोशनी दिख जाए और हमें कोई मदद मिल सके..?"

पत्तों के खड़खड़ाने की आवाज बंद हो गई थी।"यह तो शायद हवा की आवाज थी..?अब बंद हो गई..!"

"हम्म शायद..?"

"हुँऊऊऊऊऊ..." भेड़ियों के रोने की आवाज से दिल की धड़कन तेज होने लगी।

"अरे बाप रे यहाँ भेड़िए भी हैं..?"नील घबराया।

"डर मत आग से कोई पास नहीं आएगा।बस इसे बुझने नहीं देना।इसके सहारे हमें रात यहीं बितानी है।अँधेरे में इधर-उधर भटकने से कोई फायदा नहीं नील।हम सुबह होते ही सबसे पहले गाँव वालों की सहायता से श्रुति को ढूँढने की कोशिश करते हैं..!"

"कौन है..?कौन है वहाँ..?तभी नील को कोई दौड़ता महसूस हुआ।

"बचाओ... मुझे बचाओ..!"छपाक के स्वर के साथ किसी महिला की पानी में हाथ-पैर मारने की आवाज आने लगी।

"चल देखते हैं कोई मुसीबत की मारी लगती है। वरना इस अँधेरे जंगल में इतनी रात को क्या करने आती...?" सुधांशु उठकर जाने लगा।

"चुपचाप बैठे रहो.. क्या पता कोई छलावा..?"

"यह भी हो सकता है..!" सुधांशु फिर आग के समीप बैठ गया।दोनों खामोशी से से हाथ में मजबूत टहनियाँ लिए बैठे थे।

"देख आवाज बंद हो गई। मैंने सही कहा था यह छलावा हो सकता है..!"नील बोला।

"पर तुझे कैसे समझा..?"

"नानाजी के गाँव में ऐसा ही कोई चक्कर था।वो अक्सर सबसे कहा करते थे कि सुनसान जगह पर कोई पीछे से आवाज दे तो कभी मुड़कर मत देखना..!"

"क्यों भला..? कोई अपना भी तो किसी काम से बुला सकता है..?"सुधांशु ने पूछा।

"सुधांशु तुम कभी गाँव नहीं गए या वहाँ से कोई संबंध नहीं..? नानाजी कहते थे कि निगेटिव एनर्जी किसी भी रूप और आवाज में धोखा दे सकतीं हैं।इसलिए यह जरूरी नहीं आवाज लगाने वाला अपना ही हो..!"

"क्या बात कर रहा है..? मैं नहीं मानता..!"

"तेरे इस नहीं मानने के चक्कर में तो आज हम मुसीबत में घिर गए हैं..!"नील ने चारों ओर अग्नि का घेरा बना लिया था और बीच-बीच में आग में सूखी टहनियाँ और पत्ते डालकर उसे बुझने से बचा रहा था। चिंता और डर से नींद आँखों से उड़ी हुई थी।

"नील मैंने नहीं सोचा था कि सच में भी ऐसा होता है..? सेवाराम ने मुझे यह कहा था कि यह जगह शहर वालों के लिए ठीक नहीं,आप यहाँ प्रॉजेक्ट लगाने का विचार छोड़ दो।पर यहाँ तो किसी निगेटिव एनर्जी का चक्कर लगता है..!

तूने उसे बताने से पहले ही चुप करा दिया होगा? पहले भी डाँटकर पूरी बात ही नहीं सुनी होगी..?सुनता तो पूरी बात बताता..?पर फिर भी तुझे विश्वास नहीं होता और यह सब होता ही..!"नील बोला।

तभी उन्हें कुछ बातें करते लोगों के आने का आभास हुआ। हाथों में टार्च दिखाई दे रही थीं।

"श्श्श्श चुप नील वो देख उधर..लगता है उस औरत को ढूँढ रहे हैं..?हम भी उनके साथ निकल लेते हैं।उन लोगों ने आग जलती देख ली शायद..?"इसलिए हमारी मदद को आ रहे हैं..!"

"सुधांशु अभी भी रात ढली नहीं, यह भी कोई छलावा हो सकता है। याद नहीं सेवाराम ने क्या कहा था..?गाँव वाले शाम के बाद इधर नहीं आते..!"नील ने कहा।

"एक बुजुर्ग और उसके साथ शायद उसका बेटा था। तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो..?शहरी लोग हो लगता? तुम लोगों को किसी ने बताया नहीं कि रात में यहाँ आना मना है..?"बुजुर्ग ने कहा।

"वो हम यहाँ..!"सुधांशु कुछ कहता उससे पहले नील ने पूछा।"पहले आप बताओ कि यहाँ कोई खतरा है तो आप यहाँ क्या कर रहे हो..?"

"मेरा नाम दीना और राजू मेरा बेटा। हम अपनी बहू को ढूँढने आएं हैं। आपने देखा उसे..?वो झगड़ा करके इधर ही भागी थी..!"बुजुर्ग बोला।

"नहीं हमने ..!"नील कुछ और बोलता उससे पहले सुधांशु बोल उठा।

"हाँ इधर से किसी औरत की आवाज आई थी। जैसे वो पानी में कूदी हो..!"

"बाबू चलो हमारे साथ, हमें बताओ किधर से आवाज आ रही थी। कहीं गुस्से में वो कुछ कर न बैठे..!"राजू बोला।

"हम यहाँ से कहीं नहीं जा रहे।आप लोग यहीं के रहने वाले हो, आप तो यहाँ का चप्पा-चप्पा पता होगा" फिर हमारे मार्गदर्शन की क्या जरूरत..?उधर से आवाज आई थी तो जाकर देख लो..!"नील ने कहा।

"कैसी बात करते हो नील..? हमारी मदद से इनकी बहू मिल जाए तो अच्छा है ना..?चलिए मैं चलता हूँ आपके साथ..!"सुधांशु उठ खड़ा हुआ।

"नहीं सुधांशु हम कोई रिस्क नहीं ले सकते,तू नहीं जाएगा.. नील ने गौर किया कि वो दोनों इस तरह खड़े थे की आग का धुआँ भी उन्हें टच न करें।

"तू डर के मारे पागलपन की बातें कर रहा है नील। कुछ नहीं होगा,मैं अभी आया..!"उससे पहले वो उठकर घेरे से बाहर निकलता,नील ने एक जलती हुई टहनी उठाई और बाप-बेटे के ऊपर फेंक दी, नील सही था वो कोई छलावा ही था।

"ओ माई गॉड, यह तो गायब हो गए..?"

"कहा ना मैंने इस समय बस हनुमान चालीसा का पाठ करो और कोई चारा नहीं है हमारे पास सुधांशु..!"सुबह होते ही कंचनपुर जाएंगे और उनकी मदद से श्रुति को ढूँढने की कोशिश करेंगे..!"

"हम्म तुम सही कह रहे हो..!"

रह-रहकर सन्नाटे को चीरती आवाजों के बीच तभी सुधांशु उठकर बाहर जाने लगा।

"तू कहाँ चला..?"

"बस आया यार,इमरजेंसी है। सुबह पता नहीं कब होगी?हम काफी समय से निकले हुए हैं..!"

"नहीं यह गलती मत करना सुधांशु लेने के देने पड़ जाएंगे..!"

"तो क्या करूँ..?यार इतना भी नहीं डरा जाता। वैसे भी अभी कोई हलचल नहीं, लगता है सुबह होने वाली है..?"

"नहीं,जहाँ तक मेरा अंदाज है दो या ढ़ाई बज रहे होंगे..? एक-दो घंटे रुक जा।चार बजे के बाद कोई डर नहीं..!"

"सॉरी नहीं रुक सकता..!"सुधांशु चला गया।

"सुधांशु यार तू भी..!"नील रोकता रह गया।

"हे बजरंगबली रक्षा करना।जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीश...," नील जोर-जोर से हनुमान चालीसा गाने लगा। तभी सुधांशु के चीखने की आवाज सुनाई दी।

नील बचाओ मुझे...!!आहहहह बचाओ जल्दी!! मैं  नीचे गिरा जा रहा हूँ..!"

"सुधांशु..?"अब क्या करूँ..? मैं बाहर निकला और मेरे साथ भी कुछ...? लगता है आज हम तीनों की कहानी इस जंगल में खो जाएगी? नील ने हाथ में पकड़ी मोटी टहनी में अपनी जैकेट को अच्छी तरह बाँधा और उसे जलाकर सुधांशु की ओर भागा।

"मैं आ रहा हूँ सुधांशु..आहहहह!"अचानक उसका पैर फिसला। उसने बहुत संभलने की कोशिश की पर फिर भी काफ़ी दूर तक सरकने के बाद वो किसी चीज से टकराकर रुक गया। उसकी कोहनी छिल गई पर उसने जलती हुई टहनी नहीं छोड़ी।

"यह..? रोशनी में गौर से देखा तो चौंक गया। हमारी गाड़ी..? श्रुति!!कहाँ है तू..?"रोशनी पर्याप्त नहीं थी कार के अंदर दिखाई नहीं दे रहा था।

"नील..!! सुधांशु चिल्लाया।

"आग कहीं बुझ न जाए,पहले सुधांशु को देखूँ फिर श्रुति को ढूँढता हूँ। आया सुधांशु...!"नील आवाज की दिशा में भागा।

सुधांशु एक पेड़ की जड़े पकड़े लटका हुआ था।" तू इधर कैसे गिरा..?" 

"पता नहीं यार,ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे जोर से धक्का दिया। कौन था..?अँधेरे के कारण मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया वह तो यह जड़ें पकड़ में आ गई और मैं हनुमानजी का नाम लेते हुए तुझे बुलाने लगा..!"

आ हाथ दे अपना..!"नील की मदद से सुधांशु बाहर आ गया।

"उफ़ यार पहले पता होता यहाँ इतनी गड़बड़ है तो मैं कभी इस प्रॉजेक्ट के बारे में नहीं सोचता..!"वह जमीन में बैठकर हाँफने लगा।

"तेरा सिगरेट लाइटर कहाँ है सुधांशु..?"

"मेरी जेब में, क्यों..?"

"यह अब ज्यादा देर नहीं जलने वाली, हमें एक और मजबूत लकड़ी ढूँढकर मशाल बनानी होगी।हमारी कार भी मिल गई ,चल श्रुति को ढूँढते हैं..!"

"कार..कहाँ..?"

"तू चल मेरे साथ..!"नील सुधांशु का हाथ पकड़े उस तरफ दौड़ा जहाँ कार देखी थी।

"लाइटर जला सुधांशु..यह आग बस बुझने ही वाली है..?"

"नहीं बुझेगी मुझे लकड़ी मिल गई,यह देखो..!"

"ओह यह गीली है..!"रुक तू यह पकड़ जरा..!"नील ने अपनी शर्ट उतारकर उसके सिरे पर अच्छी तरह बाँधकर आग लगा दी।

"वाह नील तुझे बहुत आइडिया है। मेरे जैसा इंसान तो कब का मर चुका होता..!"

"हम्म चल अब श्रुति को ढूँढते हैं..!"नील सुधांशु को लेकर कार तक पहुँच गया।

"यह रही हमारी गाड़ी..!"

"यह तो बिल्कुल सही-सलामत है नील..? भगवान करे श्रुति भी ठीक-ठाक हो..?"सुधांशु ने आगे बढ़कर गेट खोलने की कोशिश की तो वो आराम से खुल गया।

"लो दरवाजा भी आराम से खुल गया..!" गाड़ी की लाइट चालू करके देखा तो अंदर श्रुति नहीं थी।

"श्रुति..? नील श्रुति गाड़ी में नहीं है..!"

"क्या..? ऐसा कैसे हो सकता है..? श्रुति कहाँ हो तुम..? नील ने आवाज लगाई।

सुधांशु ने कार से अपना मोबाइल निकालकर समय देखा।"नील तीन बजने वाले हैं..!"

"हम्म" नील ने और कोई जवाब देकर चुपचाप सूखे पत्ते जमा करके आग जलाई।

"क्या हुआ तू मौन क्यों हैं..?"सुधांशु ने पूछा।

"मौन नहीं यार,अब यह टहनी बुझने वाली थी तो पहले आग की व्यवस्था कर रहा था।तू अपनी अच्छे से पकड़े रहना।आग से निगेटिव एनर्जी दूर रहती है..!"

"ओके..!"सुधांशु बोला।

"मोबाइल दिखा..!"नील ने सुधांशु के मोबाइल की टार्च जलाकर गाड़ी की सीट के आस-पास अच्छी तरह देखा।"श्रुति गाड़ी में तो नहीं है।कहाँ जा सकती है..?"

"डिक्की देख नील.. शायद डरकर उसमें छुप गई हो..?"

"हाँ हो सकता है..!"नील ने डिक्की खोली तो श्रुति उसमें बेहोश पड़ी थी।

श्रुति..!आँखें खोल, श्रुति...!!इसे तो होश ही नहीं आ रहा है।अब क्या करें..?"

"पानी नील.. गाड़ी में पानी की बोतल है..!"सुधांशु ने तुरंत पानी की बोतल निकाली।नील ने श्रुति के मुँह पर पानी के छींटें मारने शुरू कर दिया। छींटें पढ़ते ही श्रुति के शरीर में हलचल होने लगी।

"छोड़ो मुझे... नहीं..!! चीखकर उठी तो नील और सुधांशु को देखा तो नील से लिपट गई।

"नील.. तुम लोग आ गए..!"

"क्या हुआ तेरे साथ और डिक्की में कैसे..?"नील ने पूछा।

"अचानक गाड़ी रुकी और दरवाजा भी आराम से खुल गया।मैं डरते हुए उतरी सोचा आगे बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके तुम लोगों के पास ले जाऊँ।घने अँधेरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे ही गाड़ी से उतरी किसी के हाथों का दबाव क्षण भर के लिए मेरे गले पर महसूस हुआ लेकिन एक चीख के साथ वो साया दूर होकर गायब हो गया।मैं डर के मारे डिक्की में जाकर छुप गई और कैसे बेहोश हुई पता नहीं..?"

"नील एक बात नहीं समझी..?उसने श्रुति को मारने की कोशिश की, फिर चीखकर भागा क्यों..?"

"उसका कारण यह है..!" नील ने श्रुति के गले में पड़ा देवी की मूर्ति का लॉकेट आगे किया।उसने इसे मारने की कोशिश की पर इससे टच होते ही वो चीखकर गायब हो गया..!"

"चलो अब सब ठीक है तो वापस चलते हैं।गाड़ी में बैठो आओ..!"सुधांशु बोला।

"नहीं सुधांशु अभी भी रात है। अभी भोर का प्रथम प्रहर शुरू नहीं हुआ।इस समय हमारी सुरक्षा यह अग्नि कर सकती है।आओ यहीं बैठते हैं, आधे घंटे बाद हम वापस कंचनपुर चलेंगे..!"

"कंचनपुर क्यों..?"दोनों बोले।

"यह सब क्या चक्कर है,जानना है मुझे..!"

"पर अब हमें इस प्रॉजेक्ट में ही कोई इंटरेस्ट नहीं है तो फिर क्यों..?"

"कोई असमय मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति या कोई ऐसा व्यक्ति जिसके मरने का कारण तो पता है पर उसका विधिवत अंतिम संस्कार न होने से वो इस तरह अपना बदला लेने की कोशिश करती हैं और समय के साथ निगेटिव एनर्जी बलवान होती जाती है। हमें यह कारण पता करके इस काम को अंजाम देना होगा..!"

"नहीं कर पाओगे तुम कुछ,हा हा हा मारे जाओगे सब..मारे जाओगे सब..!" अचानक से अट्टहास भरी आवाजें सुनाई देने लगी और कुछ परछाईंयाँ भी जो उनके चारों ओर घूम रहीं थीं।

"नील..,"श्रुति डरकर नील से लिपट गई।डरो नहीं श्रुति..बस सब जाप करते रहो और अग्नि जलाए रखने की कोशिश जारी रखो..,अब बस सुबह होने ही वाली है।फिर यह लोग हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे।थोड़ी देर में चिड़ियों के चहचहाने का स्वर सुनाई देने लगा।

"मार्निंग हो गई नील..?"

"हम्म टाइम क्या हुआ सुधांशु..?"

"मेरा मोबाइल अब बंद हो गया है नील..!"

"रुक जाओ फिर, जंगल में जल्दी उजाला दिखता है।इन हालात में रोशनी के अलावा और कुछ सच नहीं हो सकता, उजाला होते ही निकलते हैं..!"

"जैसा तुम कहो..!"तुम्हारी हर बात सही साबित हो रही है नील..!"थोड़ी देर में आसमान लाल रंगत के साथ दिखाई देने लगा।

"अब सुबह हो गई,चलो बैठो सब..!"तीनों गाड़ी में बैठकर कंचनपुर की ओर निकल गए।

कंचनपुर पहुंचकर वह सीधे सेवाराम के घर का पता पूछते-पूछते उसके घर पहुंच गए।

"सेवाराम जी घर पर हैं..?"घर के चबूतरे पर झाड़ू लगाने वाली स्त्री शायद सेवाराम की पत्नी थी।

"हाँ घरइ हैं, अभी बुलात हैं..!"कहकर वो अंदर चली गई और थोड़ी देर में अंदर से सेवाराम कुर्ता पहनता हुआ बाहर आया।

"अरे साब जी आप लोग..? आप लोग शहर नहीं पहुँचे का..? और ई का..?नील बाबू आपके कपड़े कहाँ गए?लगता है कौनउ हादसा घट गयो...?"क्या हुआ साब सब ठीक तो है..?"

"सेवाराम पहले तो हमारे रुकने और खाने-पीने की कुछ व्यवस्था करवा दो, बहुत थक गए हैं। फुर्सत से तुमसे जरूरी बात करनी है..!"सुधांशु बोला।

"एक काम करो साब, भीतर चल के चाय पियो तब लो हम मुखिया जी से गेस्ट हाउस की चाबी ले आत हैं।रे भागवान साब लोगन ने चाय पिला..!"

"सेवाराम ऐसे तुम्हारे घर..?"नील सकपकाया।

"साब बाजार खुलने में समय है। अगर बुरा नहीं मानो तो?हमाई बुस्शर्ट पहन लो एकदम नई है। सासरे गोमती की विदा करान गओ तो सास दिए रहीं..!"

"हम अभी लावत हैं..!"गोमती शर्ट लेने अंदर चली गई।

"बुराई की कोई बात नहीं सेवाराम यह तो तुम्हारा प्रेम है..!"नील ने सेवाराम की शर्ट पहन तो ली पर लंबाई में छोटी पड़ गई।

"ओह यह तो आपके.. सेवाराम की बात काटते हुए नील बोला।

"कोई बात नहीं सेवाराम..शहर में कई लोग फैशन के चलते ऐसी शर्ट पहनते हैं। और फिर बाजार खुलने पर नई ले लूँगा..!"

"ठीक है आप चाय पियो हम चाबी लावत हैं।गाँव में कभी-कभी सरकारी अफसर आते थे तो उनके रुकने के लिए गेस्ट हाउस बना हुआ था और चाबी मुखिया जी पर रहती थी।

गोमती ने चाय बनाकर मठरी के साथ दी। नमकीन मठरी के साथ चाय पीकर तीनों को थोड़ा अच्छा लगा।

"चलो साब चाबी ले आया हूँ..!"सेवाराम लौट आया।गेस्ट हाउस में उसने दो कमरे खोलकर चाबी नील के हाथ में दी।"साब मुखिया जी दो कमरों की चाबी दिए हैं।आप दोनों एक कमरे में हो जाओ और मेमसाब को एक कमरा दे दो..!"

"धन्यवाद सेवाराम इतना ही काफी है।आप हमारे खाने की व्यवस्था करवा दो बहुत भूख लगी है।पैसे की चिंता मत करना।हम लोग तब तक मोबाइल चार्ज कर लेते हैं।बाजार कब खुलेगा..?"

"गाँव का हाट है दस बजे तक खुलत है और पाँच बजे बंद हो जात है। क्या कुछ खरीदे का है..?"

"हाँ सेवाराम एक-एक जोड़ी कपड़े,तभी तो फ्रेश हो पाएंगे..? नहा लें तो थकान मिटे..!"नील ने कहा।

"आप लोगन जैसे फैशन वाले तो नहीं,पर हम लोगन जैइसन कपड़े मिल जाएंगे।चलो अबई गंगा की दुकान खुलवाए देत हैं।ओ तो घरई में दुकनिया खोल रखी है..!"

"जै बात सेवाराम...चलो फिर..!"सुधांशु ने सेवाराम की टोन में कहा तो नील श्रुति हँस पड़े।

गंगा की दुकान में नील और सुधांशु ने साधा पेंट और कुर्ते खरीदें, श्रुति ने सिंपल सलवार सूट लिया। साधारण पर आरामदायक कपड़े थे।

तीनों गेस्ट हाउस लौट आए और नहा-धोकर तैयार हो गए। सेवाराम ने ढाबे का नंबर दे दिया था तो नील ने खाना ऑर्डर कर दिया। तीनों खाना खाकर आराम करने लगे। ग्यारह बजे सेवाराम मुखिया जी के साथ मिलने चला आया।

"साब मुखिया जी..!"

"नमस्ते मुखिया जी..!"

"साब अब बताइए रतिया के क्या हुआ रहा..?"

नील सारी बातें बताता है।

"बहुत समझदारी से काम लिया बाबूजी।नहीं तो जो रात में वहाँ फंसा वो मरा ही मिलता है।वो तीनों बुरी आत्माएं बन गए हैं। पहले तो गाँव वालों को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाते थे।पर अब उन्हें भी नहीं बख्शते..!"मुखिया बोले।

"तीनों कौन ?आप जानते हैं उनके बारे में ?बताइए हमें भी..!"

"दीना उसका बेटा राजू और उसकी पत्नी झुमरी उन तीनों की आत्माएं रात के समय आतंक मचाए हुए हैं...!"मुखिया बोले।

"जहाँ तक मैं जानता हूँ।जिनकी मृत्यु असमय हुई हो ?और उनकी आत्मा की शांति के लिए किसी प्रकार का पूजन नहीं हो?उनकी आत्माएं परेशान करतीं हैं..?"

"कोई बचा ही कहाँ उनके परिवार में,जो उनके लिए कुछ करता..!"

"हुआ क्या था उनके साथ..?"

"साब हमारे गाँव के कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने शहरों में ट्रेनिंग ली और लोन लेकर यहाँ अपने छोटे-छोटे कारखाने लगा लिए,गाँव के लड़कों को ट्रेनिंग देने लगे। कारखाने से जो भी उत्पादन होता है,उसे शहर में ले जाकर बेच देते हैं।हम लोगों की तरक्की के लिए इतना ही बहुत था।पर.,"मुखिया जी कहते-कहते रुक गए।

"पर क्या मुखिया जी..?"

"कुछ साल पहले,आप ही की तरह कुछ शहर के लोगों ने यहाँ एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया था।यह एक दवाइयाँ बनाने वाला प्रोजेक्ट था।तब दीना के परिवार ने उनकी बहुत मदद की थी।यहाँ गाँव वालों ने तो साथ देने से मना कर दिया तो वो लोग पास के गाँव से मजदूर ढूँढकर लाते थे..!"

दवाइयों का प्लांट..? सेवाराम ऐसा कोई प्लांट तो तुमने नहीं दिखाया..?"

"पूरा बनता तो दिखाते..!"मुखिया जी बोले।सेवाराम तुम बताए नहीं..?यहाँ बाहरी लोगों के प्रोजेक्ट पूरे नहीं होते..!"

"मुखिया जी हम बहुत कोशिश किए पर साब सुनव

ही नहीं करे।उन्होंने तो ट्रेन से जाते समय यह जगह देखी तो हम यहाँ जगह बतात हैं पता करके हमार नंबर खोज लिए..!"

"इसकी वजह..? ऐसा क्या हुआ था..?"

"प्रोजेक्ट तो सिर्फ बहाना था।वो लोग मानव अंगों की तस्करी करते किया करते थे।उन लोगों ने गाँव से दूर जंगल में बँगला बनाया तो हम सबको तभी शक हो गया कि कुछ गड़बड़ है। नहीं तो यहीं बँगला न बनाते..?"

"फिर..?"

"फिर क्या,हम अपने गाँव वालों को अपनी बातों से विश्वास दिला दिए कि यह शहरी लोग का काम कर सब मुसीबत में घिर जाओगे,यह तो मान गए पर वो तीनों नहीं माने,काहे की उनसे उन्हें मोटी रकम जो मिल रही थी।

"मानव अंगों की तस्करी..?यह आपको कैसे पता चला..?"

"वो ऐसे कि जो भी मजदूरी करने आता उसको वो यहाँ से जाने नहीं देते और परिवार वालों बुलाने आते तो कहते काम पूरा होते ही भेज देंगे। फिर उनको पगार देकर घर भेज देते..!"

"भोले-भाले गाँव वाले क्या जाने, उनके बच्चे क्या झेल रहे हैं।वो उनसे मिलते तो उनके पहरेदार साथ रहते तो वो सच नहीं बता पाते।वो लोग उनके गुर्दे निकालकर बेच रहे थे और जो मर जाते उनकी बाकी के अंग निकालकर उन्हें भी जंगल में दफन कर देते और माँ-बाप से कहते कि वो घर लौट गए..!"

"किसी ने पुलिस कम्पलेंट नहीं की..?"

"कितनों ने की,पर चोर चोर मौसेरे भाई गाँव वालों को ही डाँट कर भगा दिया जाता।हम लोगों ने दीना के परिवार को गाँव से निकाल दिया और आसपास के गाँवो में लोगों को अपने बच्चों को उसके साथ भेजने से मना कर दिया..!"

"फिर..एक दिन मधुपुर का बिरजू घायल अवस्था में कैसे भी गाँव तक पहुँचा और सच्चाई बयां कर दी।सच सुनकर गाँव वालों ने शोर मचा दिया। पुलिस को भी कार्रवाई करनी पड़ी।सबको गिरफ्तार करके जेल भेज दिया।

"और यह तीनों..?

"गाँव वालों ने बँगले को आग लगा दी।यह तीनों जान बचाने के लिए भागे।गाँव वालों को पीछे आता देख झुमरी तालाब में कूद गई और डूबकर मर गई। दीना और उसके बेटे को पीट-पीटकर मार डाला।बस एक गलती सबसे हुई कि उनके शरीर को वहीं जंगल के छोड़ दिया..!"

"इसलिए आत्माएं भटक रहीं हैं..!"नील बोला।

"बाबूजी भटक ही नहीं रही बल्कि शहर वाला यहाँ कुछ करने आए तो उसके पीछे पड़कर अपनी मौत का बदला लेती हैं।अगर गाँव वाला कोई गलती से रात को जंगल में मिल जाए तो डरा-डरा के पागल कर देती थी लेकिन अब मार देती हैं..!"

"साब इसलिए कहे थे यहाँ कुछ करने की मत सोचो ।हम सब तो सीमा मंत्र-तंत्र से सील करवाए हैं।तो गाँव के अंदर सुरक्षित हैं..!"

"सेवाराम यह समस्या का समाधान नहीं है।कभी न कभी तो गाँव का सुरक्षा घेरा कमजोर होगा तब क्या करोगे..?"सुधांशु भी अब इन बातों पर विश्वास करने लगा था।

सुधांशु की बात सुनकर नील बोला।"हाँ मुखिया जी ऐसे तो इन आत्माओं की शक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती नहीं जाएगी..?मैंने नानाजी के यह बात सुनी थी कि अगर अतृप्त आत्माओं का सही से अंतिम संस्कार किया जाए तो वह फिर परेशान नहीं करती।अगर ऐसा नहीं करते तो आगे चलकर प्रेत योनि में प्रवेश कर जाती हैं,तब वो सबके लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकती हैं..!"नील ने कहा।

"तो फिर हमें क्या करना चाहिए..?"मुखिया ने प्रश्न किया।

"यह तो कोई तंत्र मंत्र का जानकर ही बता सकता है।आप लोग किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हो तो फिर चलो मिलकर पूछते हैं।वही कोई समाधान बताएंगे..!"

"अगर कोई गड़बड़ हुई तो..?"

"तो इस डर से आप निर्दोषों को मरते हुए देखते रहोगे।कल को गाँव वालों के साथ ही अप्रिय घटना घटने लगी तब भी आप हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहोगे..?"

"मुखिया जी इन लोगों की बात काफ़ी हद तक सही है।अब वो आत्माएं गाँव वालों को भी नुकसान पहुँचाने लगीं हैं।

"ठीक है फिर.. पहले गाँव वालों से इस विषय पर चर्चा करनी होगी।उनको साथ लेकर ही कुछ करना संभव होगा..!"

मुखिया जी शाम को पंचायत में अपनी बात रखते हैं। अधिकतर लोगों की राय नील के पक्ष में थी कुछ लोग अभी भी डर रहे थे।

"हम तो सालों पहले ही बोले रहे कि इन्हन का अइसे मत छोड़ो वरना भूत बनकर सतावेंगे।हमाईं बतिया सच हो गई। चलों पहाड़ी वाले बजरंग बाबा के पास,वही तोड़ ढूँढेंगे..!"भीड़ में से एक बुजुर्ग बोला।

"चलो..!"सब मिलकर काली पहाड़ी पर बने बजरंग बाबा के आश्रम पहुँच गए। और उन्हें सारी समस्या से अवगत कराया।

समस्या जानकार बजरंग बाबा बोले। बात इस हद तक बढ़ गई तब समझ आई यह बात..?"पहले ही कहा था गाँव की सीमाओं का बंधेज करके कुछ नहीं होगा मेरी बात मानकर अंतिम संस्कार कर आत्मा शांति का पूजन कर दो...!"

"आप यह सब जानते थे तो फिर आपने ही कुछ क्यों नहीं किया..?यूँ चुपचाप अपने तंत्र साधना क्यों करते रहे..?"नील ने पूछा।

"बेटा जंगल में कहाँ क्या कांड हुआ,यह मैं कैसे जानूँ..? इन्होंने जो कहा,जो बताया,उस आधार पर मैंने तंत्र मंत्र से सीमाएं बाँध दी। फिर भी कहा था कि यह काफी नहीं है।पर इन्हें लगा शायद दक्षिणा के लालच में मै यह सब कह रहा हूँ..!"

"गलती हो गई बाबा जी..! पर अब आप ही कोई उपाय बताएं...?"मुखिया जी बोले।

"मैं क्या उपाय बताऊँ..?पहले से ही कह रहा हूँ कि उनके कंकाल ढूँढों और फिर विधिवत दाह संस्कार विधि सम्पूर्ण करो।उनकी आत्मा की शांति के लिए पाठ करवाओ तभी मुक्ति मिलेगी..!"

"पर इस काम को करने में कोई खतरा पैदा हुआ तो..?अगर उन आत्माओं ने नुकसान पहुँचाने की कोशिश की तो..?"

"मुखिया तू पहले यह तय कर कौन इस काम के लिए तैयार हैं..!"

"मुखिया जी दो तो हम लोग हैं। बाकी आप देख लो..!"नील सुधांशु बोले।

"मुखिया जी हम भी तैयार हैं..!"भीड़ में से दो तीन लोग और बोले।

"ठीक है,फिर वह लोग भी सामने आएं, जिन्होंने इस काम को अंजाम दिया था।सही जगह वही बता सकते हैं..!"

नील और सुधांशु को मिलाकर गाँव से आठ लोग  लोग तैयार हो गए। बजरंग बाबा ने उन सबकी कलाई पर अभिमंत्रित धागा बाँध दिया।

मुखिया तुम कुछ लोगों को और साथ में लेलो।और हाँ गंगाजल,घी और कुछ जलती हुई मशालें साथ में रखना..!"

सुबह होते ही पच्चीस लोगों की भीड़ जंगल के लिए निकल गई।जो अच्छे तैराक थे उन्हें तालाब के तल में झुमरी का कंकाल ढूँढने के लिए काफी मेहनत मशक्कत करनी पड़ी।बहुत कोशिशों के बाद उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें झुमरी का कंकाल मिल गया।

"मुखिया जी झुमरी का कंकाल मिल गया..!"गुलाब सिंह चिल्लाया।

"कैसे पता यह झुमरी है..?"मुखिया जी बोले।

"भूल गए मुखिया जी? झुमरी का दाया हाथ टूट गया था।तुम्ही तो दीना के साथ उसे शहर में भर्ती कराए थे और उसके हाथ में हड्डी की जगह सरिया पड़ा बताए रहे..?"

"ओह हाँ फिर तो यह झुमरी ही है।यह देखो सरिया उसी हाथ में है..!"

समय के साथ आँधी-बारिश और धूल मिट्टी के नीचे दीना और राजू के कंकाल दफन हो गए थे। काफी खोदने पर उनके भी कंकाल मिल गए।

एक विशाल घेरे के अंदर तीनों कंकालों को चिता पर रखकर बजरंग बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और उन कंकालों के ऊपर गंगाजल छिड़का, वैसे ही जंगल में चारों ओर से भयानक से आवाज आने लगी। हवाएं जोर-जोर से चलने लगी।

सब घेरे के अंदर आ जाओ।जल्दी करो,कोई भी बाहर ना रहे।मुखिया मशालें जलाओ..! बजरंग बाबा चिताओं के चारों ओर चक्कर लगाकर मंत्र पढ़ते रहे।भर्राती हुई, चीखती हुई आवाजें भयभीत कर रहीं थीं।

अचानक धूल भरी आँधी चलने लगी।"चिताओं को आग लगाओ,क्षण भर भी देरी मत करो..!" बजरंग बाबा का मंत्र पढ़ना बंद हो गया था।उनका आदेश सुनते ही चिता को आग लगा दी गई।

"हुंहुंहुहुहुं, आहहहहह, ईईईईईईई, नहीं बचोगे, नहीं बचोगे..की चीखें धीरे-धीरे शांत होने लगी थीं। धूल छट गई,हवा भी हल्की बहने लगी। झुमकी,दीना और राजू की आत्मा को शांति मिल गई थी।

"चलो छुटकारा मिला..!"मुखिया बोले।

"नहीं मुखिया.. अभी कुछ और बाकी है। बजरंग बाबा बोले।

"क्या बाबाजी..?'

"यह जो घेरा बना देख रहे हो?इसको चारों और यह अभिमंत्रित कीलें ठोक दो।कल सुबह इन अस्थियों को पास की नदी में प्रवाहित कर देना।बस फिर सब शांति हो जाएगी..!"

सब गाँव लौट आए।

"अब हमें इजाजत दीजिए मुखिया जी..!"

"ऐसे कैसे इजाजत दे दें..? इतना बड़ा काम कराए हो,तो खातिरदारी का मौका तो देओ..!"मुखिया ने एक दिन और रुकने के लिए मजबूर कर दिया।

"नील अब हमें चलना चाहिए..!"दूसरे दिन सुधांशु ने कहा।

"नहीं फिर से शाम होने वाली है।मैं इस समय चलने के लिए तैयार नहीं..!'श्रुति डरते हुए बोली।

"अरे अब सब ठीक हो गया है श्रुति। और देख अब हमारे सबके हाथ में अभिमंत्रित धागा भी है। और देख गाड़ी को.. बजरंग बली की छोटी सी मूर्ति,वो गोमती भाभी ने दी है।अब जब बजरंगी साथ है तो फिर डर कैसा..?"

नील की बात सुनकर श्रुति मुस्कुरा उठी।

"चलो तुम नहीं मानोगे,पर क्या करूँ उस दिन का हादसा भुलाए नहीं भूलता..!"

"नील पहले ही पीछे बैठ जा। कहीं फिर से जंगल में गाड़ी रोकनी पड़ी तो..?"

"सुधांशु..!"श्रुति चिल्लाई।

"मजाक कर रहा हूँ बाबा,बैठो अंदर..!"

"अभी प्रोजेक्ट का क्या सुधांशु..?"नील ने पूछा।

"छोड़ याररर इस बात को,पता नहीं और क्या क्या राज छुपे हों इस जंगल में..?हम अपने शहर में भले, क्यों श्रुति..?"

"हाँ सच्ची.. मैं तो अब कभी नहीं आऊँगी..!"गाँव वालों से विदा लेकर तीनों अपनी मंजिल की ओर निकल पड़े।

©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️ सर्वाधिकार सुरक्षित

चित्र गूगल से साभार


Tuesday, March 2, 2021

देशभक्त 'पगी' की कहानी


आप सभी को पढ़कर आश्चर्य तो होगा कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने अपनी एक बॉर्डर पोस्ट का नामकरण एक आम भारतीय नागरिक के नाम पर किया है..!पर यह बात बिल्कुल सत्य है।  सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने अपनी पोस्ट का नाम जिस आम व्यक्ति के नाम पर रखा,वह आम आदमी थे रणछोड दास रेबारी..!

उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास रेबारी का नाम दिया गया है।बीएसएफ के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी आम आदमी के नाम पर किसी पोस्ट का नाम रखा गया है। इतना ही नहीं, बीएसएफ उस पोस्ट पर उनकी एक प्रतिमा भी लगाने की तैयारी कर रही है।

अब आपको रणछोड़ दास रेबारी जी के बारे में भी बता देते हैं।रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गाँव में रहते थे।भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय पेथापुर गथड़ो पाकिस्तान में चला गया है। 

रणछोड़ दास जी के पिताजी पशुपालन तथा ऊँट चराने का काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण किया करते थे।रणछोड़ दास भी बचपन से ही पिता के साथ ऊँटो पर बैठना, ऊँट को चराना, ऊँटनियों का दूध दुहना, भेड़े चराना जैसे पशुपालन के कार्य सीखने लगे थे।

रणछोड़दास जी के हृदय में बचपन से ही देशप्रेम की भावना कूट -कूट कर भरी थी।उन्हें यह संस्कार अपने पिताजी से विरासत मिले थे। एक दिन पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर रणछोड़ दास जी अपने देश बनासकांठा (गुजरात) में जाकर बस गए।

विभाजन के बाद से ही भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच स्थिति हमेशा तनावपूर्ण  बनी रहती थी।सीमा पर बढ़ते इस तनाव के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच सन 1965 में युद्ध जैसी स्थिति बन गयी और दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के विरुद्ध आमने-सामने खड़ी हो गयी हैं।

पाकिस्तानी सेना ने 1965 में भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट पोस्ट पर कब्जा कर लिया। इस बात को लेकर शुरू हुई जंग में हमारे सौ सैनिक शहीद हो गए थे। पाकिस्तानी सेना का मुकाबला करने के लिए सेना की दूसरी टुकड़ी को तीन दिन में छारकोट पहुँचना था।

भारतीय सेना को रेगिस्तानी रास्तों की जानकारी नही थी और ऊपर से पाकिस्तानी सेना वहाँ पहले से ही तैनात थी।छारकोट पहुँचना भारतीय सेना के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था।तब इस संकट की घड़ी में रेगिस्तान के चप्पे-चप्पे से वाकिफ रणछोड़ दास रेबारी जी ने भारतीय सेना की बहुत बड़ी मदद की और पूरी सेना को तय समय से 12 घंटे पहले मंज़िल तक पहुँचा दिया था।

रणछोड़ दास जी ने सेना के संग रहकर रेगिस्तानी इलाकों में न सिर्फ भारतीय सेना मार्गदर्शन किया बल्कि उन्होंने 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के छुपने के स्थान की जानकारी भी भारतीय सेना तक पहुँचाकर सेना की सहायता की थी।

रणछोड़ दास रेबारी ने बहुत ही गुप्त तरीके से इस काम को अंजाम दिया था।युद्ध के समय रेबारी जी बोरियाबेट से ऊँट पर सवार हो पाकिस्तान की ओर गए और घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे।पाकिस्तानी सेना को उन्होंने इस बात की जरा सी भी भनक तक नहीं लगने दी।

रणछोड़ दास जी पाकिस्तान में रह रहे रिश्तेदारों तथा आस-पास के ग्रामीणों से पाकिस्तानी सेना की खोज-खबर निकाल कर सेना तक पहुँचाते रहे। उनके सहयोग के कारण ही हमारी सेना पाकिस्तानी सेना के एक बड़े हमले की साजिश को नाकाम करती रही।

1971 के युद्ध में सेना के मार्गदर्शन के साथ साथ अग्रिम मोर्चे में गोला-बारूद खत्म होने पर  रणछोड़ दास जी अपने ऊँटों के जरिए से भारतीय सेना को गोला-बारूद तथा भोजन सामग्री पहुँचाने में मदद करते रहे।

रणछोड़ दास जी के सहयोग और भारतीय सैनिकों की वीरता ने युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दाँत खट्टे कर दिए थे‌।पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के  आगे अपने घुटने टेक दिए। इस तरह युद्ध में भारत की विजय हुई और भारतीय सेना ने विजयी परचम फहरा दिया । 

रणछोड़ दास रेबारी जी को उनके सहयोग और देशभक्ति की भावना को देखते हुए 58 वर्ष की आयु में बनासकांठा के पुलिस अधीक्षक वनराज सिंह झाला ने उन्हें पुलिस के मार्गदर्शक के रूप में रख लिया था क्योंकि रणछोड़ दास जी रेगिस्तान के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थे।वह ऊँट के पैरों के निशान देखकर यह बता देते थे कि उस पर कितने आदमी सवार थे और इंसान के पैरों के निशान देख कर वजन से लेकर उम्र तक बता देते थे।यहाँ तक कि निशान कितनी देर पहले का है, और वह कितनी दूर तक गया होगा?इस सबका सटीक आंकलन किया करते थे।

अपनी इसी विलक्षण प्रतिभा के कारण रणछोड़ दास'पगी' के नाम से मशहूर हो गए थे।'पगी' यानी रास्ता दिखाने वाला।सेना को युद्ध के समय रास्ता दिखाने और मार्गदर्शन करने के कारण ही भारतीय जनरल मानेक शॉ रणछोड़ दास को "पगी" के नाम से पुकारते थे।

रणछोड़ दास रेबारी के देश की सेवा और समर्पण की भावना के कारण उन्हें जनरल मानेक शॉ द्वारा भारतीय सेना के मार्गदर्शक के रूप में "पगी" के पद पर नियुक्त कर लिया और रणछोड़ "पगी" के रूप में पुकारे जाने लगे ।भारतीय सेना मदद के कारण रणछोड़ दास जी जनरल मानेकशॉ के दिल के बेहद करीब हो गए थे। 
मानेकशॉ बहुत कम लोगों को अपने साथ डिनर पर आमंत्रित करते थे।एक बार मानेकशॉ जी ने उन्हें डिनर पर आमंत्रित किया।रणछोड़ दास'पगी' के वे बहुत दीवाने थे।उन्होंने रणछोड़ दास जी को लाने के लिए एक हेलीकाप्टर भी भेजा।

हेलीकॉप्टर जब रणछोड़ दास को लेकर उड़ान भरने लगा तो रणछोड़ दास को याद आया कि वे अपनी थैली नीचे ही भूल गए हैं। उनके कहने पर हेलिकॉप्टर को पुनः नीचे उतरवाया गया और फिर थैली लेकर वापस हेलीकॉप्टर से उड़ान भरी। सुरक्षा नियमों के चलते थैली देखी गई तो उस थैली में दो रोटी,एक प्याज तथा बेसन का एक पकवान था।जिसे जर्नल मानेक शॉ को बड़े चाव से खाते देख सब दंग रह गए ।

अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में भी मानेक शॉ रणछोड़ दास जी को नही भूले थे।वे अक्सर चेन्नई के वेलिंग्टन अस्पताल में बार-बार "पगी" का नाम लेते रहते थे।डॉक्टर के पूछने पर जनरल मानेकशॉ ने उन्हें रणछोड़ दास रेबारी जी की पूरी कहानी सुनाई, जिसे सुनकर सभी डॉक्टर्स अचंभित रह गए।सन 2008 में 27 जून को मानेक शॉ का निधन हो गया। 

रणछोड़ दास जी की राष्ट्र के प्रति अटल भक्ति तथा समर्पण के भाव के कारण उनको राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया।इसके अलावा रणछोड़ जी को सेना के वीरता पुरुस्कार सहित अनेक पुरुस्कार प्रदान किये गए ।सन् 2009 में रणछोड़ दास जी ने भी सेना से ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ ले ली थी।

क्या आप जानते हैं..? सेवानिवृत्ति के समय रणछोड़ दास 'पगी' की उम्र 108 वर्ष थी।यह सुनकर भी आप सभी को आश्चर्य हो रहा होगा.?पर यही सत्य है.!
108 वर्ष की उम्र में रणछोड़ दास जी ने अपनी स्वेच्छा से 'सेवानिवृत्ति' ली,और सन् 2013 में 112 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया‌।

रणछोड़ दास जी भारत में एक शरणार्थी की तरह आये थे,लेकिन अपनी देशभक्ति, वीरता, बहादुरी, त्याग, समर्पण, शालीनता के कारण भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए तथा भारतीय समाज पर अपनी अमिट छाप छोड़ गए।

रणछोड़ दास जी के जीवन से जुड़ी जानकारियाँ हम सभी को देश के प्रति प्रेम और समाज की सेवा करने को प्रेरित करती हैं।रणछोड़ दास जी अंतिम समय तक सादगी,शालीनता,जीवनयापन करते रहे।आज भी काफी लोग इतने बड़े देशभक्त रणछोड़ दास रेबारी जी को नहीं जानते। देश के इस सच्चे भक्त को मेरा शत् शत् नमन,जय हिन्द।
***अनुराधा चौहान*** ✍️

चित्र गूगल से साभार
रणछोड़ दास रेबारी जी के बारे में जानकारी 'गूगल'स्रोत' से इकट्ठा की गई हैं।

Tuesday, February 16, 2021

आशीर्वाद


 "नीरा बेटा आज का न्यूज पेपर कहाँ हैं..?"निर्भय सिंह की आवाज सुनकर नीरा चाय के साथ अखबार लेकर ससुर जी के कमरे की और दौड़ी।"यह लीजिए पापा जी आपकी चाय और आज का अखबार..!"

"हम्म रख दो ललित निकल गया..?"

"जी पापा जी..!" नीरा ने जवाब दिया।

"कुछ कहकर गया कब आएगा..?"

"नहीं कुछ नहीं..!" नीरा सिर झुकाए बोली।

"ठीक है जाने दे उसे, तुम्हें उसके आगे झुकने और उससे डरने की कोई जरूरत नहीं है..!"

"पर पापा जी..?"

"पर वर कुछ नहीं जाओ और कॉलेज जाने की तैयारी करो, तुम्हें हर हाल में पढ़ाई पूरी करनी है समझी..?"निर्भय नीरा को आदेश देकर अखबार लेकर पढ़ने लगे।

"जी पापा जी..!"

निर्भय सिंह शहडोल जिले के समीप एक छोटे-से कस्बे के हाईस्कूल में प्रिंसिपल थे।जीवनभर जो भी कमाया,बेटे का जीवन संवारने में लगा दिया। पत्नी कांता दस वर्ष पहले ही साथ परलोक सिधार गईं थीं।

नीरा उनके मित्र बलदेव सिंह की बड़ी बेटी थी। ललित से उसकी शादी ललित की ही गलती का नतीजा था।

बलदेव का घर दुल्हन की तरह सजा हुआ था।आज बेटी की बारात जो आनी थी।

"आओ निर्भय सिंह..!" बलदेव ने आगे बढ़कर निर्भय का स्वागत किया।

"ललित... बेटा यह तुम्हारे बलदेव अंकल, प्रणाम करो इन्हें..!" निर्भय सिंह ने आदेश दिया।

ललित ने झुककर पैर छुए तो बलदेव ललित को आशीर्वाद देते हुए कहा।"अरे बस बस खुश रहो.. कैसे हो? क्या कर रहे हो आजकल..? बहुत छोटे-से थे ,जब तुम्हें देखा था। 

"कल ही पढ़ाई पूरी करके लंदन से आया है।अब यही रहकर, कुछ दिन नौकरी फिर अपना कारोबार शुरू करने की सोच रहा है.."निर्भर बोले।

निर्भय भी अपने मित्र की शादी के इंतजाम देखने में मदद करने लगे। ललित को अनजान लोगों के बीच बड़ा अजीब लग रहा था।

शाम को तय समय पर शादी की रस्में शुरू हो गई थीं। सभी खुशी-खुशी बारातियों के स्वागत में लगे थे।तभी एक गलतफहमी पैदा हो गई।

दोस्तों के कहने में आकर दरवाज़े की रस्म में लड़के ने मजाक में कार की डिमांड कर दी। बलदेव सिंह यह सुनकर चौंक गए।

"यह कैसी शर्त है समधी जी..? हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। लेन-देन की सारी बातें तय करने के बाद यह अचानक..?"बलदेव आगे कुछ कह पाते ललित बीच में बोल पड़ा।

"अंकल जी हम लोग इन दहेज लोभियों की माँग आसानी से मान लेते हैं इसलिए ऐसे लोगों का लालच बढ़ता ही जाता है"आप इनके हाथ जोड़ने की जगह पुलिस में शिकायत कीजिए..!"

"तुम शांत रहो ललित.. निर्भय अपने बेटे को शांत करो.."समधी जी आइए हम बैठकर बात करते हैं। बलदेव हाथ जोड़ते हुए बोले।

"ललित चलो यहाँ से.."निर्भय सिंह ललित को वहाँ से ले जाने लगे।

"पर पापा यह तो गलत हो रहा है।यह देखकर भी आप लोग मुझे क्यों रोक रहे हो..? ललित हाथ छुड़ाते हुए बोला।

कुछ ग़लत नहीं है ललित, अपने यहाँ इस तरह के मौके पर नेग के लिए छोटी-मोटी ज़िद, हँसी-मजाक शादियों में होते रहते हैं।यह भी कुछ ऐसा ही है।तुम काफी समय से बाहर रहे हो इसलिए तुम्हारे लिए सब नया है..निर्भय बोले।

पर ललित का हस्तक्षेप करना लड़के वालों को पसंद नहीं आया।

"बलदेव सिंह जी अपने दरवाजे पर एक छोटे से मजाक के लिए इस तरह का अपमान..?यह लड़का कौन है जो हमें पुलिस की धमकी दे रहा है..?यह तय करेगा हम शादी कैसे करें..?"लड़के वाले नाराज होने लगे।

बात पर बात धीरे-धीरे वाद-विवाद में बदलने से पहले ही बड़े-बुजुर्गों ने बात संभालने की कोशिश शुरू की तभी ललित फिर बोल उठा।

"अंकल माफी क्यों माँगनी..?अगर यह एक मजाक था तो मुझे भी गलतफहमी हो गई थी। इतनी-सी बात का इश्यू बनाने की क्या जरूरत..?अगर इतना मन साफ है तो करलें बिना दहेज शादी..!!" ललित बोला।

"बिना दहेज क्या,अब अगर दरवाजे पर गाड़ी भी खड़ी करदो तो भी यह शादी नहीं होगी..!!बारात वापस ले चलो..!"बलदेव की लाख कोशिशों के बावजूद बारात वापस लौट गई।

"निर्भय सिंह तेरे बेटे के विदेशी संस्कार ने मेरी बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी। बड़ी बहन की बारात लौट गई तो छोटी बेटियों से कौन शादी करेगा..?"बलदेव सिंह पकड़ कर बैठ गए।

"बलदेव मैं मानता हूँ कि ललित ने बहुत बड़ी गलती की है।अब गलती हुई है तो उसकी भरपाई भी वही करेगा..!"

"मैं..? कैसे..? ललित ने पूछा।

"इसी मंडप में नीरा से शादी करके...!" निर्भय ने अपना फैसला सुना दिया।

यह सुनकर सभी निर्भय की बात का समर्थन करने लगे। ललित की मर्जी के खिलाफ उसका विवाह नीरा के साथ सम्पन्न हो गया।

निर्भय जानते थे कि सर्वगुण संपन्न नीरा की पढ़ाई उसकी वैवाहिक जीवन की सबसे बड़ी बाधा है। ललित बारहवीं पास नीरा को कभी मन से नहीं अपनाएगा इसलिए उन्होंने शादी होते ही नीरा की पढ़ाई शुरू करवा दी।

समय पंख लगाकर उड़ता रहा।नीरा भी धीरे-धीरे ललित के मन में अपने लिए जगह बनाने में कामयाब हो गई।

"पापा जी मेरी एमबीए की डिग्री,मेरा आगे पढ़ने का सपना सिर्फ और सिर्फ आपके आशीर्वाद से ही संभव हो पाया है..!"निर्भय को डिग्री सौंपते हुए नीरा ने उनके पैर छुए।

निर्भय की प्रेरणा से नीरा ने बीकॉम करके एमबीए की डिग्री हासिल कर ली और शहडोल में ही एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करने लगी।

"पापा आपके सटीक निर्णयों के कारण मेरा भविष्य मजबूत हुआ।मुझे नीरा जैसी समझदार और संस्कारी जीवनसाथी मिली। आपकी वजह से आज नीरा का भी सपना पूरा हुआ।सच कहते हैं सब कि बच्चों के सिर पर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद होना बहुत जरूरी है।..!"ललित ने कहा

"तुम दोनों को खुश देखकर मैं भी बहुत खुश हूँ। ललित आज भी समाज में बहू बेटी को लेकर हर किसी की सोच अलग है।कुछ आज भी उन्हें दबाकर रखना चाहते हैं तो कुछ उनकी तरक्की में बाधक बन जाते हैं।और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मेरी तरह उन्हें आगे बढ़ाना चाहते हैं इसलिए तुम दोनों भी एक बात मेरी हमेशा याद रखना...

"क्या पापा..?" ललित ने बीच में ही पूछा।

"कभी भी किसी भी घटना की पूरी वजह जाने बिना किसी की भी ज़िंदगी में हस्तक्षेप मत करना।हम भाग्यशाली हैं जो नीरा हमारे घर आई।यह कभी सोचा तुमने..? अगर उस समय तुम भी शादीशुदा होते तो सोचो बलदेव और नीरा उस परिस्थिति का कैसे सामना करते..?"निर्भय बोले।

"गलती तो हुई थी पापा..पर शायद ईश्वर भी यही चाहते थे कि मेरा और नीरा का रिश्ता जुड़े..!"ललित ने कहा।

"हम्म शायद..उस समय ना तुमने मौके की नज़ाकत को नहीं समझा और ना ही लड़के वालों ने बलदेव की विवशता और तुम्हारी नासमझी को, सबके दबाव डालने पर, हाथ जोड़ने पर यह शादी हो भी जाती तो नीरा को उस घर में कभी सम्मान नहीं मिलता..! निर्भय नीरा को देखते हुए बोले।

"आपकी बात सही है पापा..!"नीरा चाय का कप पकड़ाते हुए बोली।

ललित अब कभी आवेश में आकर ऐसा कुछ नहीं करना। ज़िंदगी में सदा नारी का सम्मान करना। तुम्हारी हर गलती पर हमेशा मैं बात संभाल सकूँ यह संभव नहीं..!"कहते हुए हँस पड़े निर्भय। उन्हें हँसता देख नीरा भी हँस पड़ी।

©® अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️ 

चित्र गूगल से साभार



Friday, January 22, 2021

पुरानी यादें


राधा तूने सायली के लिए आया इतना अच्छा रिश्ता क्यों ठुकरा दिया..? जानती नहीं कितने बड़े लोग हैं वो,बड़ा कारोबार है उनका, उन्हें घर संभालने वाली बहू चाहिए थी। बिना लेन-देन के शादी के लिए तैयार थे वो लोग,सायली को नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ता,वहाँ जाकर राज करती राज..! ममता ने अपनी छोटी बहन से कहा।

अरे दी..आप भी कहाँ-कहाँ से रिश्ते ढूँढकर भेजती रहती हो.. मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूँ, मैं किसी कारोबारी के घर अपनी बेटी नहीं ब्याहने वाली, मेरी बेटी सपने साकार करने के लिए पैदा हुई है दी, घुट-घुटकर मरने के लिए नहीं..!

राधा यह सिर्फ मन बहलाने वाली बातें हैं।पैसा है तो सब-कुछ है।बेटी की ज़िंदगी संवर जाएगी समझी..!जरा सोच,तू ढूँढकर ला पाएगी ऐसा लड़का..? और फिर तेरे पास दहेज देने के लिए क्या है..? ममता ने पहले थोड़ा समझाते और बड़ी बहन के हक से डाँटते हुए कहा।


राज करने के लिए तो मेरा भी ब्याह बड़े कारोबारी से किया था दी..? क्या हुआ फिर यह तो सब आप जानती ही हैं..?अगर पिताजी ने पढ़ाई पूरी करने दी होती तो आज परिस्थिति कुछ और होती..!


राधा तू पुराने दुखड़ा मत सुनाया कर,यह सब तो नसीब का खेल है।जो तेरे साथ हुआ जरूरी नहीं सायली के साथ हो..? उस बात को लेकर सोने जैसा लड़का ठुकरा रही है..!


मेरी बेटी एक हीरा है दी अपनी ज़िंदगी खुद रोशन कर सकती है।हमेशा पढ़ाई में अव्वल रही और नौकरी भी उसे बहुत अच्छी कम्पनी में मिली है। पैसे से सुख नहीं मिलता दी आपसी प्रेम और समझ-बूझ से मिलता है।सायली को लड़का भले ही छोटी नौकरी करने वाला मिले, दोनों मिलकर साथ कमाएंगे तो ज़िंदगी अपनी मर्जी की जियेंगे..! राधा बोली।


ऐसी ज़िंदगी में क्या सुख है राधा जरा बता..? और फिर घर और ऑफिस संभालना आसान नहीं होता राधा।तू खुद सायली की कमाई पर जी रही है।पर शादी के बाद तेरा क्या होगा, कुछ सोचा है..?


सोचना क्या है दी..जब संघर्ष करते ज़िंदगी बीती है तो आगे की भी बीत जाएगी..!


जैसी तेरी मर्जी, मुझे क्या..आज देवेन्द्र जी होते तो बेटी यूँ घर न बैठी होती। मैं फोन रखती हूँ ,जब तू सायली की शादी तय कर लेना तो बुलावा भेज देना..!


अरे दी..हेलो हेलो दी..?हो गई नाराज..!यह दी भी ना..जानती नहीं क्या मेरे साथ क्या क्या हुआ था..? कितने सपने लेकर ससुराल आई थी।सब कहते थे पैसे वाले लोग हैं,राधा राज करेगी‌..!क्या खाक राज किया..हुंहहू राधा मुँह टेढ़ा कर बीते दिनों को याद करने लगी।


देवेन्द्र अब सारा काम राधा कर लेगी, तुम नौकरानी का हिसाब कर दो,चार लोगों के लिए नौकरानी की क्या जरूरत..?माता जी ने मातृभक्त बेटे को आदेश दिया।
जी माता जी..कल ही हिसाब कर देता हूँ.. देवेन्द्र ने जवाब दिया।


बड़े घर में राज जो शुरू हो गया था।मेरे आते ही नौकरानी गायब,ऊपर से देवर जी की फरमाइशें, भाभी जी यह चाहिए वो चाहिए। कपड़े पर कैसी इस्त्री की है..?आने दो भईया को उनको दिखाता हूँ आप कैसा व्यवहार करती हो.. नागेन्द्र की उद्दंडता पर माता जी चुप रहती थी।


देवर जी इतना चिल्लाने की जरूरत नहीं है। मुझे जैसी बनी मैंने कर दी, आपको नहीं पसंद तो बाहर करा लीजिए..!राधा के इतना कहने पर माता जी ने घर छोड़कर जाने की धमकी दे डाली। फिर जो तांडव मचा, उसने राधा के होंठ सी दिए।


चुपचाप घरवालों की गुलामी करती राधा को खुद के लिए जीने का समय नहीं मिलता था..!देवेन्द्र अपने कारोबार की सारी कमाई माता जी को सौंप अपना धर्म निभाते रहे। 
नागेन्द्र की पढ़ाई पूरी होते ही नागेन्द्र भी कारोबार में हाथ बंटाने लगे। देवेन्द्र की पहचान के कारोबारी  की लड़की से नागेन्द्र की शादी हो गई। राधा सोचती रह गई कि देवरानी के आने से उसका भार कम होगा,पर बड़े घर की बेटी पर माता जी के कृपा दृष्टि पड़ चुकी थी।


देवेन्द्र आप अब कुछ पैसे सायली के लिए भी जमा किया कीजिए,आगे उसकी पढ़ाई और शादी में काम आएंगे..!
क्यों कुछ कमी है तुम्हें, सायली की जरूरतों पर मैं ध्यान नहीं दे रहा..?या माता जी सब ठीक से मेनेज नहीं कर पा रही हैं क्या..? बोलो..? अगर ऐसा है तो मैं अभी उन्हें कह देता हूँ, तुम्हें घर की मालकिन बना दें.…! देवेन्द्र उखड़े अंदाज में बोले।


मेरा वो मतलब नहीं था।बस सायली के भविष्य की चिंता सता रही थी।आपको जो सही लगे कीजिए, मैं अब नहीं बोलूँगी।अगर आप कुछ पैसे तो अलग से दे सकें तो?सायली छोटी बच्ची है, स्कूल जाते समय कुछ माँग देती है तो और फिर स्कूल में रोज कुछ न कुछ खर्च लगा रहता है। माता जी को बार-बार परेशान करना अच्छा नहीं लगता..!


देवेन्द्र को यह बात समझ आ गई तो चुपचाप राधा को हर महीने सायली की फीस और स्कूल में होने वाले ऊपरी खर्चों के लिए राधा को दस हजार रुपए देने लगे। देवेन्द्र ने इस बात का जिक्र घर में नहीं किया और ना ही राधा ने किया।


राधा बचे पैसों को जमा करती रही।देवेन्द्र सब-कुछ माता जी को सौंपकर बेटी और पत्नी और अपने भविष्य को नजरंदाज करते रहे, अंत में मिला क्या..? देवेन्द्र के जाते ही देवर ने सारा कारोबार अपने कब्जे में कर लिया।


फिर वहीं हुआ जिसके लिए राधा हमेशा ही टोकती थी।मालिक बनते ही देवर का व्यवहार बदल गया। तिजोरी की चाबी अब देवरानी के साथ आ गई थी।उसे राधा और माता जी बोझ लगने लगे थे, घर में दो वक्त की रोटी भी शांति से नसीब नहीं थी।


पैसे चाहिए क्यों भाभी..?सायली की पूरे साल की फीस तो हम भर ही चुके हैं, स्कूल यूनिफॉर्म आ गई, पुस्तकें आ गईं अब और क्या चाहिए..?आपको पैसे की क्या जरूरत है.? नागेन्द्र ने कहा।


ज़िंदगी में सिर्फ यही जरूरत नहीं होती देवर जी।कई बातें बोली नहीं जा सकतीं और फिर मैं तुमसे कहाँ कुछ माँग रही हूँ।यह बिजनेस मेरे पति ने खड़ा किया था यह तो हमारा हक है।अब राधा की सहनशक्ति जवाब देने लगी थी।


तो लो संभाल लो बिजनेस..दो दिन में डूब जाएगा और तुम रास्ते पर आ जाओगी।यह लो पैसे पाँच हजार की गड्डी सामने फेंक नागेंद्र चला गया। माता जी की आँखें छलछला आईं।
राधा बहू मेरा बक्सा उठा लाओ..!


जी माता जी.. राधा अंदर से माता जी का बक्सा ले आई।यह लीजिए माता जी..!


माता जी को राधा हमेशा ही बड़े कठोर हृदय का समझती थी क्योंकि वो सुलूक ही ऐसा करतीं थीं।माता जी ने बक्सा खोलकर अपने जेवर राधा को दिए,इसे सायली के लिए रख लो बहू,अब सब कुछ बदल गया, मेरे हाथ में कुछ नहीं रहा..! मेरा देवेन्द्र तो राम था..! और यह पेपर संभालकर रख लो।यह हमारे पुराने घर के पेपर हैं जो मैंने नागेन्द्र के रंग देखकर देवेन्द्र के नाम कर दिया था।यह सिर्फ मैं और देवेन्द्र ही जानते थे..!


राधा की आँखें भर आईं.. आपने मुझे सिर पर छत दे दी वही बहुत है माता जी..! माता जी के पैरों में सिर रखकर सिसकने लगी।


रोज-रोज के क्लेश से आहत माता जी भी चल बसीं। माता जी के जाते ही राधा ने भी वो घर छोड़ दिया और पुराने घर में रहने चली आई।अब नागेन्द्र ने सायली की पढ़ाई के लिए पैसे देने बंद कर दिए।राधा ने जो भी जमा पूंजी और कुछ अपने गहने गिरवी रखकर सायली को पढ़ाया।


सायली ने भी कभी निराश नहीं किया कॉलेज में स्कॉलरशिप मिल गई तो राधा का बोझ हल्का हो गया।सायली के जॉब लगते ही राधा की परिस्थिति में सुधार होने लगा था। मेरी सायली ऐसे घर में नहीं जाएगी जहाँ उसे किसी की गुलामी करनी पड़े,नहीं-नहीं बिल्कुल नहीं..राधा बड़बड़ाई।


माँ तू किस सोच में डूबी है..?सायली ने घर में घुसते ही पूछा।
अरे तू कब आई..?


अभी आई माँ..पर तुझे मेरी फिक्र कहाँ..?माँ की गोद में सिर रखकर लेटते हुए सायली ने कहा।बता क्या हुआ..? इतना टेंशन क्यों..?


तेरी मौसी ने एक रिश्ता भेजा था। बहुत ही पैसे वाले लोग थे। बिना दहेज शादी के लिए तैयार थे।पर शादी के बाद बहू से नौकरी करवाना उनकी शान के खिलाफ था.. मैंने ऐसे रिश्ते के लिए मना कर दिया तो मौसी नाराज हो गईं।


हो जाने दे माँ.. कुछ दिन की नाराज़गी है सब ठीक हो जाएगा। हमने पापा के जाने के बाद जो सहा वो किसी को कैसे महसूस होगा..? अगर आप मेरी पढ़ाई के लिए पैसे जोड़कर न रखतीं तो शायद मैं पढ़ भी ना पाती..तू चिंता मत कर माँ सब अच्छा हो जाएगा..सायली राधा से लिपटते हुए बोली।


सायली की बातों से राधा का मन हल्का हो गया।चल तू हाथ-मुँह धोकर आ, मैं खाना गरम करती हूँ.. राधा रसोई में जाते हुए बोली।


जी माँ..सायली कमरे में चली गई। राधा भी पुरानी यादों को झटककर किचन में खाना गरम करने लगी।
©® अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️
चित्र गूगल से साभार


Saturday, January 9, 2021

वीर सैनानी कनाईलाल दत्त


दादी माँ..!! आप क्या कर रही हो..? हर्ष और रूही गायत्री के कमरे में प्रवेश करते हुए बोले।

कुछ नहीं बेटा..बस अकेली बैठी बोर हो रही थी तो बस कुछ पुरानी तस्वीरें देखने लगी..!पर तुम दोनों इस समय..?

दादी माँ हमें नींद नहीं आ रही, मम्मी पापा से कहानी सुनाने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया..!

ओह..दिन भर ऑफिस में काम करके दोनों बहुत थक जाते हैं।आओ मेरे पास लेट जाओ,आज भारत के वीर सपूत कनाईलाल दत्त के बारे में बताती हूँ..!

वीर सपूत..?वो क्या होता है दादी माँ..?

वीर सपूत अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं पर अपनी भारत माता पर कोई आँच नहीं आने देते। अच्छा अब दोनों चुपचाप कहानी सुनो..!

यह कहानी है आजादी के मतवाले वीर कनाईलाल दत्त की..!

देश की आज़ादी के लिए मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूलने वाले खुदीराम बोस को तो सभी जानते हैं। खुदीराम बोस की तरह ही देश की आजादी के लिए सबसे कम उम्र में फाँसी पर चढ़ने वाले आज़ादी के दूसरे सिपाही थे कनाई लाल दत्त..! 

अंग्रेजी हुकूमत से अपने देश को आजाद कराने के लिए न जाने कितने युवक-युवतियों,बच्चे बूढ़े इन सभी ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया।आज हम चैन से जी पा रहे हैं तो इन्हीं वीरों के बलिदान के कारण..!

कनाई लाल दत्त भी उन्हीं वीरों में से एक थे। कनाईलाल का जन्म 30 अगस्त, 1888 को बंगाल में हुगली ज़िले के चंदन नगर में हुआ था।उनके पिता चुन्नीलाल बम्बई में ब्रिटिश सरकार के नौसेना विभाग में एकाउंटेंट थे और इस वजह से वह अपने परिवार को भी बम्बई ले आए‌। कनाईलाल दत्त की प्रारम्भिक शिक्षा बम्बई में हुई थी। 

बम्बई कहाँ है दादी माँ..?

मुंबई ही बम्बई है बच्चों,पहले हमारे मुंबई शहर को बम्बई नाम से जाना जाता था।कनाई लाल अपनी प्रारंभिक शिक्षा आर्य शिक्षा सोसाइटी स्कूल में पूरी करने के बाद वापस चंदन नगर लौट आए।वापस आकर उन्होंने हुगली के कॉलेज में दाखिला ले लिया।उसी दौरान उनकी मुलाक़ात प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय से हुई।

प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय से मुलाकात के बाद कनाईलाल दत्त की विचारधारा बदलने लगी।उनके क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव कनाई पर भी पड़ने लगा और उनके मन में ब्रिटिश हुकुमत को जड़ से उखाड़ फेंकने की लालसा ने जन्म ले लिया। 

कनाईलाल दत्त युगांतर पार्टी से जुड़ने के बाद और भी बहुत से क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।वह दौर‘बंगाल विभाजन’ का दौर था।अंग्रेजी हुकुमत ने बंगाल को बाँटने का फरमान जारी किया तो उनके इस फैसले के खिलाफ युवा क्रांतिकारियों ने आन्दोलन शुरू कर दिया।

कनाई लाल ने भी चंदननगर से आंदोलन का मोर्चा निकाला।कनाई लाल की क्रान्तिकारी गतिविधियो को देखते हुए कॉलेज ने उन पर ग्रेजुएशन की डिग्री रोकने का दबाव बनाया पर फिर भी वो रुके नहीं, अपने इरादों को मजबूत आगे बढ़ते गए।

कनाईलाल कोलकाता में बारीन्द्र कुमार घोष के घर में रहते थे। इसी घर में यह क्रान्तिकारी अपने हथियार और गोला-बारूद भी रखते थे।

हथियार और गोला-बारूद..? दादी माँ वो क्यों..?

अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों से अपने देश को आजाद कराने के लिए इन सब चीजों की कब जरूरत पड़ जाए इसलिए..!

ओह अच्छा..!

30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चंद्र चाकी ने मुज़फ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर बम फेंक दिया।उस घटना से ब्रिटिश सरकार की नींदें उड़ गई। गुस्से से तिलमिलाई ब्रिटिश सरकार क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह छापेमारी करने लगी।उसी दौरान पुलिस को कनाई और उनके साथियों की गतिविधियों पर शक हो गया।

2 मई 1908 को पुलिस ने बारीन्द्र घोष के घर पर भी छापा मारा और उन्हें उस घर में एक बम फैक्ट्री और काफी मात्रा में हथियार मिले।इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष, बारिन्द्र कुमार घोष, सत्येन्द्र नाथ (सत्येन) व कनाई लाल समेत 35 क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। 

कन्हाई लाल दत्त के साथ-साथ उसके प्रेरक प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाये गये थे। सब पर अभियोग चला किन्तु चारू चन्द्र राय को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के कारण रिहा कर दिया गया।

सभी क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में रखा गया और सब पर विद्रोही होने का मुकदमा चलाया गया।गिरफ्तार होने वाले लोगों में, कनाईलाल दत्त का सहयोगी नरेंद्र नाथ गोस्वामी भी था।उन सभी से उनकी योजनाओं और साथियों का सच उगलवाने के लिए पुलिस ने कठोर यातनाएं दीं, परंतु किसी ने अपना मुँह नहीं खोला।

कनाईलाल के सहयोगी नरेन्द गोस्वामी ब्रिटिश सरकार की यातना के डरकर और जेल से छूटने के लालच में अपने साथियों के साथ गद्दारी कर पुलिस को क्रांतिकारियों के ठिकानों की जानकारी देना शुरू कर दी।

फिर क्या हुआ दादी माँ..सब पकड़े गए..?

बताती हूँ..आगे सुनो..! नरेन्द्र गोस्वामी से सूचना पाकर पुलिस ने उनके गुप्त ठिकानों पर छापे मारना शुरू कर दिया और भी बहुत सारे क्रान्तिकारियों को पकड़ लिया गया। उसके बाद नरेन्द्र गोस्वामी ने इन क्रान्तिकारियों के और भी कई सारे राज उजागर कर दिए। 

कनाईलाल दत्त और उनके साथियों को अपनी सभी योजनाओं पर पानी फिरता दिखाई देने लगा।उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि हमारी मातृभूमि के साथ दगा करने वाले को सबक सिखाना ही होगा ताकि और कोई इस तरह की गद्दारी न कर सके।

नरेंद्र गोस्वामी को क्रान्तिकारियों के गुस्से से बचाने के लिए पुलिस ने विशेष सुरक्षा प्रदान की और उसे उन सब से अलग जेल में रखा। ताकि उसे इन लोगों से किसी प्रकार का खतरा न रहे।

कन्हाई लाल और सत्येन्द्र अपनी योजना पर तेजी से कार्य कर रहे थे।उन्होंने सबसे पहले जेल के पहरेदारो से घनिष्टता बढाई और अपनी बातों से उन्हें बहुत हद तक प्रभावित कर लिया।फिर साथियों के सहयोग से जेल के भीतर लाये जाने वाले कटहल- मछली के भीतर छुपाकर लाई गईं दो पिस्तौल प्राप्त करने में सफल हो गये।

अब उनका अगला लक्ष्य था नरेंद्र तक पहुँचना,नरेन्द्र अपने अगले बयान में क्रान्तिकारियों के अन्य ठिकानों का पर्दाफाश करें उससे पहले कनाईलाल और सत्येन ने एक योजना बनाई।सत्येन अचानक बीमार होने का नाटक करने लगे,यह देख उन्हें जेल के अस्पताल में पहुँचा दिया गया।

उनके बाद कनाईलाल दत्त ने भी पेट में अत्याधिक पीड़ा का नाटक शुरू कर दिया। सत्येंद्र तो पहले ही बीमारी का बहाना बना कर अस्पताल पहुँच चुके थे और उन्होंने पुलिस के मुखबिर बनने की बात मानकर नरेन्द्र से मिलने की इच्छा जाहिर कर दी। इधर भयंकर पेटदर्द का बहाना बनाकर कनाईलाल भी अस्पताल में भर्ती हो गए थे।

सत्येंद्र के मुखबिर बनने की खबर सुनकर नरेन्द्र भी खुश हो गए और उनसे मिलने अस्पताल जा पहुँचे। नरेन्द्र इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि वह कनाईलाल और सत्येंद्र के बनाए चक्रव्युह में फस चुके हैं। जैसे ही नरेन्द्र उनसे मिलने आए वैसे ही अचानक सत्येन्द्र ने उन पर फायर कर दिया।

नरेन्द्र जान बचाकर भागने लगे तो दर्द का बहाना कर बिस्तर पर लेटे कनाईलाल ने बड़ी फुर्ती से नरेन्द्र का पीछा कर पिस्तौल की सारी गोलियाँ उनके जिस्म में उतारकर भारत माता से की गई गद्दारी का बदला ले लिया।

अंग्रेजों का सुरक्षा कवच भी उस गद्दार के जीवन को नहीं बचा पाया।अंग्रेजी हुकूमत के सामने ही कनाईलाल ने अपने सहयोगी सत्येन बोस के साथ मिलकर गवाही से पहले ही नरेन्द्र की हत्या कर दी।

कनाईलाल के इस कारनामे से ब्रिटिश सरकार गुस्से से तिलमिला उठी। आनन-फानन में उन्होंने उन्हें फाँसी की सजा सुना दी।पूरे मुकदमे के दौरान कनाईलाल जरा भी विचलित नहीं हुए।जब जज ने उनसे इस घटनाक्रम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वह देश का गद्दार था, उसे मारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं है।।सजा के बाद जब अपील का प्रश्न उठा तो कनाई ने अपील करने से साफ़ मना कर दिया।

फाँसी की सजा सुनकर कनाईलाल के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।जिसे देखकर अंग्रेज वार्डन ने चिढ़कर कहा कि अभी मुस्करा रहे हो, कल जब फाँसी का समय आएगा तब तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ जाएगा।

फाँसी के दिन जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने के लिए उनकी कोठरी में पहुँचे, उस समय कनाईलाल दत्त गहरी नींद में सोये हुए थे। फाँसी पर चढ़ने से कुछ ही देर पहले कनाईलाल ने मुस्कुराते हुए उसी अंग्रेज वार्डन से पूछा “ जरा बताइए अभी मैं आपको कैसा लग रहा हूं।” उस वार्डन के पास कनाईलाल के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

10 नवंबर 1908 को भारत माता के वीर सपूतों को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। कनाईलाल के परिवार वाले जब उनका पार्थिव शरीर लेने गए तो उन्हें खुद पर काबू करना मुश्किल हो रहा था तब उसी वार्डन ने प्रोफेसर चारू से कहा कनाईलाल जैसे सौ वीर और जन्म ले लें तो भारत ज्यादा दिनों तक गुलाम नहीं रह सकता। 

कनाई के बड़े भाई अपने भाई का शव देखकर रोने लगे तो वार्डन ने कहा वीर कभी मरा नहीं करते,आप धन्य हो कि कनाईलाल जैसे वीर ने आपके घर जन्म लिया।साथ आए सभी लोग यह देखकर चकित थे कि उस अंग्रेज वार्डन की आँखें भी कनाईलाल के बलिदान से नम हो गई थी।

कनाईलाल के मुख से चादर हटाई गई तो मृत्यु पश्चात भी उनके मुखमंडल पर मरने की पीड़ा किंचित मात्र भी नहीं था,बस एक हल्की-सी मुस्कान तैर रही थी।जेल में पिस्तौल कैसे पहुँची यह जानने की ब्रिटिश सरकार ने बहुत हाथ-पैर पटके पर जेल के अंदर एक देशद्रोही को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए कनाईलाल और सत्येंद्र के पास हथियार कैसे पहुँचे..?यह राज पता नहीं कर पाई।

इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया कि कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की नाक के नीचे इतना बड़ा कारनामा कर दिखाया, उनके सामने उनके गवाह की हत्या कर दी गई और वो कुछ न कर पाए। 

कनाईलाल दत्त बीस वर्ष की आयु में खुदीराम बोस के बाद सबसे कम उम्र में फाँसी के फंदे पर झूलने वाले दूसरे क्रांतिकारी थे। फाँसी के बाद उनकी अंतिम यात्रा में आज़ादी के इस परवाने के अंतिम दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जमा हो गई थी।। 

कोलकाता का कालीघाट लोगों से भर गया था और हर कोई अंतिम बार इस महान क्रांतिवीर के दर्शन करना चाहता था। चारों तरफ ‘जय कनाई’ कनाईलाल की जय के नारे गूँजते नारे ब्रिटिश सरकार को भारत से उखाड़ फेंकने का आगाज कर रहे थे।

कनाईलाल दत्त जैसे वीरों की कुर्बानी से आज हम आजाद भारत से चैन से रह रहे हैं।कनाईलाल दत्त जैसे वीरों की शहादत को शत् शत् नमन।

हम भी शत-शत नमन करते हैं दादी माँ..!


अब जाओ, दोनों चुपचाप सो जाओ..!

जी दादी माँ.. शुभ रात्रि..!


©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित ✍️

चित्र और जानकारियाँ गूगल से साभार