मन के भाव लिखती हूँ,कविता लिखती हूँ,कहानी लिखती हूँ,यह भाव है मेरे मन के,अपनी मन की जुबानी लिखती हूँ। अनुराधा चौहान
Tuesday, January 10, 2023
नई उम्मीद
Thursday, January 5, 2023
शब्दों की मार
अरे सिस्टर तुमने इसमें आज की तारीख क्या लिखी है..? रवि ने स्नेहा सामने एक पेपर रखते हुए बोला।
12 दिसंबर लिखी डॉक्टर..?कहती हुई स्नेहा पास के बेड पर लेटे पेशेंट का बीपी चैक करने लगी।
"नहीं तुमने जल्दबाजी में बारह दिसंबर की जगह बारह नवंबर लिख दिया था मैंने सही कर लिया यह तुम सँभालो..!
ओके थैंक्स..! स्नेहा ने पेपर फाइल में लगा दिया।
रवि सिटी हॉस्पिटल के डायलिसिस सेंटर में जूनियर डॉक्टर था और स्नेहा वहाँ नर्स का काम करती थी।आज12 दिसंबर है। यह सुनते ही पास के बेड पर लेटी दीक्षा की आँखें भर आईं।
"आपको क्या हुआ दीक्षा..?आप तो इस वार्ड की सबसे हिम्मती पेशेंट हो।फिर आँख में आँसू कैसे?कहीं दर्द हो रहा है..? मौसी गरम पानी की थैली लेकर आओ।बस एक घंटा और फिर आपका डायलिसिस खत्म।
"नहीं सिस्टर गरम पानी की जरूरत नहीं है। मुझे कहीं तकलीफ नहीं..!
"फिर आँखों में नमी कैसी..?
"12 दिसंबर सुनकर कुछ यादें ताजा हो गईं बस और कुछ नहीं...!"
"सच में कोई तकलीफ नहीं दीक्षा..!
"हाँ सिस्टर सच कोई तकलीफ नहीं है..!
"दीक्षा पिछले पाँच सालों से तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा देखने की आदत हो गई है।यहाँ मौजूद हर पेशेंट हर बार डायलिसिस के समय कभी दर्द तो कभी कुछ तकलीफ तो कभी ज़िंदगी से मायूस होकर टूटता नजर आता है।पर तुम हर बार इस तकलीफ को झेल ज़िंदगी की डोर कसकर पकड़ लेती हो। कैसे कर लेती हो ऐसा...?
"सिस्टर यह जंग अपने लिए नहीं अपने बेटे के लिए लड़ रही हूँ। ईश्वर कृपा से वो अपने पैरों पर खड़ा हो जाए। फिर यह साँसे रुकें तो रुक जाए..! चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ दीक्षा बोली।
"ऐसा मत सोचो दीक्षा.. ईश्वर तुम्हें ऐसे ही हिम्मत देता रहे...!
"सिस्टर जरा उन्नीस नंबर बेड के पेशेंट को देखो शायद उसका बीपी डाउन हो रहा ...!रवि एक न्यू पेशेंट को चैक करते हुए बोला।
"यस डॉक्टर ...! सिस्टर उन्नीस नंबर बेड के पेशेंट को चैक करने चली गई।
"मौसी इनके पैरों के नीचे गरम पानी की थैली लगाकर सिकाई करो।डरो मत आपकी पहली डायलिसिस है इसलिए थोड़ी तकलीफ़ होगी फिर सब आदत में आ जाएगा।
"मेरी बेटी को बहुत तकलीफ़ हो रही है। मैं उसे ऐसे नहीं देख सकती। आप जितना जल्दी हो उसे मेरी किडनी लगा दीजिए डॉक्टर ताकि वो जल्दी ठीक हो जाए ..!
"मैडम किडनी ट्रांसप्लांट के लिए बहुत लंबा प्रोसेस करना पड़ता है।तब तक हमारे पास सिर्फ डायलिसिस एकमात्र विकल्प है। थोड़ी हिम्मत तो रखनी होगी..!
"पर डॉक्टर...?
"उधर देखिए..!"नए पेशेंट को सांत्वना देते हुए डॉ रवि ने दीक्षा की और इशारा किया।उस पेशेंट जैसा बनो।वो खुद भी हँसती रहती है और सभी से सकारात्मक बातें कर उन्हें हिम्मत देती रहती है..!
"उसे कितना समय हो गया डॉक्टर..?
"पाँच साल....!यह सारे मरीज कोई पाँच साल तो कोई छः और कुछ पिछले कुछ सालों से यहाँ डायलिसिस करा रहे हैं।वो तो मात्र तेरह साल का बच्चा है और बदकिस्मती से उसकी माँ कैंसर पेशेंट है और पिता शराबी है।उसे भी कोई डोनर नहीं मिला।अब हर किसी को आपकी बेटी की तरह समय पर किडनी डोनर मिलता फिर भी देखिए सब ज़िंदगी के लिए अपनी अपनी किस्मत से लड़ रहे हैं..! आप भी हिम्मत रखिए सब ठीक हो जाएगा..!
"डॉक्टर ट्रांसप्लांट के बाद मेरी बेटी ठीक तो हो जाएगी..? पेशेंट की माँ ने पूछा।
"जरूर स्वस्थ होगी। उसके लिए समय पर दवा और परहेज कराना आपकी जिम्मेदारी है।ऑपरेशन के डर से लड़ने का काम इन्हें ही करना है..!"
"यह लोग सब मरीजों को मेरा एग्जाम्पल क्यों देते हैं। मेरे पास क्या अलादीन का चिराग है जो जिन्न निकल मेरी तकलीफ दूर कर देता है?यह क्या जाने ?कैसे अपना दर्द को छुपाने के लिए मैं हँसती रहती हूँ। किसे पता इस तकलीफ से निकलने के लिए मैं भी ईश्वर से लड़ाई लड़ रही हूँ...! दीक्षा ने घड़ी देखी अभी भी डायलिसिस प्रोसेस खत्म होने में एक घंटे का समय था।वो गहरी साँस लेकर आँखे बंद कर अपनी ज़िंदगी के उतार चढ़ाव याद करने लगी।
"सुरेश..सुनो,उठो.. सुरेश...!" लगभग हाँफती सी दीक्षा अपने पति सुरेश को जगाने का प्रयास कर रही थी।
"क्या है..?सोने क्यों नहीं देती..? सुरेश ने झल्लाकर कहा और करवट बदल ली।
"सुरेश्श.मुझे साँस लेने को नहीं हो रहा..! बड़ी मुश्किल से दीक्षा ने कहा।
"साँस नहीं ले पा रही..?अच्छा है मर जाओ।रोज रोज की परेशानी एक बार में खत्म,जब देखो यह हो रहा है। वो हो रहा,यहाँ दर्द वहाँ दर्द.. मैं तंग आ गया तुमसे और तुम्हारे बहानों से..!"
दीक्षा की हालत बिगड़ रही थी। वो कैसे भी करके उठी और अपने ससुर के कमरे तक पहुँचकर उन्हें पुकारने लगी।
"बाबूजी..!जीतू..!"
"बहू..? तुम इस वक्त..? क्या हुआ..?ऐ जीतू उठ देख माँ को क्या चाहिए..?पोते को जगाते हुए रमाकांत ने कमरे की लाईट जलाई।
"आओ यहाँ बैठो। इतना हाँफ क्यों रही हो..? क्या हुआ? सुरेश ने झगड़ा किया क्या..?"
"माँ आपको इतना पसीना.. जीतू ने तुरंत एसी ऑन किया और दौड़कर पानी ले आया।
"बाबूजी पता नहीं साँस लेने में दिक्कत हो रही है..!"
"अरे बाप रे..! जीतू तू बहू को लेकर आ, मैं तब तक गाड़ी निकालता हूँ। रमाकांत ने शर्ट पहनी पर्स पेंट में रखा और घर से निकल गए।
"चलो माँ..!जीतू ने माँ को सहारा दिया और पीछे पीछे चल दिया ।रात के एक बज रहे थे। जीतू के पुकारने के बावजूद सुरेश अभी भी दीक्षा की चिंता छोड़ गहरी नींद में सो रहा था।
दीक्षा की हालत देखकर डॉक्टर ने सबसे पहले उसे आईसीयू में भर्ती करके ऑक्सीजन लगाने को कहा। ऑक्सीजन लगते ही दीक्षा को चैन आ गया।
"अब कैसा लग रहा है..?"
"बहुत आराम मिला डॉक्टर..!"
"आपको पहले भी ऐसा हो चुका है..?"
"ना डॉक्टर साहब, पिछले कुछ दिनों से बार बार बुखार आ जाता है। पैरों में भी दर्द रहने लगा है और कमजोरी महसूस होती रहती है..!"
"और यह साँस लेने में दिक्कत कबसे..?"
"वो आज ही अचानक होने लगी..!"
"ओके आप आराम कीजिए। हमें आपके कुछ टेस्ट करने होंगे, तभी पता चलेगा इस तकलीफ की वजह क्या है।..!"डॉक्टर ने नर्स को कुछ टेस्ट करवाने के लिए लिखकर दे दिए और बाहर आकर रमाकांत से बात करने लगे।
"हार्ट की और अस्थमा जैसी तो कोई समस्या नहीं है। फिर भी उनका ऑक्सीजन लेवल डाउन ही हो रहा है।अभी तो हमने ऑक्सीजन लगा दिया है।और उन्हें आराम भी मिल गया।पर यह समस्या क्यों हुई इसलिए हमने दीक्षा के कुछ टेस्ट किए हैं। एक घंटे में रिपोर्ट आ जाएगी फिर देखते हैं क्या करना है..?
"धन्यवाद डॉक्टर साहब..! रमाकांत चिंतित दिखाई देने लगे।
"दादू टेंशन न लो,माँ ठीक है। जरूर पापा ने कोई टेंशन दिया होगा इसलिए एकदम से तबियत बिगड़ गई..!"
"कैसे गधे की तरह घर पर सो रहा है।यहाँ मेरी बहू इतनी सीरीयस है।क्या करूँ सुरेश का..? रमाकांत गुस्से में दोनों हाथों को रगड़ते हुए बोले।
"दादू शांत हो जाइए।आप बीमार हो गए तो माँ का इलाज कैसे होगा..? पापा से तो कोई उम्मीद नहीं कर सकता और मैं अभी किसी में भी नहीं..!
रमाकांत जितने सीधे और सुलझे इंसान थे। सुरेश उतना ही जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव का था।उसे दीक्षा की तकलीफ से कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था।उसे तो उसका हर काम समय पर और हर वस्तु हाथ में चाहिए रहती थी।
"दीक्षा के साथ आप लोग हैं..?तभी वार्डबॉय ने आकर पूछा।
"जी हाँ कहिए..?"
"सर ने आपको अपने केबिन में बुलाया है। पेशेंट की रिपोर्ट आ गई है..!
"ईश्वर करे रिपोर्ट अच्छी आए।चल जीतू..! रमाकांत ने जीतू का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"आइए बैठिए..!" डॉक्टर ने बैठने का इशारा किया।
"डॉक्टर साहब रिपोर्ट सही है ना..?"
"नहीं...!"
"नहीं..? क्यों डॉक्टर ऐसा क्या निकल आया..?
"रिपोर्ट के मुताबिक दीक्षा की किडनी खराब हो रही हैं...!
"क्या..? रमाकांत कुर्सी से उठ खड़े हुए।
"प्लीज बैठिए..!" डॉक्टर ने टोका।
"इनकी तबियत कब से खराब है…..?"
"आज अचानक बिगड़ गई डॉक्टर। इससे पहले तो कुछ दिनों से कमजोरी और पैरों मे दर्द की शिकायत सुनी थी।वो भी मेरे पोते ने बताया तब, वो तो मुझे पता ही नहीं चलने देती। अगर स्थिति उसके काबू में होती तो आज भी नहीं पता चलता..!"
"उनको क्रोनिक किडनी डिजीज की प्रॉब्लम हो गई है। उनका क्रिएटिनिन लेवन फाइव प्वाइंट सिक्स पहुँच गया है।पोटेशियम लेवल भी बहुत हाई है जिसके चलते उन्हें साँस लेने में दिक्कत होने लगी। आप लोगों की किस्मत अच्छी थी जो समय रहते समस्या पता चल गई नहीं तो कुछ भी हो सकता था..!"
"डॉक्टर साहब दीक्षा ठीक तो हो जाएगी..?"
"देखिए अब यह बीमारी पूरी तरह से ठीक होने वाली नहीं,हाँ हम इसे सही खानपान और दवाईयों से कंट्रोल कर सकते हैं।आप लोगों को उनके खाने-पीने, और आराम का ध्यान रखना होगा...!
"दीक्षा का आहार कैसा हो,वो भी आप समझा दीजिए डॉक्टर साहब..!
"अब वो किडनी पेशेंट हैं। ऐसे में उन्हें ऐसा आहार मिले जिसमें सोडियम, पोटेशियम, प्रोटीन आदि की मात्रा कम रहे।भोजन सादा और कम मसाले का हो तो हम इस समस्या को कंट्रोल में रख सकते हैं। थोड़ी सी चूक हुई तो हमारे पास डायलिसिस के अलावा कोई विकल्प नहीं..!
"डायलिसिस..?" जीतू यह सुनकर घबरा गया।
"हाँ आप सभी को अब इसके लिए मन मजबूत करके रखना होगा। भगवान न करे यह स्थिति जल्दी आए।पर एक न एक दिन आनी ही है।पर जब भी आए तो उन्हें संभालने के लिए आप लोग मजबूत रहें..!
"जी डॉक्टर..!"रमाकांत थके कदमों से बाहर निकल आए।
"दादू माँ को कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा..?सत्रह साल का जीतू रुँआसा होकर पूछने लगा।
"कुछ नहीं होगा बच्चे.. मैं हूँ ना..! दीक्षा अभी भी सो रही थी। शायद दवा का असर था। सुबह के चार बजने वाले थे। जीतू बैंच पर अधलेटा सो रहा था। रमाकांत सुरेश को फोन लगाने लगे।
तीन-चार बार ट्राई करने पर सुरेश ने फोन उठाया तो रमाकांत गुस्से से बरस उठे और तमाम खरी-खोटी सुना डाली।
"बाबूजी मुझे चार बातें सुनाकर आपकी बहू ठीक हो जाएगी क्या..?यह सब उसके कर्मों का फल है जो वो भुगत रही है।रोज कहीं सिरदर्द तो कहीं पैरदर्द,वो अब सही में भगवान न बीमारी दे दी।कल मरती है तो आज ही मर जाए, मैं तो तंग आ गया इस मरीज से...! इतना कहकर सुरेश ने फोन कट कर दिया।
"मैं इस नालायक का बाप हूँ यह सोचकर आज मुझे खुद पर शर्म आ रही है..!"रमाकांत की आवाज से जीतू जाग गया था।
"दादू शांत हो जाइए। इतना गुस्सा आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं,आपका बीपी बढ़ जाएगा। आपको कुछ हो गया तो मैं और माँ..!कहते कहते जीतू दादू से लिपटकर भावुक हो उठा।
"तेरी माँ को कुछ नहीं होगा। मैं उसका इलाज बड़े से बड़े हॉस्पिटल में करवाऊँगा..!
"दादू आप घर चले जाइए।माँ के पास सुबह सात बजे से पहले किसी को जाने नहीं देंगे तो मैं यहाँ बैठता हूँ..!"
"नहीं मैं ठीक हूँ। डॉक्टर से मिलकर ही जाऊँगा।देख लूँ वो क्या कहते हैं..? शाम तक दीक्षा की रिपोर्ट पहले से बेहतर आई।दो दिन बाद दीक्षा घर आ गई।
"आज खाना नहीं मिलेगा क्या..?" दीक्षा को सोते देख सुरेश चिल्लाने लगा।
"मुझे बहुत चक्कर आ रहे हैं सुरेश।थोड़ा आराम कर लूँ फिर बनाती हूँ..!"
"आराम ही तो करती हो। आराम के अलावा तुम्हें और कुछ आता ही कहाँ है..?
"पापा आप माँ पर क्यों चिल्ला रहे हो..?माँ खाना बन गया है आप आराम करो। मैं पापा की थाली लगा देता हूँ..!
"किसने बनाया खाना..?"
"मैंने माँ..आज कॉलेज की छुट्टी थी तो मैंने जो समझ आया बना लिया..!दवाईयों का हैवी डोज और बदले हुए खानपान से दीक्षा कमजोरी महसूस करने लगी थी।घर के कामकाज और खाना बनाने के लिए रमाकांत ने फुलटाइम कामवाली रख ली।जो सुरेश को पसंद नहीं आया।
"मैं इस कामवाली के हाथ का बना खाना नहीं खाने वाला। तू उठ बहुत आराम कर लिया चल मेरे लिए कचौरियाँ बनाकर ला..! सुरेश ने देखा रमाकांत घर पर नहीं है तो मौके का फायदा उठाकर दीक्षा पर चिल्लाने लगा।
जीतू के बारहवीं के एग्जाम चल रहे थे। घर में क्लेश न हो इस डर से दीक्षा ने हिम्मत करके आलू की कचौरियाँ बनाईं तो सुरेश ने खीर की फरमाइश कर दी।
"इसके साथ मेरे लिए खीर भी बना दे तो कचौरी खाऊँगा..!
"सुरेश अब मुझसे सच में काम नहीं हो पाता नहीं तो खीर बना देती।जिद मत करो ऐसे ही खालो प्लीज। तुम मेरी तकलीफ समझते क्यों नहीं..?
"ले रख अपनी कचौरी मुझे नहीं खाना..!" दीक्षा ने मना किया तो उसने कचौरी भी खाने से मना कर दिया और बाहर चला गया।यह देख दीक्षा रोने लगी।
"माँ आपको कचौरी बनाना ही नहीं चाहिए था। उन्हें तो बस आपको सताने का मौका चाहिए और आप भी उन्हें इतना महत्व क्यों देती हो..?
"तो क्या करूँ..?यह सब बातें तो मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। मेरी किस्मत जो उनसे जुड़ी है..!" दीक्षा की हालत दिन पर दिन गंभीर हो रही थी। सुरेश उसकी तकलीफ नजरंदाज कर उसे उतनी अधिक मानसिक यातना दे रहा था।
"ईश्वर से तो डरो सुरेश।इस तरह किसी कमजोर को सताना मर्दानगी नहीं होती। मैं मौत के कगार पर खड़ी आज भी बस थोड़े से प्यार के लिए तरस रही हूँ। तुम मुझसे प्यार भरे शब्द नहीं कह सकते तो जहर तो न उगलो..!
"प्यार और तुझसे..? चेहरा देख अपना,जरा सा काम क्या कहो तुरंत बीमारी का चोला ओढ़ लेती हो और प्यार चाहिए इसे..! मेरी तो किस्मत फूटी थी जो तुझसे शादी की..!
"मेरे बीमार मन को शब्दों की मार न मारो सुरेश। ईश्वर न करे कहीं मेरे दुखी मन की हाय तुम्हें लग जाए..! कहते कहते दीक्षा रो पड़ी।दीक्षा का क्रिएटिनिन लेवल अत्यधिक बढ़ जाने से आज वो पहली बार डायलिसिस कराकर आई थी जिस वजह से उसे चक्कर और पैरों में असहनीय पीड़ा हो रही थी।
"तेरी हाय हा हा हा..तू मुझे हाय लगाएगी..?तू हा हा हा हा..." सुरेश ठठाकर हँसा।"अरे तुझे तो मेरी हाय लगी है। अभी तो तू जाने क्या क्या भुगतेगी देखती रह...! सुरेश शराब की बोतल मुँह से लगाकर पीने लगा।
"बिना पानी शराब मत पियो सुरेश।लीवर खराब हो जाएगा।कल तुमने जिद में कितनी मिठाई खाई। इस बार तुम्हारा शुगर लेवल कितनी बढ़ा आया।यह सब कितना घातक है, पता है ना तुम्हें..?"
"तूने क्यों नहीं कर लिया परहेज..?यह सब सुरेश कहाँ सुनने वाला था।जब भी कभी रमाकांत बाहर जाते सुरेश नशे में चूर होकर हर वो काम करता जो उसे नहीं करने चाहिए थे।
"तुम अपना ज्ञान अपने पास रखो। तुम्हारे ज्ञान की जरूरत तुम्हें है ..? मैं तेरी तरह मरीज नहीं जो कुछ हो जाएगा..! सुरेश की नहीं सुनने और अनाप-शनाप खाने पीने वाली आदत के चलते एक दिन सुरेश का शुगर लेवल हाई हो गया और उसे पैरालिसिस का अटैक पड़ गया।
"जीतू जल्दी आओ...! कमजोर दीक्षा सुरेश को दशा देख घबरा गई।
सुरेश बेहोश हो गया।उसे फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया। रिपोर्ट में पता चला कि ज्यादा पीने से और शुगर लेवल हाई हो जाने से लीवर और किडनी दोनों पर बुरा असर हो गया है।एक तो पैरालाइज्ड ऊपर से उसका डायलिसिस होगा ?यह सुनते ही सुरेश सदमे में चला गया।
"यह सब इसी का किया धरा है। इसने जरूर मुझे खाने में कुछ दे दिया इसलिए इसकी बीमारी मुझे लग गई।मुझे डायलिसिस नहीं करानी। मुझे हॉस्पिटल में नहीं रहना मुझे घर जाना..! सुरेश हठ पकड़कर बैठ गया था।
"दीक्षा को हर बात का दोष देना बंद करो सुरेश।यह उसने नहीं तुम्हारी बुरी आदतों और जिद का नतीजा है।अब तो अपनी हठ छोड़ दो। क्यों इन बुढ़ी हड्डियों को जिम्मेदारी के बोझ से दबा रहा है...!
रमाकांत की डाँट से सुरेश चुप बैठ गया।उसे बार बार दीक्षा की कही बात याद आ रही थी।'कहीं मेरे दुखी दिल की हाय तुम्हें न लग जाए सुरेश'!सबके कहने पर सुरेश डायलिसिस के लिए तैयार हो गया।
"मैं भी साथ चलूँगी..!" हॉस्पिटल जाते समय दीक्षा भी जिद करके साथ हो ली थी।डायलिसिस के लिए जाते समय भी अपनी आदत से मजबूर सुरेश ने दीक्षा को तंज कसा।"दीक्षा आज सच में मुझे तुम्हारी हाय लग गई..!
"सुरेश ऐसा न कहो..!" तड़पकर दीक्षा बोली।"उस दिन गुस्से और दर्द की वजह से मेरे मुँह से वो शब्द निकल गए थे।मैं कभी सपने में भी तुम्हारे लिए बुरा नहीं सोच सकती। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वो तुम्हें मेरी बची उम्र दे दे और तुम जल्दी स्वस्थ हो जाओ..!"
"डायलिसिस की प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई थी कि सुरेश को दिल का दौरा पड़ गया।उसे फौरन आईसीयू में शिफ्ट किया गया। डॉक्टर्स के सारे प्रयास विफल हो गए।
"आइ एम सॉरी..हम सुरेश को नहीं बचा पाए..! जैसे ही डॉक्टर ने आकर कहा तो रमाकांत ने लड़खड़ाकर जीतू को पकड़ लिया।
"सारे दुख सारी तकलीफें सिर्फ मेरे हिस्से क्यों प्रभु..? सुरेश सही कह रहा था कि उसे मेरी ही हाय लग गई..?यह सोचकर दीक्षा और टूट गई।वो ईश्वर से अपने लिए मुक्ति माँगते हुए रो पड़ी।
"माँ शांत हो जाइए। आप हिम्मत खो देंगी तो मेरा क्या होगा ? मैं तो अनाथ हो जाऊँगा..! कहते हुए जीतू रोने लगा।जीतू को रोते देख दीक्षा ने खुद को संभाल लिया पर सुरेश के अंतिम शब्दों की मार उसे तिल तिल मार रही थी।
"दीक्षा... दीक्षा..क्या सोच रही हो...?स्नेहा की आवाज से दीक्षा सोच के दायरे से बाहर निकल आई।
"ना नहीं कुछ नहीं..!हो गया डायलिसिस..?"
"हाँ हो गया..!स्नेहा बगल वाले बेड के पेशेंट के पास चली गई।
"मैं हूँ ना तेरे पास..डर मत कुछ नहीं होगा।बस हिम्मत करके चुपचाप लेटी रहो..!यह सुनकर दीक्षा ने बगल वाले बेड की और देखा।वहाँ अभी अभी कोई नई लेडी पेशेंट आकर लेटी थी।उसका पति उसके पैरों को सहलाते हुए उसे हिम्मत दे रहा था।यह देखकर दीक्षा को सुरेश की याद आ गई।वो ठंडी साँस भरकर बड़बड़ाई ।"काश कभी मेरे हिस्से ऐसा प्यार आया होता..?
"माँ कहाँ खोई हो...?घर चलें..! जीतू दीक्षा को लेने आ गया था।
"हम्म..चलो..! मैं ही ऐसी फूटी किस्मत लिखाकर आईं हूँ।मेरे पति ने मुझे कभी नहीं समझा और अंतिम समय में भी अपने शब्दों की मार से ऐसे घाव दे गया जो आज भी नासूर बन चुभते हैं ।
क्यों सुरेश क्यों..? क्यों इतनी नफरत थी मुझसे..?आज बारह दिसंबर आज ही के दिन हमारी शादी हुई थी। मुझे हमेशा याद रहा पर तुम्हें जब जब याद आया तब तब एनिवर्सरी पर मुझे थप्पड़ ही उपहार में मिले। दिल में उठती कसक से दीक्षा के आँसू बहने लगे।
"आज बहुत दर्द हो रहा है माँ..?"
"यह दर्द कभी कम हुआ जो अब होगा ?"
"मतलब..?"
क्या मतलब समझाती दीक्षा।"तू घर चल तुझे भूख लगी होगी..!" इतना कहकर दीक्षा ने अपनी आँखें मूँद ली और कार की सीट से टिककर बैठ गई।
अनुराधा चौहान 'सुधी'स्वरचित
Saturday, July 9, 2022
सही निर्णय
"प्रभा मौसम बहुत सुहाना हो रहा है और वीकेंड भी आ रहा है।आज रात को मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने घूमने का प्लान बनाया है। तुम फटाफट बैग्स पैक कर लो आज ही निकलेंगे..! विकास ने ऑफिस का बैग टेबल पर रखते हुए कहा।
"विकास आप बहुत भींगे हुए हो। पहले जल्दी से कपड़े चैंज कर आओ वरना ठंड लग जाएगी। मैं चाय बनाकर लाती हूँ ।फिर बात करते हैं...!प्रभा ने टॉवेल पकड़ाते हुए कहा।
"ओके माई डियर...! विकास कमरे की ओर चला गया।
"आज मौसम बहुत ठंडा हो रहा है।साथ में कुछ गरम खाने के लिए बना लेती हूँ। विकास को अच्छा लगेगा...!" प्रभा चाय के साथ पकोड़े तलने लगी।
"वाह पकोड़े...!!!!प्रभा तुम कैसे मेरे मन की बात समझ लेती हो यार? सच्ची आज ऑफिस से निकला तो यही सोचकर निकला था कि तुम्हारे लिए बाबूलाल की दुकान से गर्मागर्म पकौड़े ले जाऊँगा।पर यह कमबख्त बरसात तेज होती गई तो चुपचाप घर चला आया..!यह कहकर विकास पकोड़ों का आनंद लेने लगा।
"अच्छा? और इस तेज बारिश में आपको तो ऐसे मौसम में घूमने जाना है...?प्रभा व्यंग्य से हँसी और चाय की चुस्कियांँ लेने लगी।
"हाँ जाना है ना, इसमें हँसने वाली क्या बात है? बहुत दिनों बाद अकेले रहने का मौका मिला है तो कहीं एंजॉय करके आते हैं।तुम बैठी क्यों हो?अब चलो जल्दी से पैकिंग शुरू कर दो..!"विकास ने पूछा।
"सॉरी विकास..पर हम कहीं नहीं जा रहे।अभी बरसात बहुत तेज है जब बरसात कम होगी तब घूमने का सोचेंगे..!प्रभा ने कहा।डेढ़ साल भर पहले ही विकास की शादी हुई तभी घूमने गए थे। विकास को मौका मिला तो फिर से घूमने जाने का प्लान बना लिया।दो दिन के लिए प्रभा के सास-ससुर अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गए थे।
"तुम बहुत बोरिंग हो प्रभा..हुंहू! विकास ने गुस्सा होते हुए कहा।
"विकास आप बेकार ही नाराज होने लगे।जोर देखो बारिश का..? कम होता तो मौसम सुहाना लगता।ऐसी बरसात सिर्फ रुलाती है..!प्रभा बोली।
"अरे यार इस समय सभी लोग वाटरफॉल देखने और बारिश एंजॉय करने जाते हैं।हम अकेले नहीं, हमारे साथ आशीष और शशांक भी अपनी वाइफ को लेकर जा रहे हैं..!"
"वो जाते हैं तो जाने दो!मैं इतनी बारिश में न खुद जाऊँगी और ना आपको जाने दे सकती।विकास पापा जी कहकर गए हैं कि उनकी अनुपस्थिति में कहीं जाना नहीं।कभी कभी बड़े कुछ कहकर जाते हैं तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है..! हमें भी उनका कहा नहीं टालना चाहिए। वैसे भी सबसे ज्यादा दुर्घटनाएँ भी इसी समय बहुत होती हैं।बुरा वक्त कहकर नहीं आता। तुम देख रहे हो ना पिछले दो दिन से बहुत ज्यादा बरसात हो रही है?प्रभा बोली।
"पर मैंने उन्हें हाँ कर दी है..!
"तो क्या हुआ? कोई बहाना बनाकर मना भी तो किया जा सकता है..?या फिर सीधे सीधे कह दो मैंने आने से मना कर दिया है..!प्रभा ने कहा।
"ठीक है मना कर देता हूँ।पर आज के बाद कहीं चलने को मत कहना..! विकास ने फोन करके दोस्तों को मना कर दिया कि प्रभा इतनी तेज बारिश में वाटर फॉल्स देखने का रिस्क नहीं लेना चाहती।
"विकास आप बेकार ही नाराज हो रहे हैं। जोरदार बरसात देखने में अच्छी लगती है पर होती नहीं। आप समझदार हो फिर भी? मैं तो आपसे इतना ही कहूँगी घर पर बैठकर बरसात का आनंद लो घूमने का रिस्क नहीं।जब कम होगी तब चलेंगे...!
"मुझे अब कहीं नहीं जाना..! विकास रूठकर अंदर चला गया।
"लो अब बच्चों जैसे रूठ गए।खैर कोई नहीं मैं मना लूँगीं..!प्रभा मुस्कुराते हुए चाय के कप रखकर विकास की पसंद का खाना बनाने लगी।
"विकास आइए खाना लगा दिया है..!प्रभा ने आवाज लगाई। विकास...? प्रभा समझ गई विकास ऐसे नहीं आने वाला तो खुद कमरे में जाकर उसे मनाकर ले आई। खाना खाने के दौरान पूरे समय विकास चुप रहा और प्रभा ने भी कुछ नहीं कहा।
दूसरे दिन दोपहर में विकास अनमना सा बैठा टीवी देख रहा था।घूमने की बात से अभी तक उसका मूड खराब ही था।
विकास जरा न्यूज लगाओ देखें बारिश ने कहाँ कहाँ कहर बरपाया है...!प्रभा ने कहा।
विकास ने न्यूज लगाई वैसे ही उसके मुँह से "अरे बाप रे"निकल गया।
"क्या हुआ विकास..? प्रभा ने चौंककर पूछा।
टीवी में न्यूज थी। बरसात के मौसम मे वाटरफॉल में नहाने का लुत्फ उठाने गए पर्यटक अचानक से जलस्तर बढ़ जाने से फंस गए और कुछ तेज बहाव में बह गए। जिन्हें बचाने के लिए युद्धस्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है।"इस जगह ही हम सब जाने वाले थे प्रभा..?
"क्या.??ऐसी बारिश में घूमने का निर्णय ही बेवकूफी भरा था। देखा हो गया ना काण्ड ? इसलिए मैं जाने से मना कर रही थी। तुम्हारी जिद की वजह से आज हम भी पता नहीं किस हाल में होते?अब सोच क्या रहे हो?फोन करो आशीष वगैरह ठीक तो हैं..?
"सच्ची यार.. गुस्से में मैंने तुम्हें क्या कुछ नहीं कह दिया। आज तुम्हारे सही निर्णय के कारण ही हम घर पर सुरक्षित हैं। मैं अभी उन लोगों को कर पता करता हूँ। विकास ने फोन करके पता किया तो पता चला आशीष और शशांक के घरवालों ने भी प्रभा के मना करने पर उन्हें नहीं जाने दिया था इसलिए वो भी घर पर सुरक्षित थे और न्यूज देखकर प्रभा को धन्यवाद दे रहे थे।
"क्या हुआ सब ठीक है..? प्रभा ने पूछा।
"तुम्हारी वजह से आज हम सब सुरक्षित हैं प्रभा..!"
"मैं समझी नहीं..?"
"तुम्हारे मना करने पर आशीष और शशांक के घरवालों को भी एहसास हुआ कि यह घूमने का सही समय नहीं है। उन्होंने भी उन लोगों को मना कर दिया था..! विकास ने फोन पर हुई सारी बातें बताईं।
"थैंक गॉड..वो लोग भी सुरक्षित हैं।अब तो आप नाराज़ नहीं हो ना..? प्रभा ने मुस्कुराते हुए पूछा।
"नो डियर अब जब तक तुम नहीं कहोगी,हम कहीं घूमने का प्लान नहीं करेंगे..! विकास बोला।
"मैं नहीं पापा जी!वो ही कह गए थे कि बारिश में कहीं भी घूमने गए तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा और विकास को भी समझा देना...! प्रभा हँसते हुए बोली।
"क्या..? ओह तभी मैं सोचूं तुम इतनी समझदार कबसे हो गई..?यह सुनकर प्रभा हँसने लगी और उसे हँसता देख विकास भी हँसने लगा।
©®अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
Thursday, May 5, 2022
ज़िंदगी के बाईस बसंत
"रत्ना आज बहुत जोरों से भूख लगी है।चाय के साथ कुछ स्नैक्स भी ले आना..!"सौरभ ने ऑफिस से आते ही ऑफिस बैग रत्ना के हाथ में देकर टीवी ऑन किया और सोफे पर पसर गया।रत्ना बिना बोले चुपचाप अंदर चली गई।
"ऑफिस और आराम! मैं तो कहीं दिखती ही नहीं?आज मुझे सौरभ से बात करनी ही होगी..! रत्ना बड़बड़ाते हुए चाय और नाश्ता रेडी करने लगी।
"सौरभ चाय..!"
"हम्म रख दो..! रत्ना की ओर देखे बिना सौरभ ने जबाव दिया।
रत्ना ने चिढ़कर रिमोट उठाया और टीवी ऑफ कर दिया।
"यह क्या था..? सौरभ ने गुस्से से पूछा।
"तो क्या करूँ..? मैं पूरे दिन घर में अकेले बोर होती रहती हूँ इसी उम्मीद के साथ कि शाम को तुम आओगे तो हम दोनों कुछ वक्त साथ गुजारेंगे। मगर तुम हो कि तुम आते ही टीवी में नजरें गड़ा लेते हो।क्यों करते हो ऐसा..?
"कभी खुद को ठीक से देखा है..? नहीं देखी तो जाओ और आईने के सामने खुद को देखो ज़रा ?अस्त व्यस्त साड़ी,उलझे से बाल, मुस्कुराहट का तो कहीं नामोनिशान नहीं..? चेहरे पर जब देखो बारह बजे रहते हैं...!सौरभ चिढ़कर बोला।
"तो मेकअप करके बैठूँ..?घर में कौन सज-सँवर होकर बैठता है जरा बताना..?
"क्यों सजना सँवरना गुनाह है क्या..? मैं तुमसे मेकअप पोतने को नहीं कह रहा हूँ। थोड़ा तो खुद पर ध्यान दो। क्या तुम मेरे लिए चेहरे पर मुस्कान नहीं सजा सकती..? क्या वो औरतें नहीं जो ऑफिस से आने के बाद भी अपनी थकान भूलकर हमेशा चेहरे पर मुस्कान लिए रहती हैं ?
"वही औरतें सज सँवर पाती हैं जिन्हें कोई काम नहीं होता।मैं घर के काम करूँ या शृंगार करूँ..?
"जानता हूँ कितना काम है..! सौरभ धीरे से बोला।
"कुछ कहा तुमने..?
"रत्ना इस बड़े से घर में हम दो ही प्राणी हैं फिर भी तुम्हें समय नहीं मिलता..? तुम्हारी इसी शिकायत पर माँ ने काम वाली भी लगा दी थी पर फिर भी..? छोड़ो जाने दो, तुमसे बहस में कोई नहीं जीत सकता..! सौरभ कपड़े चैंज करने के लिए उठकर कमरे में जाने लगा।
"कामवाली के अलावा भी घर में कई काम होते हैं सौरभ..!अब रत्ना झगड़े के मूड में आ गई थी।
"कहा ना..बात खत्म करो!तुम ही मेहनत करती हो। और जो घर और बाहर दोनों जगह काम करती हैं वो सिर्फ खुद को मेनटेन रखने का ही काम करती हैं।हम मर्दों को भी ऑफिस में काम का कितना प्रेशर रहता है । कभी कभी बॉस की गालियाँ भी सुननी पड़ती हैं।पर फिर भी चेहरे से जताते नहीं और एक तुम रोनी सूरत बनाए रहती हो। रत्ना पहले तुम्हारे चेहरे को देखकर ही सारी थकान दूर हो जाती थी और अब..! सौरभ कुछ सोचकर चुप हो गया।
"और अब क्या..?कह दो दिल में जो जहर भरा है..!रुँआसी रत्ना की आवाज भारी हो गई।
"रत्ना प्लीज़ रोना मत शुरू करना। मैंने जो सच है वही कहा है। पहले तुम्हें शिकायत थी मम्मी और शिल्पा के कारण तुम्हें खुद के लिए समय नहीं मिल पाता इसलिए तुम खुद पर ध्यान नहीं दे पाती।अब तो मम्मी भी नहीं है।शिल्पा की शादी हो गई, मुकुल हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी कर रहा है।अब क्या वजह है..? सौरभ ने पूछा।
"सौरभ बढ़ती उम्र के साथ तुम सठियाने लगे हो..? बाइस साल हो चुके हैं हमारी शादी को,याद है या नहीं..? रत्ना ने कहा।
"मुझे सब याद है रत्ना..! जिंदगी के यह बाइस बसंत मुझे पतझड़ से कम नहीं लगे..!
"पतझड़ से क्या मतलब..? क्या तुम इतने सालों से मजबूरी में यह रिश्ता निभा रहे हो सौरभ..? सीधे सीधे क्यों नहीं कहते कि अब मुझसे मन भर गया..? रत्ना रोने लगी।
"बस शुरू हो गया तुम्हारा रोना ..?बस इसलिए मैं कुछ नहीं कहकर खुद को व्यस्त रखता हूँ..!
"मैं ही हमेशा ग़लत होती हूँ क्या..?
मैंने कब कहा तुम ग़लत हो..? मैं तुमसे थोड़ा सा अटेंशन ही तो माँग रहा हूँ।रत्ना सच में मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। मैं चाहता हूँ तुम हमेशा फूलों की तरह खिली खिली रहो।
"ऐसे..यह ताने सुनकर..?
ताने नहीं मेरी ख्वाहिश है रत्ना..!अरे बढ़ती उम्र के साथ पति-पत्नि के रिश्ते की खूबसूरती दिन पर दिन निखरती जाती है।मैं हर दिन इसी उम्मीद से घर लौटता हूँ कि आज तुम मुस्कुरा कर मेरा स्वागत करोगी।पर तुम्हारा भावहीन चेहरा देखकर चुपचाप टीवी देखने लगता हूँ।एक बार पिछले बाइस साल में लौटकर देखो रत्ना तुमने कुढ़न ने ज़िंदगी के कई सुनहरे लम्हों को खो दिया है...!इतना कहकर सौरभ अपने कमरे में चला गया।
"सौरभ..! रत्ना ने हाथ बढ़ाकर रोकना चाहा पर नहीं रोक पाई।आज पहली बार तो नहीं,यह बात सौरभ कई बार कह चुके हैं। क्या सच में मैं ही जिम्मेदार हूँ..? रत्ना बीते लम्हों में साथ बिताए खुशी के लम्हे ढूँढने लगी।
सौरभ और रत्ना की अरेंज मैरिज थी। सौरभ जब पहली बार रत्ना से मिला तो उसे देखते ही हाँ कर दी थी।
"इस रिश्ते के लिए मेरी हाँ है। और आपका मेरे बारे में क्या ख्याल है..?सौरभ ने पूछा।
जबाव में रत्ना ने शरमाते हुए हाँ में सिर हिला दिया।
"रत्ना मम्मी को अर्थराइटिस की प्रॉब्लम है। अभी तो शिल्पा है तो उन्हें सहारा मिल जाता है। तुम सब सँभाल लोगी ना..? मैं मम्मी और शिल्पा छोटी सी फैमिली है मेरी..! सौरभ ने धीरे से कहा।
"आपकी फैमिली अब से मेरी भी फैमिली है सौरभ जी..! रत्ना का जवाब सुनकर सौरभ ने बाहर आकर मम्मी के कान में अपना निर्णय बता दिया।
"सौरभ ने हाँ कर दी भाईसाहब,अब बिटिया से भी पूछ लीजिए..! मालती ने कहा।यह सुनकर रत्ना की माँ अंदर गईं और आकर सबको मिठाई खिलाने लगी।
यह लीजिए मुँह मीठा कीजिए समधिन जी। हमारी बिटिया ने हाँ कर दी..!बड़ो के आशीर्वाद के साथ रत्ना और सौरभ शादी के पवित्र बंधन में बँध गए।
अभी हँसी-खुशी छः महीने ही बीते थे कि रत्ना ने सौरभ को हर बात के लिए टोकना शुरू कर दिया।
"शिल्पा आज घर पर कैसे..?
भैया वो मम्मी का दर्द बढ़ गया था तो उन्हें डॉक्टर के पास ले जाने के लिए जल्दी घर आ गई..!
"ठीक है मैं भी चलूँ..?
"नहीं भैया आप आराम करो, मैं दिखा लाती हूँ..! शिल्पा मालती को लेकर अस्पताल के लिए निकल गई।सौरभ ने रत्ना को छेड़ने के लिए पीछे से जाकर रत्ना को बाँहों में जकड़ लिया।
"अरे अरे पागल हो गए हो क्या..? रत्ना ने सौरभ को दूर हटाते हुए कहा।
सौरभ रोमांटिक मूड में था तो रत्ना की बेरुखी अनदेखा कर फिर से अपने करीब खींचने लगा।
"सौरभ मुझे इसके अलावा भी कई सारे काम हैं। अभी यह लोग आते ही खाना माँगेंगे। सुबह से रात हो जाती पर काम ही नहीं खत्म होता। तुम शिल्पा से कहो अपना टिफिन खुद बनाया करें। मैं कोई नौकरानी नहीं जो सुबह जल्दी उठकर उसके लिए टिफिन बनाऊँ..!
"कैसी बातें कर रही हो रत्ना..?क्या हुआ अगर दो परांठे उसके लिए भी बना दिए..? मेरे लिए तो बनाती हो ना..? तुम से किसी ने कुछ कहा क्या..? सौरभ ने पूछा।
"सौरभ कोई क्यों कुछ कहेगा? सबकी जरूरत जो पूरी हो रही है..!
"रत्ना क्यों थोड़े से काम के लिए सबके मन में खटास पैदा करना चाहती हो। तुम्हें पता है ना दो महीने बाद शिल्पा की शादी है..?
"हाँ तो ..?ससुराल में तो उसे अपना काम खुद करना ही होगा।तो अभी से क्यों नहीं..? रत्ना और सौरभ की झड़प चालू थी।माँ की फाइल घर पर छूट गई थी। उसे लेने आई शिल्पा दोनों की बहस सुनकर चुपचाप चली गई।
"अच्छा अभी मूड मत खराब करो यार। मैं मौका देखकर बात करता हूँ शिल्पा से,अब खुश..? सौरभ रत्ना को गले लगाते हुए बोला।
"दूर हटो सौरभ,कहा ना अभी नहीं..! रत्ना रसोई में बर्तन साफ करने लगी। सौरभ चुपचाप टीवी देखने लगा। शिल्पा किसी से कुछ कहे बिना सुबह उठते अपना और सौरभ का टिफिन बनाने लगी।
"शिल्पा कुछ हुआ है क्या..?
"कहाँ माँ..?
"रत्ना की जगह आजकल तुम टिफिन बनाने लगी..?
"माँ लेट न हो जाऊँ इस चिंता में जल्दी नींद खुल जाती है तो टिफिन बना लेती हूँ। वैसे भी मेरे जाने के बाद तो भैया को भाभी के ही हाथ का बना टिफिन ले जाना है..!
"हम्म वो तो है..! शिल्पा की बात सुनकर मालती भावुक होकर बोली। रत्ना टिफिन का काम कम होने से फिर खुश रहने लगीं।दो महीने बाद शिल्पा भी शादी करके अपने ससुराल चली गई। रत्ना की फिर से सुबह उठकर वही दिनचर्या शुरू हो गई।
एक शाम किचन में आकर"रत्ना मेरे साथ कमरे में चलो ।मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ..! सौरभ ने रत्ना के गालों से चिपकी लट पीछे करते हुए कहा।
"मेरे पास अभी टाइम नहीं है।यह सिंक देखो,बस बर्तन बाहर गिरने ही वाले हैं। इन्हें साफ करूँ या तुम्हारे साथ चलूँ..? रत्ना तुनक कर बोली।
"अरे यार मूड मत खराब करो। एक बार चलो ना,सच गिफ्ट देखोगी सब थकान दूर हो जाएगी..! सौरभ ने शिल्पा की कमर में हाथ डालकर कहा।
"फिर वही बात..?कितनी बार कहा एक नौकरानी रख लो तो मेरा कुछ काम कम हो जाए पर नहीं..! रत्ना ने सौरभ को बिना देखे बर्तन साफ करने शुरू कर दिए। सौरभ ने कमरे में आकर रत्ना के लिए खरीदे झुमके और गजरा दोनों साइड टेबल पर रख दिए और कपड़े बदलकर मम्मी के पास बैठ गया।
"सौरभ क्या हुआ..? मालती सौरभ का उदास चेहरा देखकर सब समझ गई थी।
"कुछ नहीं मम्मी..बस थोड़ी थकान हो रही है..!
"अच्छा सुन..! मैं कई दिनों से नोटिस कर रही हूँ कि बहू काम के कारण तेरी ओर ध्यान नहीं दे पा रही इसलिए मैंने आज खन्ना जी की मेड से बात कर ली है ।कल से दोनों टाइम के बर्तन और झाड़ू पोंछा कपड़े सब कर जाया करेगी..!
"आप सब जानती हैं मम्मी ..? सौरभ ने चौंककर पूछा।
" हम्म मालती ने हाँ में सिर हिलाया। सौरभ वैसे भी रत्ना माँ बनने वाली है।उसे आराम की जरूरत है। मुझे तो यह दर्द न चैन से जीने देता है और न मरने, बच्चे के जन्म के समय बाई से मुझे सहारा हो जाएगा..!
"ठीक है मम्मी..!मालती की तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी। घुटनों के दर्द की वजह से चलना दुश्वार हो रहा था। मुकुल के जन्म की खुशी ज्यादा दिन नहीं ठहरी। मुकुल के जन्म के छः महीने बाद रत्ना मायके गई थी। एक दिन बाई काम पर नहीं आई तो मालती अपने कपड़े धोकर सुखाने के लिए बाथरूम से निकली तो फिसलकर गिर पड़ी।
"सौरभ...!मालती जोरों से चिल्लाई पर घर में कोई नहीं था जो उनकी आवाज सुनता। सिर में गहरी चोट लगने से खून बहने लगा था।दर्द से कराहती मालती बेहोश हो गई।
"आज मम्मी पहली बार घर में अकेली हैं। मैं एक फोन कर लेता हूँ..! सौरभ लंच करने के बाद मालती का फोन ट्राई करने लगा। उसे क्या पता कि घर में मालती बेहोश पड़ी हुई है।
"मम्मी फोन नहीं उठा रहीं..? सौरभ मालती के फोन ना उठाने पर टेंशन में आ गया।"खन्ना आँटी को बोलता हूँ..!
"आँटी मम्मी आपके यहाँ हैं..?
"नहीं सौरभ.. मालती यहाँ नहीं आई। थोड़ी देर पहले मैं भी सरसों का साग और मक्के की रोटी लेकर गई थी तुम्हारे यहाँ पर शायद वो घर पर भी नहीं है..?
"नहीं आँटी मम्मी अकेले कहीं नहीं जाती। मैं अभी घर आ रहा हूँ ।देखता हूँ क्या बात है..!घर के मेन डोर तीन चाबियाँ थीं जिसमें से एक सौरभ घर में रखता था।एक अपने पास और एक रत्ना को मायके जाते समय दे दी थी।
"मम्मी...!ताला खोल सौरभ मालती के कमरे में आया तो खून से लथपथ मालती को देखकर उसकी चीख निकल गई।
"क्या हुआ सौरभ..? अरे यह क्या हुआ आँटी को ? सौरभ तुम आँटी को लेकर बाहर आओ मैं गाड़ी निकालता हूँ। विक्की ने कहा।
"मम्मी आपको कुछ नहीं होगा। मैं आ गया हूँ ना!बस अभी हम अस्पताल चलेंगे.. मम्मी आँखें खोलो.. सौरभ रोते हुए मालती को उठाकर बाहर भागा। विक्की ने तुरंत गाड़ी निकाली और दोनों मालती को अस्पताल के लिए लेकर निकल गए। मिसेज खन्ना ने शिल्पा को फोन कर सब बता दिया और शिल्पा ने रत्ना को फोन कर दिया।
"सौरभ हिम्मत रखिए.. मम्मी को कुछ नहीं होगा..! रत्ना ने सौरभ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा तो सौरभ फफककर रो पड़ा।
"मेरी ग़लती के कारण मम्मी की यह हालत हो गई रत्ना। आज मेड नहीं आएगी यह पता होने पर भी मैं उन्हें अकेला छोड़ ऑफिस चला गया। मम्मी का यह हाल मेरी ग़लती से हुआ है..! सौरभ ने रोते हुए कहा।
"भैया..!!
"शिल्पा तू..? शिल्पा को देखते ही सौरभ उठकर उससे लिपट गया।
"भैया खन्ना आँटी ने फोन कर सब बता दिया है। मम्मी ठीक तो हो जाएंगी ना भैया..?
"पता नहीं अंदर क्या चल रहा है..? मम्मी रिकवर कर रही हैं या नहीं..?मेरा दिल बैठा जा रहा है..! सौरभ ने कहा।
तभी आइसीयू का दरवाजा खुला और डॉक्टर बाहर निकल कर आए।"सॉरी हमने उन्हें बचाने का हर संभव प्रयास किए पर खून अधिक बह जाने के कारण उन्हें बचा नहीं पाए।यह सुनते ही सौरभ और शिल्पा फूट-फूटकर रो पड़े। मालती के तेरहवी तिथि के बाद शिल्पा अपनी ससुराल लौट गई।अब रत्ना भी सौरभ को समय देने लगी थी।बस कुछ समय सौरभ और रत्ना के बीच सब ठीक रहा।
"रत्ना कहाँ चलीं ?चाय रखकर वापस जाती रत्ना का हाथ पकड़कर सौरभ बोला।"यार कभी तो मेरे पास भी बैठ लिया करो..!
"अभी नहीं सौरभ.!! अभी मुझे मुकुल का होमवर्क पूरा करवाना है।खाना भी बनाना है। उसे खाना खिलाकर समय पर सुलाना है..!
"बस पाँच मिनट यार!! अभी तो बस सात बजे हैं..? तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है रत्ना। सौरभ ने कहा।
"तो ट्यूशन लगा दो मुकुल की..? तुम्हें क्या पता उसे होमवर्क कराने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है..?
"ट्यूशन..?अभी पाँचवी क्लास में है बच्चा और उस पर ट्यूशन की भी बोझ डाल दूँ..?जाओ मत बैठो, तुम होमवर्क कराओ जाओ..! सौरभ अखबार उठाकर पढ़ने लगा। ऐसे ही समय पंख लगाकर गुजरता रहा।कभी खुशी से तो कभी मजबूरी और कभी जबरदस्ती दोनों अपनी जरूरतें पूरी करते रहे।
"रत्ना यह देखो क्या लाया हूँ..!
"क्या है..? साड़ी अरे वाह..!
"रत्ना आज हमारी शादी को अठारह साल पूरे हो गए तो मैंने सोचा आज कहीं घूमने चलते हैं।सारा दिन साथ बिताएंगे और खाना भी बाहर खाएंगे..! सौरभ ने कहा।
"वाह कितनी सुंदर है। बाहर..? सौरभ मैं तो तुम्हारे साथ आज माँ के यहाँ बसंत नगरी जाने का प्लान बनाए थी।कल मुकुल हॉस्टल जा रहा है इसलिए माँ मुकुल के साथ कुछ समय बिताना चाहती हैं।मैंने माँ को फोन करके बता दिया था कि हम वहीं पार्टी करेंगे तो भाभी ने हमारी शादी की सालगिरह के सेलीब्रेशन के लिए बहुत सारी तैयारियाँ कर रखीं हैं..!
"रत्ना तुम जानती हो ना यह दिन मेरे बहुत खास है?इसे मैं सिर्फ तुम्हारे साथ बिताना चाहता था।तुम्हें एक बार तो मुझसे पूछना चाहिए था..! सौरभ धीरे से बोला।
"सॉरी सौरभ..अब मना कैसे करूँ..?चलो ना चलते हैं..! रत्ना सौरभ के गले में बाहें डालकर बोली। सौरभ को तो बस रत्ना का प्यार चाहिए था।वो उसकी प्यार भरी मनुहार ठुकरा नहीं सका और हाँ कर दी।
"कैसी लग रही हूँ..? रत्ना सौरभ की दी हुई साड़ी पहन कर तैयार हो गई।
"बहुत ज्यादा सुंदर..!!रत्ना मैं तुम्हें हमेशा ही इस रूप में देखना चाहता हूँ। तुम ऐसे ही बनठन कर रहा करो..! सौरभ खुश होकर बोला।
"ऐसे..? सौरभ घर के काम से फुर्सत कहाँ मिलती है..? अभी मुकुल आगे की पढ़ाई करने हॉस्टल जा रहा है।तब काम कम हो जाएगा तो तुम्हारी यह इच्छा भी पूरी कर दूँगी।चलें..?
"हम्म चलो..मुकुल क्लास से वहीं आने वाला है..?
"हाँ मैंने उसे सुबह ही बता दिया बस तुम्हें ही बताना भूल गई थी..! रत्ना ने दरवाजा लॉक किया और सौरभ ने गाड़ी बाहर निकाल ली, दोनों बसंत नगरी के लिए निकल गए।रात भर खूब एंजॉय किया। सौरभ मायके में रत्ना के चेहरे की चमक देखकर हतप्रभ था। मुकुल दूसरे दिन अपने मामा के साथ दिल्ली के लिए निकल गया।बेटे की याद में रत्ना उदास रहने लगी।
"रत्ना यह क्या शक्ल बनाए रहती हो..? मुकुल तो अब पहले की तरह हमारे साथ रहे,यह मुमकिन नहीं। तुम्हें खुद को बदलना होगा।अभी पढ़ाई, फिर नौकरी कहाँ ले जाए ?या फिर विदेश..? अरे यार खुश रहो, मुस्कुराओ,देखो ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है..!
"आपको तो मेरी शक्ल से ही चिढ़ है..? मुकुल अपनी माँ को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला। देखना पढ़ाई पूरी होते ही यहीं नौकरी ढूँढेगा..! सौरभ कुछ नहीं बोला।
तभी डोरबेल बज उठी और उसकी आवाज से रत्ना ख्यालों से बात निकल आई। रत्ना ने उठकर दरवाजा खोला तो बाहर मिसेज खन्ना खड़ी थी।
"अरे आँटी आप ? आइए अंदर आइए।आप कहीं बाहर जा रही हैं क्या..? मिसेज खन्ना को तैयार देख रत्ना ने पूछा।
"नहीं क्यों..?
"वो आपको तैयार देखा बस इसलिए..!
"मैं तो हमेशा ही ऐसे ही रहती हूँ,कभी गौर नहीं किया क्या ? मैं यह प्रसाद देने आई थी। विक्की वैष्णो देवी के दर्शन करके आया है।
"पैंसठ साल की उम्र में खन्ना आँटी खुद को इतना मेनटेन रखती हैं तो मैं क्यों नहीं..? रत्ना ने खुद को जाकर आईने में निहारा।उलझे और अधपके बाल,अस्त व्यस्त साड़ी, खन्ना आँटी के मुकाबले अपने आप को देख पैंतालीस की उम्र में साठ वाली फीलिंग आने लगी।
"सही तो कहते हैं सौरभ, मैंने ज़िंदगी के बाईस बसंत कुढ़-कुढ़कर निकाल दिए।सच कैसी लगने लगी हूँ मैं..? मैंने ना तो अपने छोटे से परिवार को सही से सँभाला न कभी खुद की केयर की। रत्ना ने सौरभ का हेयर कलर उठाया और अपने बालों को कलर कर सूखने छोड़ दिया और रात का खाना बनाने लगी।
"खाना तो बन गया।अब बाल धोकर तैयार हो जाती हूँ फिर सौरभ को जगाऊँगी।सौरभ रत्ना की बहस से बचने के लिए कमरे में आकर सो गया था।
रत्ना ने बाल सुखाकर खुद को आईने में देखा तो अपने चेहरे में फर्क देखकर मुस्कुरा उठी। उसने बालों को सँवारकर जूड़ा लगाया और होंठों पर हल्की सी लिपस्टिक लगाकर साड़ी का पल्लू ठीक किया ही था कि "यह हुई ना बात.. वाह यह है मेरी असली रत्ना..! सौरभ ने आकर उसे बाहों में जकड़ लिया।
"सौरभ छोड़िए ना..! रत्ना शरमाते हुए बोली।
"बस यही छोटा सा बदलाव चाहता था रत्ना।देखो कोई है जो खूबसूरती में तुम्हें टक्कर दे सके..?लगता है इस बार बसंत समय से पहले ही अपनी महक बिखेरने लगा..!
"हाँ सौरभ मैं तुम्हारी बातों की सच्चाई समझ गई। मैं पिछले बाईस बसंत की भरपाई तो नहीं कर सकती पर अब आने वाला हर बसंत ऐसे ही महकेगा..!
तय कर लिया है मैंने
सदा रंग प्रेम है रंगना
कभी ना लागे अब फीका
खुशियों का यह अँगना
रिश्ता तेरा मेरा..रिश्ता तेरा मेरा.. गुनगुनाते हुए रत्ना सौरभ के सीने से लग गई।
©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
Monday, April 11, 2022
माँ का दर्द
सुबह पाँच बजे घड़ी के अलार्म सुनते ही बिस्तर छोड़ते हुए रमा ने नीलू को प्यार भरी नजर से देखा और सिर पर हाथ फेरकर कमरे से बाहर निकल गई।
सास-ससुर और ननद अभी गहरी नींद सो रहे थे।रमा नहाकर सीधे रसोईघर में चली आई और सुबह का नाश्ता और सास-ससुर के लिए दोपहर का खाना बनाकर अपना और ननद नुपुर का टिफिन पैक करके सबको चाय देने लगी।
"नुपुर उठो चाय पी लो..!"
"हम्म भाभी रख दो..! नुपुर ने आँखें खोले बिना जबाव दिया।
"रख दो नहीं,जल्दी से उठ जाओ वरना लेट हो जाओगी..! मैं माँ पापा को चाय देकर निकल जाऊँगी। मैंने तुम्हारा टिफिन पैक कर दिया है तो लेती जाना..!
"ओके भाभी..! नुपुर ने उठते हुए कहा।
"माँ आपकी और पापा की चाय..! मैं जा रही हूँ,आप लोगों के लिए खाना बनाकर रख दिया है।
"हम्म रख दो और जाओ..! सुहासिनी धीरे से बोली।
"नीलू मेरा प्यारा बच्चा..उठ चल नानी के पास.. मम्मा को देर हो रही है।
"ओ नो मम्मा मुझे अभी और सोना है..! नीलू ठिनककर चादर में लिपट गई।
"प्लीज़ बच्चा.. मम्मा लेट हो गई तो उसे भी पनिशमेंट मिलेगी जैसे आपकी टीचर उधम मचाने वाले बच्चों को देती है।आज आपका टेस्ट भी है ना..?
"आज उसका मन नहीं तो रहने दो ना यहीं..! सुहासिनी ने बाथरूम की ओर जाते हुए कहा।
"माँ यहाँ रहेगी तो पूरा दिन आपको तंग करेगी।चल बच्चा देर हो रही है..!
"नहीं परेशान करूँगी मम्मा..! नीलू ने उठते हुए कहा।रमा ने नीलू की बात अनसुनी करते हुए स्कूल ड्रेस बैग में रखी और नीलू को गोद में लेकर निकल गई। सुहासिनी खिड़की में खड़ी उसे जाते देख बड़बड़ाने लगी।
"अब तो रमा के मायके में सब ठीक हो गया फिर यह रमा क्यों नीलू को मायके छोड़ जाती है। इसके कारण पूरे मोहल्ले में मेरी ही चर्चा रहती है कि कैसी सास है जो अपनी पोती को नहीं सँभाल सकती...!"सुहासिनी बड़बड़ाते हुए प्रकाश से बोली।
"भाभी की क्या ग़लती मॉम..? आपने ही नीलू को सँभालने के लिए मना किया था कि मेरी तबियत ठीक नहीं रहती,अपनी बेटी को अपनी माँ के यहाँ छोड़ो फिर ऑफिस देखो।क्यों डैड..?गलत कह रही हूँ ?यही कहा था ना मॉम ने..? नुपुर की बात पर प्रकाश ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
"डैड आप हर बार चुप क्यों हो जाते हो..? चुप रहने की जगह कभी तो माँ को समझाया कीजिए..? और मॉम आप? अब आपको ही उस नन्ही बच्ची को सँभालना भी पसंद नहीं। भैया के सामने तो नीलू पर जान लुटाती थीं आप ?
"देख नूपुर सुबह सुबह स्मुझसे बहस तो कर नहीं..! सुहासिनी उठकर गमलों में पानी डालने लगीं।
मॉम भैय्या जिंदा थे तब तो आप कितना प्यार करती थीं भाभी से और नीलू से,अब क्या हुआ..? पिछले दो साल से भाभी ही हम सबको इस घर का बेटा बनकर सँभाल रही हैं। आप भी तो दादी का फर्ज निभाइए..?
"तुझे आज ऑफिस नहीं जाना ?बोला न बहस मत करो।बड़ी आई भाभी की चमची।मेरी तो किस्मत ही खराब है जो इस कोरोना ने काल बनकर मेरा प्यारा बेटा छीनकर हमसे सारी खुशियाँ छीन ली और बेटी को अपनी माँ का दर्द नहीं दिखता।हमारा वंश ही मिट गया..!सुहासिनी की आँखों से आँसू छलक पड़े।
"नुपुर क्यों माँ को दुखी कर रही हो..?वो जैसी भी अच्छी है। तुम तो कम से कम अपने और उसके रिश्ते का लिहाज करो।वो माँ है तुम्हारी..! प्रकाश सुहासिनी को रोते देख चुप न रह सके। प्रकाश को नाराज होते देख नुपुर वहाँ से चुपचाप चली गई।
एक गली छोड़कर ही रमा की माँ का घर था।रमा और पियूष एक ही कम्पनी में काम करते थे। वहीं से उनकी पहचान हुई जो जो प्यार में बदल गई।बाद में दोनों ने परिवार वालों की सहमति से शादी कर ली। जिसमें सबकी सहमति थी सिवाय सुहासिनी के।उन्हें रमा नहीं अपनी भाभी की भतीजी अलका बहू के रूप में चाहिए थी।
"रमा मेरी माँ तुमसे ज्यादा देर तक नाराज़ नहीं रहेंगी।वो ऊपर से कड़क पर अंदर से बहुत नर्म दिल हैं। तुम्हें अपना भी लेंगी तो भी ऐसी ही रहेंगी। और एक बात,वो जल्दी अपने जज्बात किसी को दिखाती नहीं।
"पियूष माँ सिर्फ माँ होती है। तुम देखना जल्दी ही वो मुझे दिल से आशीर्वाद देंगी..!
"जरूर देंगी रमा..! तुम हो ही इतनी अच्छी, एक न एक दिन उन्हें भी यह एहसास हो जाएगा कि उनके बेटे ने उनके लिए हीरा चुना है..! पियूष ने रमा को गले लगाते हुए कहा।
शादी के बाद सब बहुत अच्छा चल रहा था।घर में एक नन्ही परी भी आ गई थी। सुहासिनी भी अपनी बहू और पोती के साथ ज़िंदगी का आनंद ले रही थीं। एक दिन पियूष बीमार हो गया। उसने खुद को क्वारंटाइन कर लिया क्योंकि तब तक कोरोना ने अपने पैर पसार लिए थे।
"पियूष प्लीज़ डॉक्टर से दवा ले लिजिए कहीं कोविड का इंफेक्शन तो नहीं हो गया..?रमा चिंतित होकर बोली।
"रमा तुम बेकार ही चिंता कर रही हो। मुझे कुछ नहीं हुआ बस मामूली बुखार है..!"पियूष के लगातार गिरते स्वास्थ्य को देखकर रमा मन ही मन डर रही थी।प्रकाश के समझाने पर भी पियूष नहीं माना तो रमा ने अपने छोटे भाई अमित को फोन करके पियूष की हालत के बारे में बताया।
"जीजू एक हफ्ते से बीमार हैं दी और आप हमें आज बता रही हो..? आप चिंता मत करो दी मैं और पापा अभी गाड़ी लेकर आ रहे हैं और उनके सारे टेस्ट करवाते हैं..! अमित और शर्मा जी पियूष को हॉस्पिटल ले गए और जिस बात का डर था वही हुआ।पियूष को कोविड ही हुआ था।
"दी जीजू को कोविड हुआ है..!
"क्या..? रमा यह सुनकर सिर पकड़कर बैठ गई। पियूष को कोविड..?यह बात जानकर सभी रोने लगे।घर के सभी लोगों का कोविड टेस्ट हुआ पर किसी को भी संक्रमण नहीं हो पाया था क्योंकि पियूष पहले ही क्वारंटाइन हो गया था।
"बहू घबराने की जरूरत नहीं, मैं हूँ ना!सुहासिनी प्लीज़ तुम तो हिम्मत से काम लो, हमारे पियूष को कुछ नहीं होगा। मैं अपनी सारी पूँजी लगा दूँगा पर अपने बेटे को कुछ नहीं होने दूँगा..!कोविड पॉजिटिव सुनकर खुद डरे हुए प्रकाश अपने परिवार को दिलासा दे रहे थे।
पियूष की हालत बिगड़ती जा रही थी।कोविड के कारण पियूष के फेफड़ों में बहुत अधिक संक्रमण फेल गया था जिस वजह से उसे साँस लेने में दिक्कत होने लगी थी। डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बाद भी उसे बचाया न जा सका।रमा की खुशियों को कोरोना महामारी ने निगल लिया था।
अभी एक हफ्ता भी नहीं हुआ कि एक दिन.."क्या कह रही हो पीहू..? अमित और पापा भी संक्रमित हो गए ?हे भगवान यह सब हमारे साथ ही होना था क्या..?अभी पियूष की चिता की आग ठंडी भी नहीं हो पाई थी कि रमा के पिता और भाई भी हॉस्पिटल में एडमिट हो गए।
"क्या हुआ भाभी..? नुपुर रमा की आवाज सुनकर उसके कमरे में चली आई।
"नुपुर..रमा रोते हुए नुपुर से लिपट गई।
"भाभी आप रो रहे हो..?
"नुपुर पियूष को हॉस्पिटल ले जाने और एडमिट करने तक अमित और पापा पियूष के संपर्क मे थे।इस वजह से वो भी संक्रमित हो गए..!
"क्या..? नुपुर भी यह सुनकर घबरा गई।रमा का परिवार अभी इस संकट की घड़ी से उभरा भी नहीं था कि अमित और शर्मा जी के कोविड पॉजिटिव होने से फिर सब दुखी हो गए।
"मैं माँ के पास जाऊँ माँ..?रमा ने सुहासिनी से पूछा।
"नहीं कोई जरूरत नहीं..! पियूष की जरा-सी लापरवाही ने आज दोनों परिवारों को इतने बड़े संकट में डाल दिया।वो तो हमें ज़िंदगी भर का दर्द देकर चला गया।पर अब कोई लापरवाही नहीं, नीलू अभी तीन साल की छोटी-सी बच्ची है उसे देखो..!कड़क लहजे में इतना कहकर सुहासिनी अपने कमरे में चली गईं।
"मॉम सही ही कह रहीं हैं भाभी..! इतना कहकर नुपुर भी वहाँ से चली गई।इस विकट स्थिति में मायके वालों का सहारा न बन पाने की पीड़ा से रमा के आँसू छलक पड़े।पीहू और कांता जी को हल्के लक्षण थे तो दोनों जल्दी स्वस्थ हो गए पर अमित और शर्मा जी भी काल की भेंट चढ़ गए।रमा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वहीं कांता किस्मत की दोहरी मार से डिप्रेशन में चली गईं।
रमा इस हालत में उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती थी तो उन्हें कुछ दिनों के लिए अपने घर ले आई।कांता की हालत देखकर सुहासिनी ने भी उसके फैसले पर कोई प्रश्न नहीं उठाया।
"बहू अब कैसे क्या होगा..? मेरी तो सेविंग भी खत्म हो गई..!रमा से बात करते हुए प्रकाश दुःखी हो रहे थे। अभी तो नीलू का भी एडमिशन कराना है।समधिन जी और पीहू की जिम्मेदारी, नुपुर के एम बी ए फाइनल इयर की फीस, उसके फाइनल एग्जाम जो बाकी हैं..!
"पापा थोड़े दिन की तकलीफ़ है फिर सब ठीक हो जाएगा। पापा हम दोनों ने ही नीलू के जन्म के बाद से उसके भविष्य के लिए अलग से सेविंग शुरू कर दी थी।तीन साल की बचत में हमारे पास इतना बैलेंस है कि उसमें नुपुर की फीस भी भर जाएगी और नीलू की एडमिशन भी, फिर मेरी तनख्वाह तो है ही,आप चिंता मत करिए सब ठीक हो जाएगा..!
"बेटा तुम अकेले कैसे मैनेज करोगी..?"
"पापा अकेली कहाँ..?यह नुपुर का लास्ट सेमेस्टर है। उसके बाद उसे भी जल्दी ही अच्छी जॉब मिल जाएगी। फिर देखना सब ठीक हो जाएगा..!रमा ने प्रकाश को सांत्वना देते हुए कहा।
"दी..आपके साथ रहते हुए छः महीने हो गए।माँ अब पूरी तरह से ठीक हो चुकी हैं।अब हमें अपने घर चले जाना चाहिए..!
"क्यों यहाँ कोई तकलीफ़ है..?रमा ने पूछा।
"नहीं दी..यहाँ कोई तकलीफ़ नहीं,अब स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई है।सोच रही हूँ अपनी पढ़ाई के साथ साथ ऑनलाइन ट्यूशन शुरू कर दूँ। आप कब तक हम सबको अकेले सँभालती रहेंगी.. ?
"क्यों बेटा होती तो नहीं सँभालती..?रमा बोली।
"बेटा पीहू सही कह रही है। फिर बेटी की ससुराल में हमेशा तो यह नहीं सकते। तेरी हिम्मत देखकर अब हमें भी हालात का सामना करने की हिम्मत आ गई है..! कांता ने कहा।
"माँ..?
"जाने दो बहू..जो सुकून इन्हें वहाँ मिलेगा वो यहाँ कहाँ? वैसे भी अपना घर अपना ही होता है।पीहू भी बड़ी है वो सब सँभाल लेगी।और फिर घर दूर कहाँ जाना है..? कभी कभी तुम भी चक्कर लगा आना..!सुहासिनी बोली तो रमा चुप हो गई। पीहू और कांता अपने घर रहने चले गए।
"मॉम दरवाजा बंद कर लो, मैं ऑफिस जा रही हूँ। नुपुर की आवाज सुनकर सुहासिनी सोच के दायरे से बाहर निकली और उठकर बालकनी में चली गईं।
" नानी..! नीलू दौड़कर नानी से लिपट गई।
"आ गई मेरी लाडो..!कांता ने पौधों में पानी डालना छोड़ नीलू को गोद में उठा लिया।
"नानी मैं भी डालूँ पानी..?"
"हाँ हाँ क्यों नहीं,जाओ मैं पानी चालू करती हूँ..!कांता ने नल धीमा चालू कर दिया और नीलू पौधों में पानी डालने लगी।
"माँ पीहू को कहना आज से नीलू के एग्जाम है तो इसे ड्रेस पहनाकर ऑनलाइन बैठाए। और इसमें इसका टाइमटेबल है तो..."अरे दीदी मुझे सब पता है। मैं ही दिन भर पढ़ाती और खिलाती हूँ..!रमा की आवाज सुनकर पीहू भी लॉन में आ गई थी।
"ओके बाबा सॉरी..चलती हूँ माँ..!"
"बेटा ऐसा कब तक चलेगा..?"
"मतलब..? मैं कुछ समझी नहीं..?
"बेटा गलत मत समझना।हम नीलू को सँभालने के विषय में नहीं कह रहे और न कह सकते हैं क्योंकि नीलू में हम लोगों की जान बसती है।पर जो लोग तेरी बच्ची नहीं संभाल सकते, उनके साथ रहने का क्या फायदा..? मैं तो कहती हूँ अपना सामान उठा और आजा मेरे पास..!
"माँ यह आप कह रही हो..? पियूष होते तो क्या तब भी आप मुझे घर छोड़ने को कहती..? नहीं ना..?माँ रिश्ते निभाना मैंने आपसे ही तो सीखा है। पापा तो नीलू को सँभालने को तैयार रहते हैं पर उनका बैकबोन का प्रॉब्लम बढ़ गया है इसलिए उन्हें रेस्ट की जरूरत है। आज तो माँ भी उसे घर छोड़ने को कह रही थीं।पर यह उन्हें परेशान कर डालेगी। मैं तो पूरे दिन के लिए चली जाती हूँ अब आप ही बताइए फिर कैसे इसे वहाँ छोड़ दूँ..?
"रहने दे रहने दे, ज्यादा अपनी सास की तरफदारी मत कर, मैं सब समझती हूँ।जब घर से काम करती थीं तब क्या..?तब भी उनके आराम में खलल न पड़े,इसे पूरा दिन यहाँ छोड़ना पड़ता था..! कांता चिढ़कर बोलीं।
"आपको भी तकलीफ़ है क्या..? अगर हाँ तो कल से नीलू को पालनाघर में छोड़ दिया करूँगी..!
"मेरे कहने का यह मतलब नहीं था रमा ।बेटा मेरी बात को गलत मत समझ, मैं तो बस यह कहना चाह रही थी कि सुहासिनी जी मेरी ही उम्र की हैं। फिर भी एक बच्ची को नहीं सँभाल सकती..?पांँच साल की हो गई नीलू, इतनी प्यारी बच्ची को देख पत्थर भी पिघल जाए और तेरी सास तो पता नहीं किस मिट्टी की बनी है। मैं तो कह रही हूँ सब छोड़कर आजा वापस..!
"माँ यह यहाँ आपको परेशान नहीं करती पर वहाँ बहुत उधम मचाती है। इस नटखट को सँभालने में माँ का ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है और कुछ नहीं, वरना वो भी नीलू पर जान छिड़कती हैं।अच्छा चलती हूँ, अभी इन सब बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है..!!रमा ऑटो पकड़कर ऑफिस के लिए निकल गई।
"दी रुको...! पीहू रमा को आवाज देते हुए बाहर आई तब तक रमा निकल गई।
"क्यों क्या हुआ..? कांता ने पूछा।
"दी जल्दी में सिर्फ ड्रेस दे गईं और बुक्स घर पर भूल गईं।अब कैसे पढ़ाऊँ..?
"तू ले आ जाकर,उस बेचारी को सुबह सुबह बहुत काम रहता है इसलिए भूल गई होगी ?यह छोटे छोटे काम सुहासिनी जी भी कर सकतीं हैं पर करेंगी नहीं..! कांता बड़बड़ाने लगी।
"ठीक है अभी कपड़े चैंज करके जाती हूँ..!यह कहकर पीहू अंदर चली गई।
बाहर हवा अच्छी चल रही थी तो सुहासिनी दरवाजा खुला छोड़ बालकनी में आकर गार्डन में खेलते बच्चों को देखने लगी। प्रकाश भी कुर्सी लेकर उसके पास बैठ गए।
"सुहासिनी बहुत मिस करती हो ना नीलू को..?
"हाँ प्रकाश.. उसके बिना यह घर घर नहीं लगता।शाम को जब तक घर नहीं आ जाती तब तक मेरा दिल उसके लिए तड़पता रहता है।अब कांता जी पूरी तरह ठीक हो गईं हैं।अब रमा को उसे मायके ले जाना बंद कर देना चाहिए..!
"तो तुम कह क्यों नहीं देतीं..?"
"आज भी कहा उससे,पहले भी कई बार कह चुकी हूँ और कैसे कहूँ...?"
"नीलू को कांता जी के पास छोड़ने की बात के पीछे तुम्हारा कितना बड़ा त्याग है यह किसे पता? तुम रमा से मन की बात कहोगी नहीं तो उसे कैसे समझेगा सुहासिनी..? तुमने नीलू को सँभालने को क्यों मना किया,अभी भी यह बात बहू और उसके घरवालों से छुपाने की क्या जरूरत है..?
"क्योंकि मुझे महान नहीं बनना। आपको भी किसी को कारण बताने की कोई जरूरत नहीं कि मैंने कांता जी के अकेलेपन को दूर करने के लिए नीलू को सँभालने से मना किया था। प्रकाश मुझे फर्क नहीं पड़ता कोई मेरे बारे में क्या सोचता है। मैं बुरी तो बुरी सही,पर अब जिस उद्देश्य से मैंने यह निर्णय लिया था वो पूरा हो गया है।तो अब मुझे नीलू का दूर जाना अखरने लगा..!
"जानता हूँ सुहासिनी और तुम पर गर्व भी करता हूँ कि अपने बेटे का दर्द भुलाकर,अपनी लाड़ली पोती को खुद से दूर करके तुमने कांता जी को डिप्रेशन से बाहर आने में बहुत बड़ी मदद की है..!
"माँ हूँ ना..! एक माँ का दर्द दूसरी माँ नहीं समझे तो उसके माँ होने पर धिक्कार है। कांता जी यहाँ ज्यादा रहना नहीं चाहती थीं इसलिए मैंने भी उन्हें जाने से नहीं रोका था।पर अपने घर जाकर फिर से अपने पति और बेटे की याद में रो-रोकर फिर डिप्रेशन में ना चली जाएं इसलिए नीलू की जिम्मेदारी खुद लेने की बजाय उन पर डाल दी ताकि वो व्यस्त रहें..!
"जानता हूँ सुहासिनी..! तुम्हारे इस निर्णय से कांता जी नीलू को सँभालने में व्यस्त रहने लगीं। इससे उनका अकेलापन दूर हुआ और उनकी स्थिति में दिन प्रतिदिन सुधार होता गया और आज वो पूर्णतः स्वस्थ हो गईं हैं..!
"आँटी..!
"पीहू तुम..? इतनी सुबह कैसे..?सब ठीक है..?पीहू की आवाज सुनकर सुहासिनी चौंककर पीछे देखने लगी।
"सब ठीक है आँटी।वो दी आज जल्दीबाजी में नीलू की बुक्स यहीं भूल गईं हैं। मैं जाकर ले लूँ..?
"हम्म जाओ रमा के कमरे से जाकर लेलो..! सुहासिनी धीरे से बोली।
"थैंक यू आँटी..?पीहू सुहासिनी से लिपट गई।
"अरे अरे इसमें लिपटने वाली और थैंक यू कहने वाली क्या बात हो गई...? सुहासिनी इतने सालों में पहली बार पीहू को अपने गले लगने पर आश्चर्यचकित हो गई।
"मेरी माँ का दर्द समझने के लिए थैंक यू आँटी।पर एक बात नहीं समझी आँटी इसमें छुपाने वाली क्या बात थी..? यह बात आप सीधे सीधे दी को बता सकती थीं कि आपने नीलू को माँ के पास छोड़ने का निर्णय क्यों लिया..?
"पियूष के जाने की पीड़ा तो हम तीनों ही झेल रहे थे।पर एक दूसरे की हिम्मत बने रहने के लिए अपने दर्द को दिल में छुपाए थे।रमा तो ऑफिस के काम में व्यस्त हो जाती थी और हम दोनों अकेले पड़ जाते थे। ऐसे में अगर मैं सामने से उसे ऐसा करने को कहती तो वो उलझन में पड़ जाती कि माँ के अकेलेपन का सोचूँ या सास-ससुर के..? इसलिए मैंने ही अपने हाथ पीछे खींच लिए। तुम बताओ रमा सच जानकर क्या करती..?
"दी नीलू को आप लोगों से दूर नहीं रखती,भले ही माँ को ठीक होने में लम्बा वक्त लग जाता। थैंक यू सो मच ऑंटी और साथ में बड़ा वाला सॉरी। सॉरी इसलिए कि हम सब आपके बारे में ग़लत सोचते रहे । हममें से कोई नहीं जानता कि आप हम सबसे बहुत प्यार करतीं हैं..!कहते-कहते हुए पीहू की आँखें भर आईं।
"बस बस ज्यादा लाड़ नहीं..नीलू की क्लास का समय हो रहा है।जाओ कमरे से उसकी बुक्स लेकर और रिवीजन कराओ..! सुहासिनी मुस्कुराकर बोली।
थैंक्स आँटी..!पीहू बुक्स लेकर चली गई।
"किसी ने सच ही कहा है कि सच्चाई और अच्छाई ज्यादा दिन छुप नहीं सकती।सच में आज तुम्हारी अच्छाई सबकी नजर में आ ही गई सुहासिनी..!
"अब चने के झाड़ पर मत चढ़ाइए। मैं अपने चाय बनाने जा रही हूँ आप पियेंगे..? सुहासिनी ने हँसते हुए पूछा तो प्रकाश भी हँस पड़े।दो साल बाद सुहासिनी के चेहरे पर सुकून देख प्रकाश अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहे थे।
©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
चित्र गूगल से साभार
Monday, March 7, 2022
इतिहास के पन्नों से
एक सितंबर 1939 को जर्मनी की सेनाओं ने अचानक पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। हिटलर की सेनाओं ने ये आक्रमण बिना किसी पूर्व चेतावनी के किया था।सवेरा होते ही जर्मन सेना के युद्धक विमानों ने पोलैंड पर हवाई हमले शुरू कर दिए।सुबह नौ बजे राजधानी वॉरसॉ पर हवाई बम बरसने लगे।इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत हो गई।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन तानाशाह हिटलर और सोवियत रूस के तानाशाह स्टालिन के बीच गठजोड़ हुआ। जर्मन अटैक के 16 दिन बाद सोवियत सेना ने भी पोलैंड पर धावा बोल दिया। दोनों देशों का पोलैंड पर कब्जा होने तक भीषण तबाही मची।
इस भीषण युद्ध में हजारों सैनिक मारे गए और भारी संख्या में बच्चे अनाथ हो गए।तब 500 पोलैंड की महिलाओं और 200 बच्चों को जर्मनों के अत्याचार से बचाने के लिए एक जहाज पर बिठा दिया गया। पोलैंड के सैनिकों द्वारा जहाज को समुद्र में छोड़ते हुए कप्तान से कहा कि वे उन्हें किसी ऐसे देश में ले जाएं जहाँ उन्हें आश्रय मिल सके।उनका देशवासियों का आखिरी संदेश था "अगर हम जीवित रहे तो हम फिर मिलेंगे!"
जहाज के कप्तान 500 शरणार्थी पोलिश महिलाओं और 200 बच्चों से भरे जहाज को लेकर कई यूरोपीय बंदरगाहों,एशियाई बंदरगाहों पर गए,जहाँ उन्हें शरण देने से मना कर दिया गया।जहाज ईरान के बंदरगाह भी पर पहुँचा वहाँ भी उन्हें कोई रहने की अनुमति नहीं मिली।
इसी तरह समुद्र में भटकता-भटकता जहाज भारत पहुंचा और बंबई के तत्कालीन बंदरगाह पर आया तो ब्रिटिश गवर्नर ने भी जहाज को बंदरगाह पर जाने से मना कर दिया।
फिर यह जहाज गुजरात के जामनगर के तट पर जहाज़ रुका। वहाँ के राजा जाम दिग्विजयसिंह जाडेजा ने उनकी हालत देखकर व्यथित हो गए और उन्होंने जहाज को जामनगर के पास एक बंदरगाह पर रुकने की अनुमति दी। उन्होंने न केवल 500 महिलाओं को आश्रय दिया बल्कि उनके बच्चों के पालक पिता बनकर उनको बालाचिरी के एक आर्मी स्कूल में मुफ्त शिक्षा भी दिलवाई।
ये शरणार्थी नौ साल तक जामनगर में रहे। जाम साहब द्वारा उनकी अच्छी तरह से देखभाल की जाती थी। जो नियमित रूप से उनके पास जाते थे और उन्हें प्यार से बापू कहते थे।
राजा दिग्विजय सिंह जी ने उन्हें न केवल आश्रय दिया अपितु उनके बच्चों को आर्मी की ट्रेनिग दी, उनको पढ़ाया, लिखाया, बाद मे उन्हें हथियार देकर पोलेंड भेजा। उन्होंने जामनगर से मिली आर्मी की ट्रेनिग के बलबूते पर देश को पुनः स्थापित किया, आज भी पोलेंड के लोग उन्हें अन्नदाता मानते है।
इन शरणार्थियों के बच्चों में से एक बाद में पोलैंड के प्रधान मंत्री बने। आज भी उन शरणार्थियों के वंशज हर साल जामनगर आते हैं और अपने पूर्वजों को याद करते हैं।
पोलैंड में एक स्कूल का नाम जाम साहेब दिग्विजय सिंह जडेजा के नाम पर रखा गया है। इतना ही नहीं,पोलैंड की राजधानी में कई सड़कों के नाम महाराजा जाम साहब के नाम पर हैं।वहाँ उनके नाम पर पोलैंड में कई योजनाएं चलाई जाती हैं। पोलैंड के अखबार में हर वर्ष महाराजा जाम साहब दिग्विजय सिंह की महानता के बारे में लेख छपते हैं।
आज भी पोलेंड के लोग उन्हें अन्नदाता मानते है, उनके संविधान के अनुसार जाम दिग्विजयसिंह उनके लिए ईश्वर के समान है। इसीलिए आज भी वहाँ के नेता उनको साक्षी मानकर संसद में शपथ लेते है।यदि भारत मे दिग्विजयसिंहजी का अपमान किया जाए तो यहाँ की कानून व्यवस्था में सजा का कोई प्रावधान नही लेकिन यही भूल पोलेंड में करने पर तोप के मुह पर बांधकर उड़ा दिया जाता है।
वर्ष 2013 में वॉरसॉ में फिर एक चौराहे का नाम 'गुड महाराजा स्क्वॉयर' दिया गया। इतना ही नहीं, महाराजा दिग्विजय सिंहजी जडेजा को राजधानी के लोकप्रिय बेडनारस्का हाई स्कूल के मानद संरक्षक का दर्जा दिया गया। पोलैंड ने महाराजा को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान कमांडर्स क्रॉस ऑफ दि ऑर्डर ऑफ मेरिट भी दिया।
क्या आप जानते हो आज युक्रेन से आ रहे भारत के लोगो को पोलेंड अपने देश में बिना वीजा के क्यो आने दे रहा ?वो इसलिए कि आज भी पोलेंड जाम साहब के उस कर्म को नही भुला इसलिए आज इस संकट की घड़ी में भारत के लोगो की सभी प्रकार से मदद कर रहा है।
यह आधुनिक समकालीन इतिहास का एक शानदार पृष्ठ था,जिसे भारत में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं!
अनुराधा चौहान'सुधी'
नोट-राजा दिग्विजय सिंह जाडेजा के विषय में जानकारी और फोटो गूगल से ली गई है।
Tuesday, July 13, 2021
हिम्मत
"मैं बहुत थक गया हूँ मंगल.. अब नहीं दौड़ा जाता। तुम दोनों भाग जाओ ट्रेन का समय हो गया..!"इन तीनों में विपुल सबके छोटा और कमजोर था।
"ऐसे कैसे छोड़ दें..? मंगल कुछ दूर मैं पीठ पर लेता हूँ, कुछ दूर तुम.. क्यों ठीक है..?"पिछले तीन बरसों से दुख सहते और भीख माँगने को मजबूर रमन ने आज हिम्मत करके भीख मँगवाने वाले कालू भंडारी का सुरक्षा घेरा भेदकर अपने साथ मंगल और विपुल के साथ भाग खड़ा हुआ।
"उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।वो देख दो-तीन बसें रुकी हुई हैं।लगता है सब कहीं तीर्थयात्रा पर जा रहा है।जय शिव शंभू जयकारे? लगता है किसी शिव मंदिर दर्शन के लिए? जब तक यह लोग नाश्ता करते हैं हम सब बस की छत पर छुप जाते हैं।अगले स्टॉप पर सोचेंगे क्या करना है।
"ठीक मंगल..चल विपुल..!"तीर्थयात्री कुछ देर के लिए रुके और अपने खाने के लिए फल आदि लेकर फिर आगे बढ़ गए। तीनों इस मौके का फायदा उठाकर बस के छत पर चढ़कर लेट गए।
बारिश का मौसम था इसलिए बस के ऊपर सामान नहीं था और ना ही तन जलाने वाली धूप, जैसे ही ठंडी हवा लगी विपुल सो गया।
"सो गया बेचारा.. मंगल तुझे तो तेरे शहर का नाम पता है,हम लोग कहाँ जाएंगे..?"रमन ने पूछा।
"रमन एक बार शहर पहुँच जाएं फिर सोचते हैं..!"बारह साल के थे मंगल और रमन दस साल का,विपुल छोटा पाँच साल का नाज़ुक सा बच्चा था।
"मंगल हम तीनों तो भाग लिए, अब बाकी लोगों का क्या होगा..?"
"उन्होंने इस तकलीफ़ को स्वीकार कर लिया है रमन।अब शायद हमारे भागने के बाद,उनको भी थोड़ी हिम्मत आ जाए..!"शाम गहराने लगी थी।रमन भी सो गया था।बस चलती चली जा रही थी।ऐसी ही एक बस यात्रा में छः महीने पहले मंगल अपने परिजनों से बिछड़ गया था।
"क्या हुआ बेटा..?आप रो क्यों रहे हो? आपके घरवालें कहाँ हैं...?भीखू ने प्यार से सिर सहलाते हुए पूछा।
"वो लोग चले गए..!"मंगल रोते हुए बोला।
"चले गए..कहाँ..?"भीखू ने पूछा।
"हम सब यहाँ घूमने आए थे। मैं पापा के साथ बस में जाकर बैठ गया।माँ उस दुकान से कुछ खाने-पीने का सामान लेने लगी।तभी मैंने देखा माँ की बस में चढ़ते समय यह पायल गिर गई। पापा को बताया तो वो पापा फोन पर बात करने में व्यस्त थे।बस मैं पायल उठाने के लिए उतरा और बस चल दी,और..!" मंगल फिर से रोने लगा।
"ना बेटा रोते नहीं हैं।कितनी देर हो गई उन्हें गए..?" भीखू ने पूछा।
"थोड़ी देर पहले ही बस गई है।दुकान वाले अंकल बोले यही बैठो शायद ढूँढते हुए वापस आ जाएं..?"मंगल ने रोते हुए कहा।
"कहाँ से आए हो..?"
"वाराणसी.. शंकर भगवान के मंदिर हमारे घर से थोड़ी दूर पर ही है।पापा का नाम शंकरलाल मिश्रा वहीं मंदिर के पास पूजा सामग्री की दुकान लगाते हैं..!"मंगल ने बताया।
"अरे फिर तो मैं उन्हें जानता हूँ..!"
"सच्ची अंकल..?"
"हाँ बेटा.. मैं हर महीने महादेव के दर्शन को वाराणसी जाता हूँ। मैं परसों फिर जाने वाला हूँ,मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें सही-सलामत उनके पास पहुँचा दूँगा..!"भीखू की मीठी-मीठी बातों में मंगल फंसता चला गया।
"सच्ची अंकल..?आप मुझे ले जाओगे..?"मंगल खुश हो गया।
"हाँ सच्ची..आओ गाड़ी में बैठो..!"मंगल को साथ में लेकर भीखू अपने अड्डे पर चला आया।
"अंकल यह कैसी जगह है..?"मंगल वहाँ पर कुछ गंदे मिट्टी में सने बच्चे और कुछ विकलांग बच्चों को देखते ही समझ गया कि वो बच्चे चोरी करने वाले गिरोह के हाथ लग गया। जिनके बारे में उसके चाचा बताते रहते थे।
"अब तुझे यहीं रहना है समझे..?रमनवा इसे यहाँ के बारे में सब समझा देना,समझे..?"
"जी उस्ताद आप बेफिक्र होकर जाइए..!"रमन दस साल का लेकिन बहुत चालाक था।भीखू का बेहद खास था।भीखू चला गया तो रमन कुछ मैले-कुचैले कपड़े ले आया ।
"लो पहन लो जो बने..!"
"छी मैं नहीं पहनता यह गंदे कपड़े..!मेरे चाचा जी पुलिस में हैं।देखना वो और मेरे पापा कितनी जल्दी मुझे ढूँढते हुए आ जाएंगे..! मंगल ने कहा।
"ओय..ज्यादा चूँ चा मत करिओ यहाँ कोई न आने वाला।पहन ले शांति से नहीं तो उस टीम में शामिल हो जाएगा।वो सब तेरे जैसे ही थे।अब देखो, बेचारे कैसे हो गए..!"रमन ने विकलांग बच्चों की ओर इशारा करते हुए कहा।
"नहीं..!"मंगल ने डरकर गंदे कपड़े पहन लिए।
"ले यह कालिख अच्छी तरह पूरे शरीर में मलकर अब मेकअप भी करलो।आज से तेरी ट्रेनिंग शुरू..!"यह कहकर रमन चला गया और कुछ देर बाद विपुल को लेकर लोटा।
"अरे तू अभी तक बैठा है..?"रमन ने कहा।
"यह भी भीख माँगता है..?"नन्हें विपुल को देखकर मंगल को बहुत खराब लगा।
"भीखू का कहा तो मानना ही पड़ेगा भाई, वरना वो तेरा यह हाल कर देगा..?"रमन ने विकलांग बच्चों की ओर इशारा किया।अपने हाथ से मंगल के शरीर में कालिख मल दी।बस उसी दिन से मंगल उन दोनों के साथ भीख माँगता और जो कुछ मिलता शाम को भीखू को सौंप देता।
एक दिन "रमन तुझे अपने मम्मी-पापा की याद नहीं आती ?तू यहाँ कैसे आया..?"
"आती है ना बहुत याद आती है।वो लोग मुझे रोज शाम को गार्डन में खेलने ले जाते थे।एक दिन उनके साथ ही गार्डन में खेल रहा था। मैं बॉल उठाने झाड़ियों के पीछे गया और वहाँ किसी ने मेरा मुँह दबोचकर गाड़ी में डाल दिया।मम्मी पापा के जब तक पता चला होगा तब तक तो मैं बहुत दूर यहाँ चला आया..!"रमन की आँखें छलक पड़ी।
"तेरा घर कहाँ है..?"मंगल ने पूछा।
"पता नहीं..? मैं जब यहाँ आया तब विपुल जितना बड़ा था।बस यह याद है कि मेरे घर के सामने हनुमान जी की बहुत बड़ी मूर्ति दिखाई देती थी..!"रमन बोला।
"ओह.. तुमने यहाँ से भागने की कोशिश नहीं की..?"
"ओय पागल है क्या.? ऐसा सोचना भी नहीं।अँधे, लूले लंगड़े होने से ऐसे ही सही..!"रमन बोला।
"यह विपुल कब से यहाँ..?
"दो साल का था जब यहाँ आया। मैंने नाम रखा है इसका,अच्छा है ना..?"रमन ने विपुल का सिर सहलाते हुए कहा।
"मैंने फ़ैसला कर लिया है..!"मंगल बोला।
"कैसा फैसला..?"
"मैं एक दिन भीख माँगते समय मौका देखकर यहाँ से भाग जाऊँगा। मैं अक्सर रेलवे स्टेशन पर भीख माँगता हूँ। गाड़ियों के आने-जाने का समय पता कर लिया है।एक दिन किसी गाड़ी के शौचालय में छिप जाऊँगा और दो-तीन स्टेशन निकलने पर उतर के वाराणसी कौन-सी गाड़ी जाती है।यह पता करके वाराणसी अपने घर चला जाऊँगा..!"मंगल के चेहरे पर उमंग भरी चमक दिखाई दे रही थी।
"वाह बड़ा दिमाग चलता है तेरा..?खैर छोड़ो अभी चलो वापस अड्डे पर,तुझे घर पता है।भागने मिल गया तो घर चला जाएगा।हम दोनों को तो मजबूरी में यहीं रहना है..!"रमन बोला।
"नहीं रमन मौका मिला तो तीनों साथ जाएंगे। मेरे चाचा तेरे मम्मी-पापा को ढूँढ लेंगे।हम विपुल को भी साथ ले जाएंगे।तू बस मेरा साथ दे देना..!"
भीखू रोज सबके भीख माँगने की जगह बदल देता था।आज तीन दिन बाद स्टेशन के पास बने मंदिर में भीख माँगने का मौका मिला तो मंगल इसे गँवाना नहीं चाहता था।भागते समय मंदिर की सीढियों पर विपुल गिर गया और उसे चलने में तकलीफ़ होने लगी।
उस दिन मंगल की किस्मत साथ दे रही थी। तीर्थयात्रा की बस देखते ही वो रमन के साथ विपुल को लेकर बस की छत पर चढ़कर लेट गया। मंगल अपने कल के बारे में सोच रहा था कि नीचे अचानक से जयकारे गूँजने लगे।
"हर-हर महादेव,जय शिव शंभू" रमन भी शोर सुनकर उठ गया।"क्या हुआ मंगल..?"
"रमन यह बस अब यहीं से वापस जाएगी।चल उतर जल्दी। विपुल उठ..!"तीनों फटाफट बस से नीचे उतर गए।सावन का महीना था हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी शुरू हो गई थी।
"अंकल कुछ खाने को दो ना ...?बहुत भूख लगी है। विपुल एक यात्री से खाना माँगने लगा।
"विपुल नहीं..माफ करना अंकल.. इसने बहुत देर से कुछ खाया नहीं इसलिए बस..!"मंगल उसे और रमन को लेकर भीगने से बचने के लिए एक दुकान के शेड के नीचे खड़ा हो गया।
"मंगल यह कौन-सी जगह है..?"
"जरा बारिश रुकने दे फिर देखता हूँ।अँधेरा है पर फिर भी सब मुझे पहचाना सा लग रहा है .!" अचानक मंगल बस से उतरे यात्री से पूछता है।
"अंकल हम लोग वाराणसी पहुँच गए..?"मंगल ने हवा में तीर छोड़ा।सीधे जगह का नाम पूँछकर वो फिर से किसी के चंगुल में नहीं फंसना चाहता था।
"हाँ पहुँच गए..हम बस स्टैंड पर हैं अभी। उसने मंगल को बिना देखे जवाब दिया।
"रमन हम वाराणसी पहुँच गए।वाराणसी मेरे घर..!अब मैं बारिश रुकने का इंतजार नहीं कर सकता।चलो हम पैदल घर के लिए चलते हैं आओ मेरे साथ..!"मंगल को बारिश में भीगना मंजूर था पर रुकने का इंतजार करना मुश्किल हो रहा था।
तीनों उत्साह से भरे बारिश में भीगते हुए चल दिए। वैसे ही जैसे पंछी पिंजरे से निकलकर आजाद पंछी मस्तमौला बनकर नभ में बिचरने लगता है।शिव जी के जयकारे जोर से सुनाई देने लगे थे। मंगल ऐसे आश्चर्य जनक तरीके से वाराणसी पहुँचा जैसे भोलेनाथ अपनी नगरी के नन्हे बालक को लेने खुद पुरानी दिल्ली गए थे।
"रमन मेरे पापा की दुकान..!!वो देख!! मंगल ने दोनों का हाथ पकड़ा और दौड़ पड़ा।
"पापा..!!!!"
"शंकरलाल चौंककर दुकान से निकलकर मंगल को देखने लगे।कालिख लगा शरीर फटे कपड़े देख एक बार को धोखा खा गए शंकरलाल।
"पापा..!" मंगल उनसे लिपट गया।
"मंगल मेरे बच्चे..तू कहाँ चला गया था मेरे लाल।यह? यह तेरी यह हालत..?महादेव तुम्हारी लीला अपरम्पार है। मंगल यह दोनों कौन हैं..?"
"पापा बाद में, अभी बहुत भूख लगी है। सुबह से हमने कुछ नहीं खाया..!"
"हे भगवान.. क्या हालत हो गई मेरे बच्चे की..!लो यह खाओ तीनों बैठकर..!" शंकरलाल ने तुरंत दोने लेकर प्रसाद के पेडे बच्चों को दिए और पानी की बोतल निकाली।
"दूबे जी.. शंकरलाल ने पड़ोसी दुकान वाले को आवाज लगाई।
"बोलो शंकरलाल.. क्या काम आने पड़ा। और यह क्या अब भिखारियों की आवभगत करने लगे..?"तीनों बच्चों को देखकर दूबे जी बोले।
"दूबे जी यह मंगल है और दो उसके साथी, शंभूनाथ की कृपा से मंगल हमें वापस मिल गया।जरा प्रभात को फोन करके पांच साल,दस साल, और मंगल के लिए एक एक जोड़ी कपड़े मँगा दो जल्दी फिर भोलेनाथ को जाकर माथा टेके..!"
"मंगल..? दूबे जी ने गौर से मंगल को देखा।हे शिव शंभू क्या हालत हो गई इस बच्चे की..?हम अभी फोन करके कपड़े मँगाते है..!"दूबे जी अपने बेटे को फोन लगाते हुए दुकान में चले गए।
"पार्वती हमारा बेटा मिल गया..!"शंकरलाल की खुशी संभाले नहीं संभल रही थी।
"क्या..? सच्ची कह रहे हो जी..?कहाँ है मंगल?कहाँ है वो..?"
"दुकनिया पर अपनी..!"
"हम अभी आवत है उसके चाचा के संग..! पार्वती भी दुकान पर आ गई थी।
"मम्मी..!"मंगल माँ से लिपट गया।
"ओ मोरी मैया..यह क्या हुआ? कितना कमजोर हो गया है मेरा बच्चा। हाड़ दिखाई देने लगे। दुष्टों ने क्या हालत कर दी मेरे राजदुलारे बेटे की..! पार्वती रोते हुए मंगल को बार-बार सीने से लिपटाए जा रही थी।
शंकरलाल ने प्रभात से कपड़े लेकर "पार्वती संभाल अपने को, अभी बच्चे बहुत थके हुए हैं। पहले नहला धुलाकर साफ कपड़ा पहना दे, फिर चल बोले बाबा के दर्शन कर लें..!"
"चलो तीनों मेरे साथ..!"पार्वती बच्चों को साथ लेकर घर चली गई।
भईया अपने मंगल का हाल देखकर लगता है किसी भिखारी गैंग के हाथ लग गया था..?"मंगल के चाचा शिवानंद ने कहा।
"हाँ लगता तो यही है।अभी बच्चों से कुछ भी पूछना ठीक नहीं? उनको भोलेनाथ के दर्शन कराकर सुला देते हैं।कल देखते हैं क्या करना है..? शंकरलाल ने कहा।
दर्शन करने के बाद पार्वती ने रमन और विपुल को भी मंगल के कमरे में ही सोने के लिए भेज दिया।
"धन्यवाद मंगल तेरी हिम्मत के कारण,भले ही यह तेरा घर है।पर हम आज फिर से घर में होने का सुख उठा रहे हैं..!"रमन ने कहा।
"चल अब भूल जा पुरानी बातें रमन..शिव जी की कृपा से तुझे भी तेरा घर मिल जाएगा।आ विपुल हम सब साथ में सोएंगे..! मंगल ने सबको अपने बैड पर लिटा लिया।
"मंगल अगर मेरे और विपुल के मम्मी-पापा का पता नहीं चला तो फिर हम लोग कहाँ जाएंगे..? क्या फिर से हमें.. मंगल बीच में बोल पड़ा।
"नहीं रमन ऐसा हरगिज नहीं होगा।घर नहीं मिलेगा तो तुम दोनों मेरे पास रहोगे। मैं पापा से बात कर लूँगा,वो मना नहीं करेंगे..!"तीनों बात करते-करते सो गए।
"सूखकर काँटा हो गया मेरा बेटा। विपुल तो कितना प्यारा और मासूम है। जरूर किसी बड़े घर का बच्चा होगा..?"पार्वती बोली।
"हम्म लगता तो है भाभी।अब बड़े घर का हो या छोटे घर का, उनके पेरेंट्स के बारे में जानकारी निकालनी होगी..!"
"सही कहा देवर जी..अब आप भी सो जाइए..!"
"हम्म गुड नाईट..!"शिवानंद सोने चला गया। दूसरे दिन से रमन के बताए अनुसार शिवानंद बड़ी हनुमान जी की मूर्ति कहाँ-कहाँ है, पता लगाने लगा।
"भैय्या एक बड़ी तो दिल्ली में ही है।रमन के अनुसार वो उस समय विपुल जितना बड़ा यानि चार-पाँच साल का रहा होगा। मैं कल दिल्ली जा रहा हूँ।वहाँ पता करता हूँ चार पाँच या उससे एक साल पहले कितने बच्चे गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई है..?"
"ठीक है शिवानंद..!"शिवानंद को जल्दी ही इस मामले में कामयाबी हासिल हो गई। कुछ बच्चे उस टाइम पीरियड में गायब हुए थे।उसमें एक बच्चे की तस्वीर हूँबहूँ रमन से मिलती थी। पता करने पर पता चला कि वो लोग उसके बाद आगरा शिफ्ट हो गए। उनसे जब पूछा गया कि उनका बच्चा कैसे गायब हुआ तो उन्होंने वही स्टोरी बताई जो रमन ने बताई थी।
पुलिस ने फिर भी डीएनए टेस्ट करवाया। टेस्ट मैच होने रमन को उसके माँ बाप को सौंप दिया।
"मंगल मुझे भूल तो नहीं जाओगे..?रमन मंगल के गले लगते हुए बोला।
"नहीं कभी नहीं,यह लो मेरा फ़ोन नम्बर,हम रोज बात किया करेंगे!"मंगल ने अपना फोन नंबर दे दिया।
"बेटा जैसा तुम्हारा नाम है मंगल,वैसा ही तुमने हमारे जीवन में सब मंगल कर दिया। चलो चिंटू..?"रमन की माँ ने पूछा।
"चिंटू..?"मंगल ने आश्चर्य से पूछा।
"मम्मी मुझे प्यार से चिंटू ही बुलातीं थी। मैं इतने दिनों में अपना यह नाम भूल ही गया था..!"रमन जाने लगा तो विपुल रोकर लिपट गया। तीन बरसों से रमन ही उसका ख्याल रखते आया था।
"विपुल रोते नहीं हैं।सुन मेरे भाई, तुम्हारे मम्मी-पापा नहीं मिले तो मैं तुम्हें अपने पास बुला लूँगा। क्यों मम्मी आप रख लेंगी ना विपुल को..?"
"हाँ बिल्कुल बच्चे..पर अभी जाने दो,रमन की दादी के बार-बार फोन आ रहे हैं..!"विपुल आँसू पोंछता हुआ मंगल से लिपट गया।
छः महीने और बीत गए। आखिरकार विपुल के माता-पिता का पता भी चल गया। विपुल दिल्ली के ही रईस परिवार का बेटा था।जिसे पैसों के लिए किडनैप किया और पैसे लेकर किडनैपर बच्चे को सौंपे बिना भाग गए। पुलिस ने किडनैपर तो पकड़ लिए पर तब तक विपुल भीखू के हाथ लग गया था।बच्चा बोल नहीं पाता था ऊपर से कालिख पुता बदन, फटेहाल भिखारी के रूप में दिल्ली में होते हुए भी तीन साल तक उसका कोई पता नहीं चल पाया।
कानूनी कार्यवाही के साथ विपुल को उसके माँ बाप को सौंप दिया। मंगल की हिम्मत की हर ओर वाहवाही हुई। मंगल की हिम्मत और उसके द्वारा बताई जगह पर छापे मारकर कई बच्चों को पुलिस ने अपने कब्जे में लेकर अनाथालय भेज दिया। और उनके परिवार की तलाश शुरू कर दी।
बारिश का मौसम फिर लौट आया था।सभी बच्चे भीखू के चंगुल से आजाद हो गए,यह खबर सुनते ही मंगल छत पर बारिश के मजे लेकर नाचने लगा।इस आशा के साथ, देर-सवेर ही सही पर उन सबको भी एक दिन उनका परिवार जरूर मिलेगा।
©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️
चित्र गूगल से साभार





