Tuesday, September 29, 2020

मानव और प्रकृति


हम हमेशा भूल जाते हैं, हमारे ऊपर भी कोई दिव्य शक्ति है,जो हमें हमारी गलतियों की कभी भी सजा दे सकती है। प्रकृति के निरंतर दोहन से आज हमें सबसे भयंकर सजा मिल रही है। एक सूक्ष्म वायरस की चपेट में आकर मानव जीवन में हाहाकार मचा हुआ है।
प्रकृति से छेड़छाड़ और अपनी सभ्यता-संस्कृति भूलने और गलत खान-पान का नतीजा सामने है।नदियाँ दलदल बन रही हैं और हरी-भरी धरती बंजर।
आज हम खुद इस मौत के तांडव के जिम्मेदार बने हैं।मानव की सबसे समृद्ध बनने की लालसा ही आज सम्पूर्ण विश्व के समक्ष महामारी के रूप में तांडव कर रही है।
प्रकृति एक माँ की तरह हमें बहुत कुछ देती है और बदले में मानव से बस थोड़ा रख-रखाव और प्यार माँगती है।परन्तु जब क्रोधित होकर लेना शुरू करती है तो फिर होता है महाविनाश का आरंभ ।मानव सदा से ही संघर्षशील है,हर विपत्ति का सामना करने में सक्षम है। 
परंतु आज मानव ने हमारी हरी-भरी प्रकृति को इतना प्रदूषित कर दिया है कि प्रकृति के विध्वंसकारी रूप उभर कर सामने आने लगे हैं।यह किसी से छिपा नहीं है कहीं बाढ़ ज़िंदगियाँ तबाह कर रही तो कहीं भूकम्प और हवा में घुली विषैली गैसें जीवन में विष घोल रहीं है। 
जैसे मानव को जीने के लिए जल,हवा, हरियाली तीनों की जरूरत है वैसे ही प्रकृति को मानव की।मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।प्रकृति तो अपना धर्म निष्ठा से निभा रही है पर मानव सब कुछ भूल प्रकृति के मूल स्वरूप को ही बिगाड़ने पर आमादा है।मनुष्य जब तक प्रकृति को सहेजता रहा सुखी और सम्पन्न रहा प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ किया तो उसका गुस्सा भूकम्प, सूखा, बाढ़, और कोरोना महामारी का रूप लेकर लोगों को काल का ग्रास बनाने लगा।
हमें शुरू से ही बताया गया है कि हरियाली के बिना प्रकृति मृत है और प्रकृति के बिना हम.! इसलिए स्वच्छ हवा पानी के लिए आम, आँवला, पीपल,वट वृक्ष और नीम के वृक्ष लगाने का महत्व बताया गया है।भारतीय संस्कृति में प्रकृति के कण-कण में देवताओं का वास माना गया है। इतना ही नहीं हमारी संस्कृति में वृक्षों को देवशक्तियों का प्रतीक मानकर सहेजना सिखाया गया है। विभिन्न प्रकार के तीज-त्योहार हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैैं।हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन की मान्यता सदियों से चली आई है।
सनातन धर्म में अनेकों उत्सव ऐसे हैं जो प्रकृति के अनुरूप मनाए जाते हैं वसंत पंचमी हो या एकादशी, हरियाली तीज हो या गंगा दशहरा और गोवर्धन पूजा,वट सावित्री,गणेश चतुर्थी व आँवला नवमी सभी पर्वों में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
                 भाद्रपद माह की शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणपति बाप्पा की स्थापना और पूजा का पर्व महाराष्ट्र राज्य की सभ्यता और संस्कृति का एक अभिन्न अंग है।परंतु आज गणपति बाप्पा की स्थापना, पूजा और विसर्जन सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित न रहकर संपूर्ण देश में खूब धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
चतुर्थी तिथि को' गणपति बाप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया! के उद्घोष के बीच बाप्पा की प्रतिमा की खूब धूमधाम के साथ स्थापना की जाती है।न सिर्फ बड़े बड़े पण्डालों में अपितु हर गली, हर घर में छोटे - बड़े सभी आकार की बाप्पा की प्रतिमा की स्थापना कर भक्तिभाव से पूजा की जाती है।वैसे तो बाप्पा चतुर्थी को हमारे मध्य विराजते हें और पूरे ग्यारह दिन हमारे बीच ,हमारे साथ रहकर अनंत चतुर्दशी के दिन वापस अपने धाम लौट जाते हैं।परंतु घर- घर में श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार कभी डेढ़ दिन,तीन दिन, पाँच दिन और सात दिन में भी बाबा की विदाई कर देते हैं।
               परंतु अधिकांश बड़े- बड़े सार्वजनिक पण्डालों में ग्यारहवें दिन ही बाप्पा के विसर्जन की परम्परा देखने में आती है।'विसर्जन'-- ये संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है---' पानी में विलीन होना।'ये एक सम्मानसूचक शब्द है,इसलिए पूजित प्रतिमाओं को ससम्मान विदाई देने के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है।
            गणपति स्थापना,पूजा और विसर्जन आज एक बहुत बड़ा संदेश हमें देते हैं।
              ईश्वर निराकार हैं।जब हम अपनी आस्था को मूर्त रूप देने के लिए प्रभु को एक आकार देते हैं तो उन्हें भी प्रकृति ( मिट्टी) का सहारा लेना पड़ता है।
             गणपति विसर्जन हमें ये सीख देता है कि जो हमने प्रकृति से लिया है उसे एक न एक दिन वापस लौटाना ही होगा।प्रकृति से निर्मित आकार अंततोगत्वा प्रकृति में ही विलीन हो जाना है।
                गणपति विसर्जन की जो मूल परंपरा है, पर्यावरण हित को ध्यान में रखकर ही उसकी नींव रखी गई है।मूर्ति के विसर्जन के साथ अनेकों ऐसे तत्व पानी में घुलते हैं जो पानी को शुद्ध करते हैं।हल्दी ,कुमकुम एंटीबायोटिक होते हैं जिनसे जल स्रोतों का पानी स्वच्छ होता है।लंबे समय से नदियों, तालाबों और पोखरों का रुका पानी भी विसर्जन में डाली जाने वाली सामग्री से शुद्ध हो जाता है।विसर्जन की प्रक्रिया में प्रचुर मात्रा में डाला जाने वाला अक्षत जलीय जीवों के भोजन की व्यवस्था करता है।धूप,चंदन आदि प्रयुक्त सामग्रियाँ पर्यावरण को स्वच्छ करने में अपना बहुत बड़ा योगदान देती हैं।
          गणपति बाप्पा मोरया,
        पुढच्या वर्षी लवकर आ।।
के नारे के बीच बाप्पा की विदाई ये संदेश देती है खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।
       प्रकृति चक्र के अनुसार हर आकार को एक दिन प्रकृति में ही मिलना है।
         पर आज इस इतनी सुन्दर परंपरा का स्वरूप कुछ धनलोलुप लोगों ने विकृत सा कर दिया है।अधिक पैसा कमाने की चाहत में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाई गई और कृत्रिम रंगों से रंगी गई मूर्तियाँ पर्यावरण को बहुत हानि पहुँचा रही हैं।हमें इस ओर ध्यान देना होगा।यदि प्रकृति को बचाना है तो गणपति विसर्जन के पुरातन परम्परागत स्वरूप को ही अपनाना होगा।
              मानव को शायद अभी भी अपनी गलतियों का अहसास नहीं ,तभी तो भौतिक विकास के पीछे पड़ा हुआ है। अति प्रगतिशील बनने की होड़ में दुनिया कहाँ पहुँच गई।आज ऐसा कोई देश नहीं है जो कोरोना संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। घरों में कैद भारतीय आज इसी बात से चिंतित हैं कि आखिर कब हम पहले की तरह अपने पर्वों को धूमधाम से मना पाएंगे?
प्रकृति को हमने हद से ज्यादा नुकसान पहुँचाने की गलती की पर फिर भी प्रकृति हमें नुकसान पहुँचाने की जगह आज भी हमें पूरी निष्ठा के साथ ज़िंदगी देने में लगी हुई है। प्राचीन काल से ही हमारे देश में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने के संस्कार मौजूद हैं। हमारे सनातन धर्म की हर परम्परा में कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है।हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में कहा है कि पृथ्वी का आधार जल और वन है। और शायद इसलिए ही हमारे त्योहार भी प्रकृति से संबंधित हैं। बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते थे कि अगर पीने के लिए जल चाहिए तो उसके लिए वृक्षों का होना जरूरी है और जल ही जीवन है। यही हमें बचपन से सिखाया गया कि यह प्रकृति हमारी माँ है जो हमें पालती पोसती है। अगर प्रकृति हरी- भरी रहेगी तो हम भी जीवन का सुख लेते रहेंगे।
*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*
चित्र गूगल से साभार

Tuesday, September 22, 2020

नन्ही लिसिप्रिया


मणिपुर के बशिकहांग की 8 साल की लिसीप्रिया कंगुजम दुनिया की सबसे कम उम्र की क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट हैं।
आठ साल की लिसिप्रिया ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ आवाज बुलंद कर दुनिया को नींद से झकझोरा है।मणिपुर की इस नन्ही पर्यावरण कार्यकर्ता ने स्पेन की राजधानी मैड्रिड में सीओपी25 जलवायु शिखर सम्मेलन में अपनी बात रख वैश्विक नेताओं से अपनी धरती और उन जैसे मासूमों के भविष्य को बचाने के लिए तुरंत कदम उठाने की गुहार लगाई।
लिसिप्रिया अपने भाषण में कहती है, सभी वैश्विक नेताओं से मेरा निवेदन है कि पर्यावरण को बचाने के लिए अति आवश्यक कदम उठाने का समय आ गया है।यह वास्तविक क्लाइमेट इमरजेंसी का समय है हम सभी को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।इतनी छोटी उम्र में इतने अहम मसले पर प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने के कारण लिसिप्रिया स्पेन के अखबारों की सुर्खियाँ बनी हैं।
लिसीप्रिया को वर्ष 2019 में उन्होंने डॉ A.P.J. अब्दुल कलाम चिल्ड्रन अवॉर्ड, विश्व बाल शांति पुरस्कार और भारत शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
लिसिप्रिया अब तक 21 देशों का दौरा कर चुकी हैं और जलवायु परिवर्तन मसले पर विविध सम्मेलनों में अपनी बात रख चुकी हैं। वह दुनिया में सबसे कम उम्र की पर्यावरण कार्यकर्ता बताई जा रही हैं।
महज छह साल की उम्र में लिसिप्रिया को 2018 में मंगोलिया में आपदा मसले पर हुए मंत्री स्तरीय शिखर सम्मेलन में बोलने का अवसर मिला था।वो कहती है कि उस सम्मेलन के बाद उनकी जिंदगी बदल गई।
लिसिप्रिया कहती है कि मैं जब भी प्राकृतिक आपदा जैसे भूकंप,सुनामी व बाढ़ आदि की वजह से निर्दोष लोगों को मरते हुए देखती हूँ तो भयभीत हो जाती हूँ। छोटे-छोटे बच्चों को अपने माता-पिता से बिछड़ते देख मेरा दिल भर आता है।मैं समाज के जिम्मेदार लोगों से आग्रह करती हूँ कि वो दिल-दिमाग से पर्यावरण असंतुलन के प्रभावों को कम करने के लिये प्रयास करें ताकि हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण कर सकें।
मंगोलिया से लौटने के बाद लिसिप्रिया ने पिता की मदद से 'द चाइल्ड मूवमेंट' नामक संगठन बनाया। वह इस संगठन के जरिये वैश्विक नेताओं से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कदम उठाने की अपील करती हैं।लिसिप्रिया के पिता केके सिंह कहते हैं,मेरी बेटी की बातों को सुनकर कोई यह अनुमान नहीं कर पाता कि वो अभी आठ साल की है‌।
लिसिप्रिया का जन्म इंफाल में हुआ,लेकिन वह अपने इस कार्य के कारण पूरे समय शहर से बाहर रहती हैं।वह ज्यादातर दिल्ली और भुवनेश्वर में रहती हैं।जलवायु परिवर्तन मसले पर अपने जुनून के चलते वह स्कूल नहीं जा पाती थीं।इस कारण उसने फरवरी में स्कूल छोड़ दिया। पूरे जी- जान से अपने कार्य में जुट गई।
लिसिप्रिया ने एपीएसी क्षेत्र के बच्चों का प्रतिनिधित्व करते हुए 140 देशों के नुमाइंदों और तीन हजार प्रतिनिधियों को संबोधित किया।तब उसके आने-जाने की खबर आई-गई हो गई किसी ने उस पर गौर नहीं किया।
उसने देश का ध्यान तब खींचा जब वह 21 जून को हाथ में पर्यावरण संरक्षण के नारे लिखी तख्ती लिये संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करती नजर आईं।लिसिप्रिया जून महीने में संसद भवन के पास तख्ती लेकर पहुंची थीं।तख्ती पर लिखे नारों के जरिये उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी आग्रह किया।
संसद भवन के बाहर तख्ती लिये लिसिप्रिया कहती हैं,"प्रिय मोदी जी एवं सभी सांसद जन, जलवायु परिवर्तन के प्रति कानून बनाकर अपनी सजगता दिखाएं। प्रतिदिन समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।धरती निरंतर गर्म हो रही है।हम सभी को भविष्य बचाने के लिये जल्दी ही समस्याओं की जड़ पर जल्दी ध्यान देना होगा।आप सभी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी कानून बनाकर हमारे भविष्य को बचा लीजिए।
लिसिप्रिया कहती है कि पर्यावरण असंतुलन के कारण ही हमें कई बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। हमें भी इस विषय पर ध्यान देना होगा।
वृक्ष लगाओ,जीवन सींचो यह बात बड़े-बुजुर्ग ऐसे ही नहीं कहते थे।लिसिप्रिया की जितनी उम्र नहीं उससे कई गुना ज्यादा वृक्ष लगा चुकी है।
वो अपने  ट्वीटर पर लिखती हैं, ‘मैं अभी 3,040 दिनों की हूँ यानी कि उम्र 8 साल, 4 महीने, 1 दिन की। और अभी तक मैंने 51,000 से ज्यादा पेड़ लगाए हैं यानी कि प्रतिदिन के सोलह वृक्षों का रोपण किया हैं ।
नन्ही लिसिप्रिया की सक्रियता को देख एक आश्चर्य होता है कि खेलने-खाने की नन्ही सी उम्र में वह दुनिया भर की फिक्र लिये घूमती रहती है।
इस उम्र में बच्चों को कहाँ दुनिया के गंभीर विषयों से जुड़ाव होता है।मगर,पर्यावरण के प्रति उसकी जो चिंताएं हैं यदि सभी बच्चे उसकी तरह अभी से प्रकृति के प्रति जागरूक होंगे‍ तभी तो हमारा कल सुधरेगा।
लिसिप्रिया की तुलना स्वीडन की सोलह वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग से की जाने लगी है।जलवायु परिवर्तन पर काम कर रही है यह बच्ची अपने-आप में एक मिसाल है।
लिसिप्रिया कहती है कि जिंदगी बेहतर बनाने के लिए हम सबको सही कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य को संवारा जा सके और आगे आने वाली पीढ़ियाँ साफ और स्वच्छ हवा में जी सकें।
अनुराधा चौहान'सुधी'
लिसिप्रिया के बारे में सभी जानकारी दैनिक ट्रिब्यून, जनसत्ता, एनडीटीवी के माध्यम से ली गई हैं।
चित्र गूगल से साभार

Thursday, September 3, 2020

बर्तन यूनियन (बाल कथा)


आशु! पैर से कोई बरतनों को ठोकर मारता है क्या। सरला अपने पांच वर्षीय बेटी को चिल्लाते हुए गुस्से से बोली😠।
ममा क्या इनको भी चोट लगती है, इनमें भी जान होती है🤔।ममा..ममा बोलो ना🤷?
पीछा छुड़ाने के लिए सरला ने कहा दिया,हाँ बर्तनों में भी जान होती है😬,अब पैर नहीं मारना कभी।चलो तुम्हें सुला दूँ।
आशु के नन्हे मन में कई सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहे🙇, और सरला उसके सवालों के जवाब देते हुए थक गई🥴।
तभी उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दी। कौन है वहाँ देखती हूँ। सरला रसोईघर का नज़ारा देख चौंक गई😳। और छुपकर बैठ गई।
कटोरी उछलकर सामने आई।हाँ तो भाइयों-बहनों क्या सोचा आप सभी ने🤔
सोचना क्या है 🤔हम सब एक-दूसरे के साथ 🤗 कदम से कदम मिलाकर अपना विरोध प्रकट करना है।
आखिर कब तक हम इंसानों के जुल्म सहेंगे😡। जिसका मन आता है वो हमें पटकता है, लोहे के तारों से घिसता है।😩 हमको एक होना होगा 🤝
बहन तुम्हारी पीड़ा तो यही तक सीमित है। हमें तो घंटों आग में जलाते हैं, यह लोग.. तवा बोला
देखो कितना चिकना चमकदार और सुंदर था 😊।आज रोता हूँ अपने हाल पर 😢
चम्मच खनकी । मेरी भी सुन लो व्यथा😔मेरा हाल तो बुरा है 😏सब बार-बार मुँह में डालकर दाँतो तले दबाते हैं,जी करता है एक-दो दाँत साथ ले आऊँ👿
ग्लास मुस्कुराते हुए बोला, मैं तो सुखी हूँ,सब ठंडा शीतल जल मुझमें डालते हैं तो आनंद आ जाता है।😌
सब अपनी ही कहते रहोगे या मेरी सुनोगे। कड़ाही जोर से नीचे कूदी।देखो मेरी गोरी चिकनी काया में करछुल से कितने छिद्र कर दिए गए😔।अब रगड़-रगड़ कर मुझे आधा भी नहीं रहने दिया 😢
फिर तो थाली प्लेटें,भगोने, डिब्बे सब निकल कर रसोई के फर्स पर जमा हो गए।
सब में जोरदार वार्तालाप चालू था। रसोई घर का हाल देख सरला का हाल खराब था😳
सबसे ज्यादा मजे तो इन लोगों के हैं🙄चमचे ने चीनी मिट्टी के बर्तन की ओर इशारा करते हुए कहा।
कोमल हाथों से🤗 इन्हें सहेजकर रखा जाता है।ध्यान रखा जाता है ।कहीं इन्हें चोट न लगे।
सही कहा.. चाकू उछलकर सामने आया और बोला।अब तक सहेंगे 😡 तीखी मिर्च काटकर कभी मुझे साफ़ नहीं करते 😔 कितनी जलन सहता हूँ,जी करता है उँगली काट दूँ😬
सही बताऊँ कई बार काटी भी है 😆🤭 थोड़ी देर के लिए माहौल हल्का-फुल्का हो गया।
सरला अपनी कटी उँगली देखने लगी।आज ही मिर्ची काटते हुए कट गई थी।
दूध का भगोना अपने मोटापे के कारण हिल नहीं पा रहा था। भाईयों मदद करो उफ़ यह मोटापा🥴
सब मिलकर उसे भी नीचे उतार लेते हैं।अब तुम्हारी क्या समस्या है भाई🤔
मेरी कोई समस्या नहीं है भाई😊 मैं तो अक्सर दूध बाहर गिराकर तुम लोगों की तकलीफों का बदला ले लेता हूँ😄
क्या बात करते हो भाई🙊 सच्ची कह रहे हो🤔 हाँ कल सुबह गैस बंद करते-करते कितना सारा दूध मैंने बाहर फेंक दिया।
यह सब तो ठीक है आगे क्या सोचा है🤔 सोचना क्या.. नहीं सुधरेंगे, तो हम भी सिनचैन👼 बनकर सताते रहेंगे😁
बर्तन यूनियन ज़िंदाबाद 📢चलो अब हमारा रंगारंग कार्यक्रम शुरू किया जाए।
सारे बर्तन आपस में टकराते हुए नाचने-गाने लगे💃‌।
है अगर दुश्मन,दुश्मन,
जमाना ,गम नहीं ,गम नहीं,
कोई आये कोई आये कोई...
हम किसी से कम नहीं,कम नहीं 
🥳यह देख फ्रिज में रखे फल सब्जियाँ भी मैदान में उतर आए।
सब्जियाँ🥕🥦🍆 नाचते हुए चॉपिंग बोर्ड पर चढ़ जाती।तो चाकू महाशय कूदकर उन्हें अपनी धार🔪 से कतरकर मुस्कुराते😜डांस करने लगते।
संतरे यह देख उछलकर गैस पर बैठ गए।चम्मच ने गैस चला दी 🔥तो संतरे 🍊उछलते🥴 हुए फिर से फ्रिज में घुस गए।
तभी कटोरी ने छलांग लगाई। और सीधी पहूँची क्रॉकरी के पास।यह देख सरला घबरा कर भागी,पर यह क्या उसके हाथ-पैर सब जाम थे😳
कटोरी नाच-नाच के छुरी-कांटे🍴 की सहायता से एक-एक करके सभी बरतन गिरा रही थी।खनाक-खन्न,खनाक-खन्न काँच से बिखरते टुकड़े देख सरला का हाल खराब हो गया 😢
अरे कटोरी रुक जा बहना..यह क्या कर रही है😳इन बेचारों की क्या गलती छोड़ दें बहना।🙏
क्यों रुक जाऊँ? आज यह सब टूटेंगे-फूटेंगे तभी हमारी कदर होगी।
ऐसा कुछ नहीं होगा, कल तुम फिर घिसी जाओगी स्क्रब लेकर।😐 हमारी ज़िंदगी जलने और घिस-घिसकर, और बाद में भंगार में जाकर खतम होनी है।😔
तुम चमचे लोग कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ोगे।चमचे हो चमचागिरी करते रहोगे 👿कटोरी तुनक कर बोली।
अब इसमें इसका क्या दोष,यह चमचागिरी की बात कहाँ से आ गई 😬दूध के पतीले ने बोला।
तुम तो कुछ बोलो ही नहीं..अब बारी थी कांटे-छुरी की। तुम्हें तो रोज मलाई मिल रही है,तो मक्खनबाजी करोगे👿😏
देखते-ही-देखते चमचा,करछी, कड़ाही चिमटा सब आपस में झगड़ पड़े।
यह देख टमाटर, गोभी हँस पड़े😆।अब मुश्किलों से टकराने की बारी थी टमाटरों की⚔️सभी गुस्से में 😠 दौड़ पड़े उनके पीछे।
थोड़ी देर में फर्श पर टमाटर चटनी बने पड़े थे।अब सरला की आँखों से मोटे-मोटे आँसू😭 बह निकले पड़े।
हे भगवान अस्सी रुपए किलो लाई थी टमाटर सब फोड़ डाले😭 यह मेरा सबसे प्रिय टी-सेट, मायके से मिला तोहफा था😭
रुक जाओ 🙏माफ़ कर दो कल से किसी पर जुल्म नहीं करूँगी🥴
कटोरी के समर्थन में थालियाँ मैदान में आ गई। तुम लोगों को अत्याचार सहना है सहो हम तो चले।
अरे-अरे रुको ✋पर एक-एक करके कटोरी और थालियाँ खिड़की से बाहर गिरने लगी।
सरला की आँखों के सामने उसके चमकदार स्टील के बर्तन रसोईघर से बाहर निकल गए😳😢
चमचा और पतीला चुपचाप अपने साथियों को जाते देख मायूस 🙄 हो रहे थे।
शुरू से ही चुपचाप बैठे प्रेशर कुकर ने 😠गुस्से से सीटी बजाई।यहाँ भी दल बन गए 🤔
कल तक हाथ थामकर 🤝 चलने वाले मैदान छोड़कर भाग गए 😬
अब तुमको चमचागिरी करनी है तो रुको 😏 मैं भी चला अपने साथियों के पास, अलविदा।
भाई तुम तो मेरे प्रिय मित्र हो🤗जहाँ तुम वहाँ मैं रुको✋ मैं भी आया।
पतीला भी चल दिया। नहीं-नहीं रुक जाओ✋ सरला जोर से रो पड़ी😭 अभी तो धनतेरस पर इतना मँहगा लेकर आई थी।हाय मेरा हॉकिन्स फ्युचरा, हाय मेरा प्यारा कुकर 😰
सरला जोरों से उठकर भागी। धड़ाम 🥵 पलंग से गिर गई🥴 हे भगवान यह सपना था 🤔मैं नींद में यह सब देख रही थी😴
सरला को यकीन नहीं हुआ 🙄 दौड़कर रसोईघर में जा पहुँची।
सुई गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए। रसोई घर में इतना सन्नाटा पसरा हुआ था😐
सरला ने टी-सेट निकाल कर देखा।🥰 मेरा प्यारा टी-सेट एक तू ही तो है जो दिनभर मायके का एहसास दिलाता है 😘 शुक्र है तुझे कुछ नहीं हुआ😊
सुबह सरला बड़े प्यार से बरतन चमका रही थी। सरला क्या हुआ 🤔आज घंटे भर से बरतन धो रही हो?
कुछ नहीं जी, इन्हें चोट न लगे इसलिए आराम से साफ कर रही हूँ,सरला अभी-भी रात के सपने में खोई थी।क्या🤔प्रकाश कुछ नहीं समझा नहीं ।बस आश्चर्य🤯 से सरला की गतिविधि को देख रहा था।
©®अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️