Friday, January 22, 2021

पुरानी यादें


राधा तूने सायली के लिए आया इतना अच्छा रिश्ता क्यों ठुकरा दिया..? जानती नहीं कितने बड़े लोग हैं वो,बड़ा कारोबार है उनका, उन्हें घर संभालने वाली बहू चाहिए थी। बिना लेन-देन के शादी के लिए तैयार थे वो लोग,सायली को नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ता,वहाँ जाकर राज करती राज..! ममता ने अपनी छोटी बहन से कहा।

अरे दी..आप भी कहाँ-कहाँ से रिश्ते ढूँढकर भेजती रहती हो.. मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूँ, मैं किसी कारोबारी के घर अपनी बेटी नहीं ब्याहने वाली, मेरी बेटी सपने साकार करने के लिए पैदा हुई है दी, घुट-घुटकर मरने के लिए नहीं..!

राधा यह सिर्फ मन बहलाने वाली बातें हैं।पैसा है तो सब-कुछ है।बेटी की ज़िंदगी संवर जाएगी समझी..!जरा सोच,तू ढूँढकर ला पाएगी ऐसा लड़का..? और फिर तेरे पास दहेज देने के लिए क्या है..? ममता ने पहले थोड़ा समझाते और बड़ी बहन के हक से डाँटते हुए कहा।


राज करने के लिए तो मेरा भी ब्याह बड़े कारोबारी से किया था दी..? क्या हुआ फिर यह तो सब आप जानती ही हैं..?अगर पिताजी ने पढ़ाई पूरी करने दी होती तो आज परिस्थिति कुछ और होती..!


राधा तू पुराने दुखड़ा मत सुनाया कर,यह सब तो नसीब का खेल है।जो तेरे साथ हुआ जरूरी नहीं सायली के साथ हो..? उस बात को लेकर सोने जैसा लड़का ठुकरा रही है..!


मेरी बेटी एक हीरा है दी अपनी ज़िंदगी खुद रोशन कर सकती है।हमेशा पढ़ाई में अव्वल रही और नौकरी भी उसे बहुत अच्छी कम्पनी में मिली है। पैसे से सुख नहीं मिलता दी आपसी प्रेम और समझ-बूझ से मिलता है।सायली को लड़का भले ही छोटी नौकरी करने वाला मिले, दोनों मिलकर साथ कमाएंगे तो ज़िंदगी अपनी मर्जी की जियेंगे..! राधा बोली।


ऐसी ज़िंदगी में क्या सुख है राधा जरा बता..? और फिर घर और ऑफिस संभालना आसान नहीं होता राधा।तू खुद सायली की कमाई पर जी रही है।पर शादी के बाद तेरा क्या होगा, कुछ सोचा है..?


सोचना क्या है दी..जब संघर्ष करते ज़िंदगी बीती है तो आगे की भी बीत जाएगी..!


जैसी तेरी मर्जी, मुझे क्या..आज देवेन्द्र जी होते तो बेटी यूँ घर न बैठी होती। मैं फोन रखती हूँ ,जब तू सायली की शादी तय कर लेना तो बुलावा भेज देना..!


अरे दी..हेलो हेलो दी..?हो गई नाराज..!यह दी भी ना..जानती नहीं क्या मेरे साथ क्या क्या हुआ था..? कितने सपने लेकर ससुराल आई थी।सब कहते थे पैसे वाले लोग हैं,राधा राज करेगी‌..!क्या खाक राज किया..हुंहहू राधा मुँह टेढ़ा कर बीते दिनों को याद करने लगी।


देवेन्द्र अब सारा काम राधा कर लेगी, तुम नौकरानी का हिसाब कर दो,चार लोगों के लिए नौकरानी की क्या जरूरत..?माता जी ने मातृभक्त बेटे को आदेश दिया।
जी माता जी..कल ही हिसाब कर देता हूँ.. देवेन्द्र ने जवाब दिया।


बड़े घर में राज जो शुरू हो गया था।मेरे आते ही नौकरानी गायब,ऊपर से देवर जी की फरमाइशें, भाभी जी यह चाहिए वो चाहिए। कपड़े पर कैसी इस्त्री की है..?आने दो भईया को उनको दिखाता हूँ आप कैसा व्यवहार करती हो.. नागेन्द्र की उद्दंडता पर माता जी चुप रहती थी।


देवर जी इतना चिल्लाने की जरूरत नहीं है। मुझे जैसी बनी मैंने कर दी, आपको नहीं पसंद तो बाहर करा लीजिए..!राधा के इतना कहने पर माता जी ने घर छोड़कर जाने की धमकी दे डाली। फिर जो तांडव मचा, उसने राधा के होंठ सी दिए।


चुपचाप घरवालों की गुलामी करती राधा को खुद के लिए जीने का समय नहीं मिलता था..!देवेन्द्र अपने कारोबार की सारी कमाई माता जी को सौंप अपना धर्म निभाते रहे। 
नागेन्द्र की पढ़ाई पूरी होते ही नागेन्द्र भी कारोबार में हाथ बंटाने लगे। देवेन्द्र की पहचान के कारोबारी  की लड़की से नागेन्द्र की शादी हो गई। राधा सोचती रह गई कि देवरानी के आने से उसका भार कम होगा,पर बड़े घर की बेटी पर माता जी के कृपा दृष्टि पड़ चुकी थी।


देवेन्द्र आप अब कुछ पैसे सायली के लिए भी जमा किया कीजिए,आगे उसकी पढ़ाई और शादी में काम आएंगे..!
क्यों कुछ कमी है तुम्हें, सायली की जरूरतों पर मैं ध्यान नहीं दे रहा..?या माता जी सब ठीक से मेनेज नहीं कर पा रही हैं क्या..? बोलो..? अगर ऐसा है तो मैं अभी उन्हें कह देता हूँ, तुम्हें घर की मालकिन बना दें.…! देवेन्द्र उखड़े अंदाज में बोले।


मेरा वो मतलब नहीं था।बस सायली के भविष्य की चिंता सता रही थी।आपको जो सही लगे कीजिए, मैं अब नहीं बोलूँगी।अगर आप कुछ पैसे तो अलग से दे सकें तो?सायली छोटी बच्ची है, स्कूल जाते समय कुछ माँग देती है तो और फिर स्कूल में रोज कुछ न कुछ खर्च लगा रहता है। माता जी को बार-बार परेशान करना अच्छा नहीं लगता..!


देवेन्द्र को यह बात समझ आ गई तो चुपचाप राधा को हर महीने सायली की फीस और स्कूल में होने वाले ऊपरी खर्चों के लिए राधा को दस हजार रुपए देने लगे। देवेन्द्र ने इस बात का जिक्र घर में नहीं किया और ना ही राधा ने किया।


राधा बचे पैसों को जमा करती रही।देवेन्द्र सब-कुछ माता जी को सौंपकर बेटी और पत्नी और अपने भविष्य को नजरंदाज करते रहे, अंत में मिला क्या..? देवेन्द्र के जाते ही देवर ने सारा कारोबार अपने कब्जे में कर लिया।


फिर वहीं हुआ जिसके लिए राधा हमेशा ही टोकती थी।मालिक बनते ही देवर का व्यवहार बदल गया। तिजोरी की चाबी अब देवरानी के साथ आ गई थी।उसे राधा और माता जी बोझ लगने लगे थे, घर में दो वक्त की रोटी भी शांति से नसीब नहीं थी।


पैसे चाहिए क्यों भाभी..?सायली की पूरे साल की फीस तो हम भर ही चुके हैं, स्कूल यूनिफॉर्म आ गई, पुस्तकें आ गईं अब और क्या चाहिए..?आपको पैसे की क्या जरूरत है.? नागेन्द्र ने कहा।


ज़िंदगी में सिर्फ यही जरूरत नहीं होती देवर जी।कई बातें बोली नहीं जा सकतीं और फिर मैं तुमसे कहाँ कुछ माँग रही हूँ।यह बिजनेस मेरे पति ने खड़ा किया था यह तो हमारा हक है।अब राधा की सहनशक्ति जवाब देने लगी थी।


तो लो संभाल लो बिजनेस..दो दिन में डूब जाएगा और तुम रास्ते पर आ जाओगी।यह लो पैसे पाँच हजार की गड्डी सामने फेंक नागेंद्र चला गया। माता जी की आँखें छलछला आईं।
राधा बहू मेरा बक्सा उठा लाओ..!


जी माता जी.. राधा अंदर से माता जी का बक्सा ले आई।यह लीजिए माता जी..!


माता जी को राधा हमेशा ही बड़े कठोर हृदय का समझती थी क्योंकि वो सुलूक ही ऐसा करतीं थीं।माता जी ने बक्सा खोलकर अपने जेवर राधा को दिए,इसे सायली के लिए रख लो बहू,अब सब कुछ बदल गया, मेरे हाथ में कुछ नहीं रहा..! मेरा देवेन्द्र तो राम था..! और यह पेपर संभालकर रख लो।यह हमारे पुराने घर के पेपर हैं जो मैंने नागेन्द्र के रंग देखकर देवेन्द्र के नाम कर दिया था।यह सिर्फ मैं और देवेन्द्र ही जानते थे..!


राधा की आँखें भर आईं.. आपने मुझे सिर पर छत दे दी वही बहुत है माता जी..! माता जी के पैरों में सिर रखकर सिसकने लगी।


रोज-रोज के क्लेश से आहत माता जी भी चल बसीं। माता जी के जाते ही राधा ने भी वो घर छोड़ दिया और पुराने घर में रहने चली आई।अब नागेन्द्र ने सायली की पढ़ाई के लिए पैसे देने बंद कर दिए।राधा ने जो भी जमा पूंजी और कुछ अपने गहने गिरवी रखकर सायली को पढ़ाया।


सायली ने भी कभी निराश नहीं किया कॉलेज में स्कॉलरशिप मिल गई तो राधा का बोझ हल्का हो गया।सायली के जॉब लगते ही राधा की परिस्थिति में सुधार होने लगा था। मेरी सायली ऐसे घर में नहीं जाएगी जहाँ उसे किसी की गुलामी करनी पड़े,नहीं-नहीं बिल्कुल नहीं..राधा बड़बड़ाई।


माँ तू किस सोच में डूबी है..?सायली ने घर में घुसते ही पूछा।
अरे तू कब आई..?


अभी आई माँ..पर तुझे मेरी फिक्र कहाँ..?माँ की गोद में सिर रखकर लेटते हुए सायली ने कहा।बता क्या हुआ..? इतना टेंशन क्यों..?


तेरी मौसी ने एक रिश्ता भेजा था। बहुत ही पैसे वाले लोग थे। बिना दहेज शादी के लिए तैयार थे।पर शादी के बाद बहू से नौकरी करवाना उनकी शान के खिलाफ था.. मैंने ऐसे रिश्ते के लिए मना कर दिया तो मौसी नाराज हो गईं।


हो जाने दे माँ.. कुछ दिन की नाराज़गी है सब ठीक हो जाएगा। हमने पापा के जाने के बाद जो सहा वो किसी को कैसे महसूस होगा..? अगर आप मेरी पढ़ाई के लिए पैसे जोड़कर न रखतीं तो शायद मैं पढ़ भी ना पाती..तू चिंता मत कर माँ सब अच्छा हो जाएगा..सायली राधा से लिपटते हुए बोली।


सायली की बातों से राधा का मन हल्का हो गया।चल तू हाथ-मुँह धोकर आ, मैं खाना गरम करती हूँ.. राधा रसोई में जाते हुए बोली।


जी माँ..सायली कमरे में चली गई। राधा भी पुरानी यादों को झटककर किचन में खाना गरम करने लगी।
©® अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️
चित्र गूगल से साभार


Saturday, January 9, 2021

वीर सैनानी कनाईलाल दत्त


दादी माँ..!! आप क्या कर रही हो..? हर्ष और रूही गायत्री के कमरे में प्रवेश करते हुए बोले।

कुछ नहीं बेटा..बस अकेली बैठी बोर हो रही थी तो बस कुछ पुरानी तस्वीरें देखने लगी..!पर तुम दोनों इस समय..?

दादी माँ हमें नींद नहीं आ रही, मम्मी पापा से कहानी सुनाने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया..!

ओह..दिन भर ऑफिस में काम करके दोनों बहुत थक जाते हैं।आओ मेरे पास लेट जाओ,आज भारत के वीर सपूत कनाईलाल दत्त के बारे में बताती हूँ..!

वीर सपूत..?वो क्या होता है दादी माँ..?

वीर सपूत अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं पर अपनी भारत माता पर कोई आँच नहीं आने देते। अच्छा अब दोनों चुपचाप कहानी सुनो..!

यह कहानी है आजादी के मतवाले वीर कनाईलाल दत्त की..!

देश की आज़ादी के लिए मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूलने वाले खुदीराम बोस को तो सभी जानते हैं। खुदीराम बोस की तरह ही देश की आजादी के लिए सबसे कम उम्र में फाँसी पर चढ़ने वाले आज़ादी के दूसरे सिपाही थे कनाई लाल दत्त..! 

अंग्रेजी हुकूमत से अपने देश को आजाद कराने के लिए न जाने कितने युवक-युवतियों,बच्चे बूढ़े इन सभी ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया।आज हम चैन से जी पा रहे हैं तो इन्हीं वीरों के बलिदान के कारण..!

कनाई लाल दत्त भी उन्हीं वीरों में से एक थे। कनाईलाल का जन्म 30 अगस्त, 1888 को बंगाल में हुगली ज़िले के चंदन नगर में हुआ था।उनके पिता चुन्नीलाल बम्बई में ब्रिटिश सरकार के नौसेना विभाग में एकाउंटेंट थे और इस वजह से वह अपने परिवार को भी बम्बई ले आए‌। कनाईलाल दत्त की प्रारम्भिक शिक्षा बम्बई में हुई थी। 

बम्बई कहाँ है दादी माँ..?

मुंबई ही बम्बई है बच्चों,पहले हमारे मुंबई शहर को बम्बई नाम से जाना जाता था।कनाई लाल अपनी प्रारंभिक शिक्षा आर्य शिक्षा सोसाइटी स्कूल में पूरी करने के बाद वापस चंदन नगर लौट आए।वापस आकर उन्होंने हुगली के कॉलेज में दाखिला ले लिया।उसी दौरान उनकी मुलाक़ात प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय से हुई।

प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय से मुलाकात के बाद कनाईलाल दत्त की विचारधारा बदलने लगी।उनके क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव कनाई पर भी पड़ने लगा और उनके मन में ब्रिटिश हुकुमत को जड़ से उखाड़ फेंकने की लालसा ने जन्म ले लिया। 

कनाईलाल दत्त युगांतर पार्टी से जुड़ने के बाद और भी बहुत से क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।वह दौर‘बंगाल विभाजन’ का दौर था।अंग्रेजी हुकुमत ने बंगाल को बाँटने का फरमान जारी किया तो उनके इस फैसले के खिलाफ युवा क्रांतिकारियों ने आन्दोलन शुरू कर दिया।

कनाई लाल ने भी चंदननगर से आंदोलन का मोर्चा निकाला।कनाई लाल की क्रान्तिकारी गतिविधियो को देखते हुए कॉलेज ने उन पर ग्रेजुएशन की डिग्री रोकने का दबाव बनाया पर फिर भी वो रुके नहीं, अपने इरादों को मजबूत आगे बढ़ते गए।

कनाईलाल कोलकाता में बारीन्द्र कुमार घोष के घर में रहते थे। इसी घर में यह क्रान्तिकारी अपने हथियार और गोला-बारूद भी रखते थे।

हथियार और गोला-बारूद..? दादी माँ वो क्यों..?

अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों से अपने देश को आजाद कराने के लिए इन सब चीजों की कब जरूरत पड़ जाए इसलिए..!

ओह अच्छा..!

30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चंद्र चाकी ने मुज़फ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर बम फेंक दिया।उस घटना से ब्रिटिश सरकार की नींदें उड़ गई। गुस्से से तिलमिलाई ब्रिटिश सरकार क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह छापेमारी करने लगी।उसी दौरान पुलिस को कनाई और उनके साथियों की गतिविधियों पर शक हो गया।

2 मई 1908 को पुलिस ने बारीन्द्र घोष के घर पर भी छापा मारा और उन्हें उस घर में एक बम फैक्ट्री और काफी मात्रा में हथियार मिले।इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष, बारिन्द्र कुमार घोष, सत्येन्द्र नाथ (सत्येन) व कनाई लाल समेत 35 क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। 

कन्हाई लाल दत्त के साथ-साथ उसके प्रेरक प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाये गये थे। सब पर अभियोग चला किन्तु चारू चन्द्र राय को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के कारण रिहा कर दिया गया।

सभी क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में रखा गया और सब पर विद्रोही होने का मुकदमा चलाया गया।गिरफ्तार होने वाले लोगों में, कनाईलाल दत्त का सहयोगी नरेंद्र नाथ गोस्वामी भी था।उन सभी से उनकी योजनाओं और साथियों का सच उगलवाने के लिए पुलिस ने कठोर यातनाएं दीं, परंतु किसी ने अपना मुँह नहीं खोला।

कनाईलाल के सहयोगी नरेन्द गोस्वामी ब्रिटिश सरकार की यातना के डरकर और जेल से छूटने के लालच में अपने साथियों के साथ गद्दारी कर पुलिस को क्रांतिकारियों के ठिकानों की जानकारी देना शुरू कर दी।

फिर क्या हुआ दादी माँ..सब पकड़े गए..?

बताती हूँ..आगे सुनो..! नरेन्द्र गोस्वामी से सूचना पाकर पुलिस ने उनके गुप्त ठिकानों पर छापे मारना शुरू कर दिया और भी बहुत सारे क्रान्तिकारियों को पकड़ लिया गया। उसके बाद नरेन्द्र गोस्वामी ने इन क्रान्तिकारियों के और भी कई सारे राज उजागर कर दिए। 

कनाईलाल दत्त और उनके साथियों को अपनी सभी योजनाओं पर पानी फिरता दिखाई देने लगा।उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि हमारी मातृभूमि के साथ दगा करने वाले को सबक सिखाना ही होगा ताकि और कोई इस तरह की गद्दारी न कर सके।

नरेंद्र गोस्वामी को क्रान्तिकारियों के गुस्से से बचाने के लिए पुलिस ने विशेष सुरक्षा प्रदान की और उसे उन सब से अलग जेल में रखा। ताकि उसे इन लोगों से किसी प्रकार का खतरा न रहे।

कन्हाई लाल और सत्येन्द्र अपनी योजना पर तेजी से कार्य कर रहे थे।उन्होंने सबसे पहले जेल के पहरेदारो से घनिष्टता बढाई और अपनी बातों से उन्हें बहुत हद तक प्रभावित कर लिया।फिर साथियों के सहयोग से जेल के भीतर लाये जाने वाले कटहल- मछली के भीतर छुपाकर लाई गईं दो पिस्तौल प्राप्त करने में सफल हो गये।

अब उनका अगला लक्ष्य था नरेंद्र तक पहुँचना,नरेन्द्र अपने अगले बयान में क्रान्तिकारियों के अन्य ठिकानों का पर्दाफाश करें उससे पहले कनाईलाल और सत्येन ने एक योजना बनाई।सत्येन अचानक बीमार होने का नाटक करने लगे,यह देख उन्हें जेल के अस्पताल में पहुँचा दिया गया।

उनके बाद कनाईलाल दत्त ने भी पेट में अत्याधिक पीड़ा का नाटक शुरू कर दिया। सत्येंद्र तो पहले ही बीमारी का बहाना बना कर अस्पताल पहुँच चुके थे और उन्होंने पुलिस के मुखबिर बनने की बात मानकर नरेन्द्र से मिलने की इच्छा जाहिर कर दी। इधर भयंकर पेटदर्द का बहाना बनाकर कनाईलाल भी अस्पताल में भर्ती हो गए थे।

सत्येंद्र के मुखबिर बनने की खबर सुनकर नरेन्द्र भी खुश हो गए और उनसे मिलने अस्पताल जा पहुँचे। नरेन्द्र इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि वह कनाईलाल और सत्येंद्र के बनाए चक्रव्युह में फस चुके हैं। जैसे ही नरेन्द्र उनसे मिलने आए वैसे ही अचानक सत्येन्द्र ने उन पर फायर कर दिया।

नरेन्द्र जान बचाकर भागने लगे तो दर्द का बहाना कर बिस्तर पर लेटे कनाईलाल ने बड़ी फुर्ती से नरेन्द्र का पीछा कर पिस्तौल की सारी गोलियाँ उनके जिस्म में उतारकर भारत माता से की गई गद्दारी का बदला ले लिया।

अंग्रेजों का सुरक्षा कवच भी उस गद्दार के जीवन को नहीं बचा पाया।अंग्रेजी हुकूमत के सामने ही कनाईलाल ने अपने सहयोगी सत्येन बोस के साथ मिलकर गवाही से पहले ही नरेन्द्र की हत्या कर दी।

कनाईलाल के इस कारनामे से ब्रिटिश सरकार गुस्से से तिलमिला उठी। आनन-फानन में उन्होंने उन्हें फाँसी की सजा सुना दी।पूरे मुकदमे के दौरान कनाईलाल जरा भी विचलित नहीं हुए।जब जज ने उनसे इस घटनाक्रम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वह देश का गद्दार था, उसे मारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं है।।सजा के बाद जब अपील का प्रश्न उठा तो कनाई ने अपील करने से साफ़ मना कर दिया।

फाँसी की सजा सुनकर कनाईलाल के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।जिसे देखकर अंग्रेज वार्डन ने चिढ़कर कहा कि अभी मुस्करा रहे हो, कल जब फाँसी का समय आएगा तब तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ जाएगा।

फाँसी के दिन जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने के लिए उनकी कोठरी में पहुँचे, उस समय कनाईलाल दत्त गहरी नींद में सोये हुए थे। फाँसी पर चढ़ने से कुछ ही देर पहले कनाईलाल ने मुस्कुराते हुए उसी अंग्रेज वार्डन से पूछा “ जरा बताइए अभी मैं आपको कैसा लग रहा हूं।” उस वार्डन के पास कनाईलाल के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

10 नवंबर 1908 को भारत माता के वीर सपूतों को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। कनाईलाल के परिवार वाले जब उनका पार्थिव शरीर लेने गए तो उन्हें खुद पर काबू करना मुश्किल हो रहा था तब उसी वार्डन ने प्रोफेसर चारू से कहा कनाईलाल जैसे सौ वीर और जन्म ले लें तो भारत ज्यादा दिनों तक गुलाम नहीं रह सकता। 

कनाई के बड़े भाई अपने भाई का शव देखकर रोने लगे तो वार्डन ने कहा वीर कभी मरा नहीं करते,आप धन्य हो कि कनाईलाल जैसे वीर ने आपके घर जन्म लिया।साथ आए सभी लोग यह देखकर चकित थे कि उस अंग्रेज वार्डन की आँखें भी कनाईलाल के बलिदान से नम हो गई थी।

कनाईलाल के मुख से चादर हटाई गई तो मृत्यु पश्चात भी उनके मुखमंडल पर मरने की पीड़ा किंचित मात्र भी नहीं था,बस एक हल्की-सी मुस्कान तैर रही थी।जेल में पिस्तौल कैसे पहुँची यह जानने की ब्रिटिश सरकार ने बहुत हाथ-पैर पटके पर जेल के अंदर एक देशद्रोही को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए कनाईलाल और सत्येंद्र के पास हथियार कैसे पहुँचे..?यह राज पता नहीं कर पाई।

इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया कि कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की नाक के नीचे इतना बड़ा कारनामा कर दिखाया, उनके सामने उनके गवाह की हत्या कर दी गई और वो कुछ न कर पाए। 

कनाईलाल दत्त बीस वर्ष की आयु में खुदीराम बोस के बाद सबसे कम उम्र में फाँसी के फंदे पर झूलने वाले दूसरे क्रांतिकारी थे। फाँसी के बाद उनकी अंतिम यात्रा में आज़ादी के इस परवाने के अंतिम दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जमा हो गई थी।। 

कोलकाता का कालीघाट लोगों से भर गया था और हर कोई अंतिम बार इस महान क्रांतिवीर के दर्शन करना चाहता था। चारों तरफ ‘जय कनाई’ कनाईलाल की जय के नारे गूँजते नारे ब्रिटिश सरकार को भारत से उखाड़ फेंकने का आगाज कर रहे थे।

कनाईलाल दत्त जैसे वीरों की कुर्बानी से आज हम आजाद भारत से चैन से रह रहे हैं।कनाईलाल दत्त जैसे वीरों की शहादत को शत् शत् नमन।

हम भी शत-शत नमन करते हैं दादी माँ..!


अब जाओ, दोनों चुपचाप सो जाओ..!

जी दादी माँ.. शुभ रात्रि..!


©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित ✍️

चित्र और जानकारियाँ गूगल से साभार


Tuesday, September 29, 2020

मानव और प्रकृति


हम हमेशा भूल जाते हैं, हमारे ऊपर भी कोई दिव्य शक्ति है,जो हमें हमारी गलतियों की कभी भी सजा दे सकती है। प्रकृति के निरंतर दोहन से आज हमें सबसे भयंकर सजा मिल रही है। एक सूक्ष्म वायरस की चपेट में आकर मानव जीवन में हाहाकार मचा हुआ है।
प्रकृति से छेड़छाड़ और अपनी सभ्यता-संस्कृति भूलने और गलत खान-पान का नतीजा सामने है।नदियाँ दलदल बन रही हैं और हरी-भरी धरती बंजर।
आज हम खुद इस मौत के तांडव के जिम्मेदार बने हैं।मानव की सबसे समृद्ध बनने की लालसा ही आज सम्पूर्ण विश्व के समक्ष महामारी के रूप में तांडव कर रही है।
प्रकृति एक माँ की तरह हमें बहुत कुछ देती है और बदले में मानव से बस थोड़ा रख-रखाव और प्यार माँगती है।परन्तु जब क्रोधित होकर लेना शुरू करती है तो फिर होता है महाविनाश का आरंभ ।मानव सदा से ही संघर्षशील है,हर विपत्ति का सामना करने में सक्षम है। 
परंतु आज मानव ने हमारी हरी-भरी प्रकृति को इतना प्रदूषित कर दिया है कि प्रकृति के विध्वंसकारी रूप उभर कर सामने आने लगे हैं।यह किसी से छिपा नहीं है कहीं बाढ़ ज़िंदगियाँ तबाह कर रही तो कहीं भूकम्प और हवा में घुली विषैली गैसें जीवन में विष घोल रहीं है। 
जैसे मानव को जीने के लिए जल,हवा, हरियाली तीनों की जरूरत है वैसे ही प्रकृति को मानव की।मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।प्रकृति तो अपना धर्म निष्ठा से निभा रही है पर मानव सब कुछ भूल प्रकृति के मूल स्वरूप को ही बिगाड़ने पर आमादा है।मनुष्य जब तक प्रकृति को सहेजता रहा सुखी और सम्पन्न रहा प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ किया तो उसका गुस्सा भूकम्प, सूखा, बाढ़, और कोरोना महामारी का रूप लेकर लोगों को काल का ग्रास बनाने लगा।
हमें शुरू से ही बताया गया है कि हरियाली के बिना प्रकृति मृत है और प्रकृति के बिना हम.! इसलिए स्वच्छ हवा पानी के लिए आम, आँवला, पीपल,वट वृक्ष और नीम के वृक्ष लगाने का महत्व बताया गया है।भारतीय संस्कृति में प्रकृति के कण-कण में देवताओं का वास माना गया है। इतना ही नहीं हमारी संस्कृति में वृक्षों को देवशक्तियों का प्रतीक मानकर सहेजना सिखाया गया है। विभिन्न प्रकार के तीज-त्योहार हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैैं।हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन की मान्यता सदियों से चली आई है।
सनातन धर्म में अनेकों उत्सव ऐसे हैं जो प्रकृति के अनुरूप मनाए जाते हैं वसंत पंचमी हो या एकादशी, हरियाली तीज हो या गंगा दशहरा और गोवर्धन पूजा,वट सावित्री,गणेश चतुर्थी व आँवला नवमी सभी पर्वों में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
                 भाद्रपद माह की शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणपति बाप्पा की स्थापना और पूजा का पर्व महाराष्ट्र राज्य की सभ्यता और संस्कृति का एक अभिन्न अंग है।परंतु आज गणपति बाप्पा की स्थापना, पूजा और विसर्जन सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित न रहकर संपूर्ण देश में खूब धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
चतुर्थी तिथि को' गणपति बाप्पा मोरया! मंगलमूर्ति मोरया! के उद्घोष के बीच बाप्पा की प्रतिमा की खूब धूमधाम के साथ स्थापना की जाती है।न सिर्फ बड़े बड़े पण्डालों में अपितु हर गली, हर घर में छोटे - बड़े सभी आकार की बाप्पा की प्रतिमा की स्थापना कर भक्तिभाव से पूजा की जाती है।वैसे तो बाप्पा चतुर्थी को हमारे मध्य विराजते हें और पूरे ग्यारह दिन हमारे बीच ,हमारे साथ रहकर अनंत चतुर्दशी के दिन वापस अपने धाम लौट जाते हैं।परंतु घर- घर में श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार कभी डेढ़ दिन,तीन दिन, पाँच दिन और सात दिन में भी बाबा की विदाई कर देते हैं।
               परंतु अधिकांश बड़े- बड़े सार्वजनिक पण्डालों में ग्यारहवें दिन ही बाप्पा के विसर्जन की परम्परा देखने में आती है।'विसर्जन'-- ये संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है---' पानी में विलीन होना।'ये एक सम्मानसूचक शब्द है,इसलिए पूजित प्रतिमाओं को ससम्मान विदाई देने के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है।
            गणपति स्थापना,पूजा और विसर्जन आज एक बहुत बड़ा संदेश हमें देते हैं।
              ईश्वर निराकार हैं।जब हम अपनी आस्था को मूर्त रूप देने के लिए प्रभु को एक आकार देते हैं तो उन्हें भी प्रकृति ( मिट्टी) का सहारा लेना पड़ता है।
             गणपति विसर्जन हमें ये सीख देता है कि जो हमने प्रकृति से लिया है उसे एक न एक दिन वापस लौटाना ही होगा।प्रकृति से निर्मित आकार अंततोगत्वा प्रकृति में ही विलीन हो जाना है।
                गणपति विसर्जन की जो मूल परंपरा है, पर्यावरण हित को ध्यान में रखकर ही उसकी नींव रखी गई है।मूर्ति के विसर्जन के साथ अनेकों ऐसे तत्व पानी में घुलते हैं जो पानी को शुद्ध करते हैं।हल्दी ,कुमकुम एंटीबायोटिक होते हैं जिनसे जल स्रोतों का पानी स्वच्छ होता है।लंबे समय से नदियों, तालाबों और पोखरों का रुका पानी भी विसर्जन में डाली जाने वाली सामग्री से शुद्ध हो जाता है।विसर्जन की प्रक्रिया में प्रचुर मात्रा में डाला जाने वाला अक्षत जलीय जीवों के भोजन की व्यवस्था करता है।धूप,चंदन आदि प्रयुक्त सामग्रियाँ पर्यावरण को स्वच्छ करने में अपना बहुत बड़ा योगदान देती हैं।
          गणपति बाप्पा मोरया,
        पुढच्या वर्षी लवकर आ।।
के नारे के बीच बाप्पा की विदाई ये संदेश देती है खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।
       प्रकृति चक्र के अनुसार हर आकार को एक दिन प्रकृति में ही मिलना है।
         पर आज इस इतनी सुन्दर परंपरा का स्वरूप कुछ धनलोलुप लोगों ने विकृत सा कर दिया है।अधिक पैसा कमाने की चाहत में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाई गई और कृत्रिम रंगों से रंगी गई मूर्तियाँ पर्यावरण को बहुत हानि पहुँचा रही हैं।हमें इस ओर ध्यान देना होगा।यदि प्रकृति को बचाना है तो गणपति विसर्जन के पुरातन परम्परागत स्वरूप को ही अपनाना होगा।
              मानव को शायद अभी भी अपनी गलतियों का अहसास नहीं ,तभी तो भौतिक विकास के पीछे पड़ा हुआ है। अति प्रगतिशील बनने की होड़ में दुनिया कहाँ पहुँच गई।आज ऐसा कोई देश नहीं है जो कोरोना संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। घरों में कैद भारतीय आज इसी बात से चिंतित हैं कि आखिर कब हम पहले की तरह अपने पर्वों को धूमधाम से मना पाएंगे?
प्रकृति को हमने हद से ज्यादा नुकसान पहुँचाने की गलती की पर फिर भी प्रकृति हमें नुकसान पहुँचाने की जगह आज भी हमें पूरी निष्ठा के साथ ज़िंदगी देने में लगी हुई है। प्राचीन काल से ही हमारे देश में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने के संस्कार मौजूद हैं। हमारे सनातन धर्म की हर परम्परा में कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है।हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में कहा है कि पृथ्वी का आधार जल और वन है। और शायद इसलिए ही हमारे त्योहार भी प्रकृति से संबंधित हैं। बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते थे कि अगर पीने के लिए जल चाहिए तो उसके लिए वृक्षों का होना जरूरी है और जल ही जीवन है। यही हमें बचपन से सिखाया गया कि यह प्रकृति हमारी माँ है जो हमें पालती पोसती है। अगर प्रकृति हरी- भरी रहेगी तो हम भी जीवन का सुख लेते रहेंगे।
*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*
चित्र गूगल से साभार

Tuesday, September 22, 2020

नन्ही लिसिप्रिया


मणिपुर के बशिकहांग की 8 साल की लिसीप्रिया कंगुजम दुनिया की सबसे कम उम्र की क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट हैं।
आठ साल की लिसिप्रिया ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ आवाज बुलंद कर दुनिया को नींद से झकझोरा है।मणिपुर की इस नन्ही पर्यावरण कार्यकर्ता ने स्पेन की राजधानी मैड्रिड में सीओपी25 जलवायु शिखर सम्मेलन में अपनी बात रख वैश्विक नेताओं से अपनी धरती और उन जैसे मासूमों के भविष्य को बचाने के लिए तुरंत कदम उठाने की गुहार लगाई।
लिसिप्रिया अपने भाषण में कहती है, सभी वैश्विक नेताओं से मेरा निवेदन है कि पर्यावरण को बचाने के लिए अति आवश्यक कदम उठाने का समय आ गया है।यह वास्तविक क्लाइमेट इमरजेंसी का समय है हम सभी को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।इतनी छोटी उम्र में इतने अहम मसले पर प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने के कारण लिसिप्रिया स्पेन के अखबारों की सुर्खियाँ बनी हैं।
लिसीप्रिया को वर्ष 2019 में उन्होंने डॉ A.P.J. अब्दुल कलाम चिल्ड्रन अवॉर्ड, विश्व बाल शांति पुरस्कार और भारत शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
लिसिप्रिया अब तक 21 देशों का दौरा कर चुकी हैं और जलवायु परिवर्तन मसले पर विविध सम्मेलनों में अपनी बात रख चुकी हैं। वह दुनिया में सबसे कम उम्र की पर्यावरण कार्यकर्ता बताई जा रही हैं।
महज छह साल की उम्र में लिसिप्रिया को 2018 में मंगोलिया में आपदा मसले पर हुए मंत्री स्तरीय शिखर सम्मेलन में बोलने का अवसर मिला था।वो कहती है कि उस सम्मेलन के बाद उनकी जिंदगी बदल गई।
लिसिप्रिया कहती है कि मैं जब भी प्राकृतिक आपदा जैसे भूकंप,सुनामी व बाढ़ आदि की वजह से निर्दोष लोगों को मरते हुए देखती हूँ तो भयभीत हो जाती हूँ। छोटे-छोटे बच्चों को अपने माता-पिता से बिछड़ते देख मेरा दिल भर आता है।मैं समाज के जिम्मेदार लोगों से आग्रह करती हूँ कि वो दिल-दिमाग से पर्यावरण असंतुलन के प्रभावों को कम करने के लिये प्रयास करें ताकि हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण कर सकें।
मंगोलिया से लौटने के बाद लिसिप्रिया ने पिता की मदद से 'द चाइल्ड मूवमेंट' नामक संगठन बनाया। वह इस संगठन के जरिये वैश्विक नेताओं से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कदम उठाने की अपील करती हैं।लिसिप्रिया के पिता केके सिंह कहते हैं,मेरी बेटी की बातों को सुनकर कोई यह अनुमान नहीं कर पाता कि वो अभी आठ साल की है‌।
लिसिप्रिया का जन्म इंफाल में हुआ,लेकिन वह अपने इस कार्य के कारण पूरे समय शहर से बाहर रहती हैं।वह ज्यादातर दिल्ली और भुवनेश्वर में रहती हैं।जलवायु परिवर्तन मसले पर अपने जुनून के चलते वह स्कूल नहीं जा पाती थीं।इस कारण उसने फरवरी में स्कूल छोड़ दिया। पूरे जी- जान से अपने कार्य में जुट गई।
लिसिप्रिया ने एपीएसी क्षेत्र के बच्चों का प्रतिनिधित्व करते हुए 140 देशों के नुमाइंदों और तीन हजार प्रतिनिधियों को संबोधित किया।तब उसके आने-जाने की खबर आई-गई हो गई किसी ने उस पर गौर नहीं किया।
उसने देश का ध्यान तब खींचा जब वह 21 जून को हाथ में पर्यावरण संरक्षण के नारे लिखी तख्ती लिये संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करती नजर आईं।लिसिप्रिया जून महीने में संसद भवन के पास तख्ती लेकर पहुंची थीं।तख्ती पर लिखे नारों के जरिये उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी आग्रह किया।
संसद भवन के बाहर तख्ती लिये लिसिप्रिया कहती हैं,"प्रिय मोदी जी एवं सभी सांसद जन, जलवायु परिवर्तन के प्रति कानून बनाकर अपनी सजगता दिखाएं। प्रतिदिन समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।धरती निरंतर गर्म हो रही है।हम सभी को भविष्य बचाने के लिये जल्दी ही समस्याओं की जड़ पर जल्दी ध्यान देना होगा।आप सभी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी कानून बनाकर हमारे भविष्य को बचा लीजिए।
लिसिप्रिया कहती है कि पर्यावरण असंतुलन के कारण ही हमें कई बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। हमें भी इस विषय पर ध्यान देना होगा।
वृक्ष लगाओ,जीवन सींचो यह बात बड़े-बुजुर्ग ऐसे ही नहीं कहते थे।लिसिप्रिया की जितनी उम्र नहीं उससे कई गुना ज्यादा वृक्ष लगा चुकी है।
वो अपने  ट्वीटर पर लिखती हैं, ‘मैं अभी 3,040 दिनों की हूँ यानी कि उम्र 8 साल, 4 महीने, 1 दिन की। और अभी तक मैंने 51,000 से ज्यादा पेड़ लगाए हैं यानी कि प्रतिदिन के सोलह वृक्षों का रोपण किया हैं ।
नन्ही लिसिप्रिया की सक्रियता को देख एक आश्चर्य होता है कि खेलने-खाने की नन्ही सी उम्र में वह दुनिया भर की फिक्र लिये घूमती रहती है।
इस उम्र में बच्चों को कहाँ दुनिया के गंभीर विषयों से जुड़ाव होता है।मगर,पर्यावरण के प्रति उसकी जो चिंताएं हैं यदि सभी बच्चे उसकी तरह अभी से प्रकृति के प्रति जागरूक होंगे‍ तभी तो हमारा कल सुधरेगा।
लिसिप्रिया की तुलना स्वीडन की सोलह वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग से की जाने लगी है।जलवायु परिवर्तन पर काम कर रही है यह बच्ची अपने-आप में एक मिसाल है।
लिसिप्रिया कहती है कि जिंदगी बेहतर बनाने के लिए हम सबको सही कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य को संवारा जा सके और आगे आने वाली पीढ़ियाँ साफ और स्वच्छ हवा में जी सकें।
अनुराधा चौहान'सुधी'
लिसिप्रिया के बारे में सभी जानकारी दैनिक ट्रिब्यून, जनसत्ता, एनडीटीवी के माध्यम से ली गई हैं।
चित्र गूगल से साभार

Thursday, September 3, 2020

बर्तन यूनियन (बाल कथा)


आशु! पैर से कोई बरतनों को ठोकर मारता है क्या। सरला अपने पांच वर्षीय बेटी को चिल्लाते हुए गुस्से से बोली😠।
ममा क्या इनको भी चोट लगती है, इनमें भी जान होती है🤔।ममा..ममा बोलो ना🤷?
पीछा छुड़ाने के लिए सरला ने कहा दिया,हाँ बर्तनों में भी जान होती है😬,अब पैर नहीं मारना कभी।चलो तुम्हें सुला दूँ।
आशु के नन्हे मन में कई सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहे🙇, और सरला उसके सवालों के जवाब देते हुए थक गई🥴।
तभी उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दी। कौन है वहाँ देखती हूँ। सरला रसोईघर का नज़ारा देख चौंक गई😳। और छुपकर बैठ गई।
कटोरी उछलकर सामने आई।हाँ तो भाइयों-बहनों क्या सोचा आप सभी ने🤔
सोचना क्या है 🤔हम सब एक-दूसरे के साथ 🤗 कदम से कदम मिलाकर अपना विरोध प्रकट करना है।
आखिर कब तक हम इंसानों के जुल्म सहेंगे😡। जिसका मन आता है वो हमें पटकता है, लोहे के तारों से घिसता है।😩 हमको एक होना होगा 🤝
बहन तुम्हारी पीड़ा तो यही तक सीमित है। हमें तो घंटों आग में जलाते हैं, यह लोग.. तवा बोला
देखो कितना चिकना चमकदार और सुंदर था 😊।आज रोता हूँ अपने हाल पर 😢
चम्मच खनकी । मेरी भी सुन लो व्यथा😔मेरा हाल तो बुरा है 😏सब बार-बार मुँह में डालकर दाँतो तले दबाते हैं,जी करता है एक-दो दाँत साथ ले आऊँ👿
ग्लास मुस्कुराते हुए बोला, मैं तो सुखी हूँ,सब ठंडा शीतल जल मुझमें डालते हैं तो आनंद आ जाता है।😌
सब अपनी ही कहते रहोगे या मेरी सुनोगे। कड़ाही जोर से नीचे कूदी।देखो मेरी गोरी चिकनी काया में करछुल से कितने छिद्र कर दिए गए😔।अब रगड़-रगड़ कर मुझे आधा भी नहीं रहने दिया 😢
फिर तो थाली प्लेटें,भगोने, डिब्बे सब निकल कर रसोई के फर्स पर जमा हो गए।
सब में जोरदार वार्तालाप चालू था। रसोई घर का हाल देख सरला का हाल खराब था😳
सबसे ज्यादा मजे तो इन लोगों के हैं🙄चमचे ने चीनी मिट्टी के बर्तन की ओर इशारा करते हुए कहा।
कोमल हाथों से🤗 इन्हें सहेजकर रखा जाता है।ध्यान रखा जाता है ।कहीं इन्हें चोट न लगे।
सही कहा.. चाकू उछलकर सामने आया और बोला।अब तक सहेंगे 😡 तीखी मिर्च काटकर कभी मुझे साफ़ नहीं करते 😔 कितनी जलन सहता हूँ,जी करता है उँगली काट दूँ😬
सही बताऊँ कई बार काटी भी है 😆🤭 थोड़ी देर के लिए माहौल हल्का-फुल्का हो गया।
सरला अपनी कटी उँगली देखने लगी।आज ही मिर्ची काटते हुए कट गई थी।
दूध का भगोना अपने मोटापे के कारण हिल नहीं पा रहा था। भाईयों मदद करो उफ़ यह मोटापा🥴
सब मिलकर उसे भी नीचे उतार लेते हैं।अब तुम्हारी क्या समस्या है भाई🤔
मेरी कोई समस्या नहीं है भाई😊 मैं तो अक्सर दूध बाहर गिराकर तुम लोगों की तकलीफों का बदला ले लेता हूँ😄
क्या बात करते हो भाई🙊 सच्ची कह रहे हो🤔 हाँ कल सुबह गैस बंद करते-करते कितना सारा दूध मैंने बाहर फेंक दिया।
यह सब तो ठीक है आगे क्या सोचा है🤔 सोचना क्या.. नहीं सुधरेंगे, तो हम भी सिनचैन👼 बनकर सताते रहेंगे😁
बर्तन यूनियन ज़िंदाबाद 📢चलो अब हमारा रंगारंग कार्यक्रम शुरू किया जाए।
सारे बर्तन आपस में टकराते हुए नाचने-गाने लगे💃‌।
है अगर दुश्मन,दुश्मन,
जमाना ,गम नहीं ,गम नहीं,
कोई आये कोई आये कोई...
हम किसी से कम नहीं,कम नहीं 
🥳यह देख फ्रिज में रखे फल सब्जियाँ भी मैदान में उतर आए।
सब्जियाँ🥕🥦🍆 नाचते हुए चॉपिंग बोर्ड पर चढ़ जाती।तो चाकू महाशय कूदकर उन्हें अपनी धार🔪 से कतरकर मुस्कुराते😜डांस करने लगते।
संतरे यह देख उछलकर गैस पर बैठ गए।चम्मच ने गैस चला दी 🔥तो संतरे 🍊उछलते🥴 हुए फिर से फ्रिज में घुस गए।
तभी कटोरी ने छलांग लगाई। और सीधी पहूँची क्रॉकरी के पास।यह देख सरला घबरा कर भागी,पर यह क्या उसके हाथ-पैर सब जाम थे😳
कटोरी नाच-नाच के छुरी-कांटे🍴 की सहायता से एक-एक करके सभी बरतन गिरा रही थी।खनाक-खन्न,खनाक-खन्न काँच से बिखरते टुकड़े देख सरला का हाल खराब हो गया 😢
अरे कटोरी रुक जा बहना..यह क्या कर रही है😳इन बेचारों की क्या गलती छोड़ दें बहना।🙏
क्यों रुक जाऊँ? आज यह सब टूटेंगे-फूटेंगे तभी हमारी कदर होगी।
ऐसा कुछ नहीं होगा, कल तुम फिर घिसी जाओगी स्क्रब लेकर।😐 हमारी ज़िंदगी जलने और घिस-घिसकर, और बाद में भंगार में जाकर खतम होनी है।😔
तुम चमचे लोग कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ोगे।चमचे हो चमचागिरी करते रहोगे 👿कटोरी तुनक कर बोली।
अब इसमें इसका क्या दोष,यह चमचागिरी की बात कहाँ से आ गई 😬दूध के पतीले ने बोला।
तुम तो कुछ बोलो ही नहीं..अब बारी थी कांटे-छुरी की। तुम्हें तो रोज मलाई मिल रही है,तो मक्खनबाजी करोगे👿😏
देखते-ही-देखते चमचा,करछी, कड़ाही चिमटा सब आपस में झगड़ पड़े।
यह देख टमाटर, गोभी हँस पड़े😆।अब मुश्किलों से टकराने की बारी थी टमाटरों की⚔️सभी गुस्से में 😠 दौड़ पड़े उनके पीछे।
थोड़ी देर में फर्श पर टमाटर चटनी बने पड़े थे।अब सरला की आँखों से मोटे-मोटे आँसू😭 बह निकले पड़े।
हे भगवान अस्सी रुपए किलो लाई थी टमाटर सब फोड़ डाले😭 यह मेरा सबसे प्रिय टी-सेट, मायके से मिला तोहफा था😭
रुक जाओ 🙏माफ़ कर दो कल से किसी पर जुल्म नहीं करूँगी🥴
कटोरी के समर्थन में थालियाँ मैदान में आ गई। तुम लोगों को अत्याचार सहना है सहो हम तो चले।
अरे-अरे रुको ✋पर एक-एक करके कटोरी और थालियाँ खिड़की से बाहर गिरने लगी।
सरला की आँखों के सामने उसके चमकदार स्टील के बर्तन रसोईघर से बाहर निकल गए😳😢
चमचा और पतीला चुपचाप अपने साथियों को जाते देख मायूस 🙄 हो रहे थे।
शुरू से ही चुपचाप बैठे प्रेशर कुकर ने 😠गुस्से से सीटी बजाई।यहाँ भी दल बन गए 🤔
कल तक हाथ थामकर 🤝 चलने वाले मैदान छोड़कर भाग गए 😬
अब तुमको चमचागिरी करनी है तो रुको 😏 मैं भी चला अपने साथियों के पास, अलविदा।
भाई तुम तो मेरे प्रिय मित्र हो🤗जहाँ तुम वहाँ मैं रुको✋ मैं भी आया।
पतीला भी चल दिया। नहीं-नहीं रुक जाओ✋ सरला जोर से रो पड़ी😭 अभी तो धनतेरस पर इतना मँहगा लेकर आई थी।हाय मेरा हॉकिन्स फ्युचरा, हाय मेरा प्यारा कुकर 😰
सरला जोरों से उठकर भागी। धड़ाम 🥵 पलंग से गिर गई🥴 हे भगवान यह सपना था 🤔मैं नींद में यह सब देख रही थी😴
सरला को यकीन नहीं हुआ 🙄 दौड़कर रसोईघर में जा पहुँची।
सुई गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए। रसोई घर में इतना सन्नाटा पसरा हुआ था😐
सरला ने टी-सेट निकाल कर देखा।🥰 मेरा प्यारा टी-सेट एक तू ही तो है जो दिनभर मायके का एहसास दिलाता है 😘 शुक्र है तुझे कुछ नहीं हुआ😊
सुबह सरला बड़े प्यार से बरतन चमका रही थी। सरला क्या हुआ 🤔आज घंटे भर से बरतन धो रही हो?
कुछ नहीं जी, इन्हें चोट न लगे इसलिए आराम से साफ कर रही हूँ,सरला अभी-भी रात के सपने में खोई थी।क्या🤔प्रकाश कुछ नहीं समझा नहीं ।बस आश्चर्य🤯 से सरला की गतिविधि को देख रहा था।
©®अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️



Sunday, August 23, 2020

अन्नदाता नूरी कंवर

गायत्री आराम कुर्सी पर बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही थी।पास में ही उनका मोबाइल रखा हुआ था।जिसे अभी कुछ महीने पहले ही बहू नेहा ने गिफ्ट किया था।

पुस्तक पढ़ने में मगन गायत्री को बरतन गिरने का स्वर सुनाई दिया। उठकर बाहर आई तो बहू उदास बैठी थी।बच्चों ने खाने की थाली फेंक दी थी।

बहू यह सब??

माँ अब आप ही इन्हें समझाइए।एक तो लॉकडाउन के चलते कोई सामान जल्दी नहीं मिल रहा है। ऊपर से इन दोनों की नई-नई फरमाइशें, यह नहीं खाना वो नहीं खाना। दिनभर ऑफिस और बच्चों की जिद के आगे नेहा रुआँसी हो गई।

अच्छा तुम जाओ मेरे लिए हल्दी वाला दूध ले आओ।इन्हें मैं समझाती हूँ।बड़े समझदार बच्चे हैं,प्यार से समझाओ तो सब समझ जाते हैं।

हर्ष! तुम और रूही चलो मेरे साथ आज मैंने न्यूज पेपर पर बेहद हृदयस्पर्शी खबर पढ़ी है।चलो तुम लोगों को भी सुनाती हूँ।

जी दादी माँ हम अभी चलते हैं।हर्ष रूही को साथ लेकर गायत्री के कमरे में आ गया।

दादी माँ जल्दी सुनाओ ना!आप किस खबर की बात कर रही हो?मचलते हुए हर्ष ने पूछा।

ठहरो तो जरा! मोबाइल उठाते हुए गायत्री बोली।जैसा कि तुम दोनों को पता है कि कोरोनावायरस के कहर से पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है। कोरोनावायरस की चैन को तोड़ने के लिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देश में लॉकडाउन लगा दिया है।

सभी लोगों के काम-काज बंद हो गए हैं।जिस वजह से रोज कमाने खाने वाले गरीब लोगों के जीवन पर रहने और खाने का संकट गहरा गया है।

हम्म वो तो हमें पता है पर आप यह बताइए,आप जिस खबर को बताने जा रही हैं,वो खबर आपको कहाँ से और कैसे पता चली।

मेरे मोबाइल से! मैं मोबाइल में ई न्यूज पेपर पढ़ा करती हूँ,उसी से पता चला।

आज मैं तुम्हें बड़ौदा शहर में रहने वाली किन्नर नूरी कंवर के बारे में बताने जा रही हूँ।आशा है नूरी कंवर के बारे में जानने के बाद तुम दोनों फिर कभी अन्न का अनादर नहीं करोगे!

तो सुनो नूरी कंवर की कहानी जो पूर्णतः सच्ची और सीख लेने लायक है।

गुजरात के बड़ौदा में रहने वाली किन्नर नूरी कंवर को एक दिन किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उन्होंने उस तरफ ध्यान नहीं दिया।

आमतौर पर बच्चे किसी न किसी बात पर जिद करके रोते ही है। लेकिन थोड़ी देर में उसे पीटने की आवाज और उसका करुण क्रंदन नूरी कंवर की आत्मा को भेदने लगा।
नूरी से रहा नहीं गया, उसने उस घर के सामने जाकर उस बच्चे की माँ से कहा।क्यों रुला रही है रे।कब से रोए जा रहा है तेरा बच्चा,चुप क्यों नहीं कराती।

यह सुनते ही बच्चे की माँ रो पड़ी और रोते-रोते उसने नूरी कंवर से कहा। कैसे चुप कराऊँ ? खाना माँग रहा है घर में खाने को कुछ भी नहीं और ना ही पैसा बचा।

कहते हुए वो औरत आँखों में आँसू लिए अपने बच्चे को पीटने लगी ताकि वो कैसे भी चुप हो जाए।

इस घटना ने नूरी कंवर के मन में हलचल मचा दी।उसका भावुक हृदय उस मासूम बालक की पीड़ा से व्यथित हो गया।
रुक जाओ बहन न मारो बच्चे को! जानती हूँ इस महामारी ने सभी लोगों की हालत खराब कर दी!बहन तुम चिंता मत करो यह लो कुछ पैसे! खाने की व्यवस्था करो, मैं जल्दी ही तेरे यहाँ राशन भिजवाती हूँ!

उन्होंने तुरंत उस परिवार की मदद की।घर वापस आकर सोचने लगी ऐसे और भी कई घर होंगे जहाँ बच्चे भूख से बिलख रहे होंगे।

नूरी कंवर सोच-विचार में लगी वो किस प्रकार से इन लोगों की मदद कर सकती है।लॉकडाउन के चलते रोज कमाने खाने वाले मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई थी।

ऐसे में इस घटना से बेचैन नूरी कंवर ने भूखे बेबस गरीबों की मदद करने का निर्णय लिया, और इस कार्य को पूरा करने में जुट गई।नूरी कंवर ने सबसे पहले इस बारे में अपनी बहनों से बात की।

बहनों आज एक मार्मिक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया है। मुझे तुम लोगों का साथ चाहिए! क्या तुम लोग मदद के लिए तैयार हो? नूरी कंवर ने अपनी किन्नर बहनों से पूछा।

ऐसा क्या देख लिया आपने जो आप इतनी व्यथित हो रही हैं दीदी?

मैंने एक घर में बिलखते बच्चे की आवाज सुनी पूछने पर पता चला बच्चे ने दो दिन से कुछ नहीं खाया वो भूख से तड़प कर रो रहा था और उसकी माँ उसे चुप कराने के लिए पीट रही थी।उनके घर में खाने को अन्न का एक दाना भी न था।

यहाँ आस-पास पता नहीं और ऐसे कितने घर हैं, जिनके चूल्हा बुझा पड़ा है! क्या तुम लोग उन लोगों का पता लगा सकते हो? हमें उनके पास खाने की सामग्री पहुँचानी होगी!

ठीक है हम तो तैयार हैं! पर अभी लॉकडाउन में यह सब कैसे संभव होगा दीदी? लॉकडाउन में बाहर कैसे निकला जाए?

हम परमीशन लेकर ही सब काम करेंगे और लॉकडाउन के नियमों का पालन भी करेंगे!नूरी कंवर अपने और अपने साथियों के लिए ई-पास की व्यवस्था और सामान पहुँचाने के लिए रिक्शे की व्यवस्था कर लेती है।

उसके बाद नूरी कंवर ने अपनी किन्नर बहनों के साथ मिलकर घर-घर खाने की सामग्री पहूँचाने का काम शुरू कर दिया।शुरुआत के कुछ दिनों में उन्होंने पका हुआ खाना घर-घर पहुँचाया।पर रोज-रोज इतने लोगों को खाना पकाकर देना आसान नहीं था।

फिर क्या उन्होंने खाना देना बंद कर दिया दादी?हर्ष ने पूछा।

नहीं! ऐसा कुछ नहीं हुआ, आगे की कहानी सुनो! गायत्री ने कहा।

सुनो बहनों!रोज पका हुआ खाना देना संभव नहीं क्योंकि कोई लेता है कोई नहीं ऐसे बर्बादी होती है।!तुम सब एक काम करो एक महीने में एक परिवार को कितना राशन लगेगा,उस हिसाब से पैकेट बना लो!वो लोग अपने हिसाब से बनाएंगे और खाएंगे।

नूरी ने हर हाल में गरीबों की मदद करने का दृढ़ निश्चय कर लिया था।उसने दाल-चावल,आटा,शक्कर तेल मसाले आदि सामान के एक-एक महीने की सामग्री के पैकेट बनाए।

पास और परमिशन लेकर रिक्शे की मदद से किन्नर बहनों के साथ मिलकर जो पहली लिस्ट तैयार की थी। उसके अनुसार घर-घर जाकर जरूरतमंद लोगों को  महीने भर की खाद्य-सामग्री पहुँचाने लगी।

लॉकडाउन के कारण दुकानें बंद थीं। शादी-विवाह,सगाई, जन्मोत्सव, गोदभराई जैसे मांगलिक कार्यक्रमों में गा-बजाकर पैसे कमाने वाले किन्नर समुदाय की कमाई भी पूरी तरह से बंद थी।

हमेशा से हमारे देश में किन्नर समाज को तिरस्कृत नज़रों से देखा जाता रहा।आज वही किन्नर समाज गरीबों का अन्नदाता बनकर सामने आया और लोगों की उनके प्रति  क्या सोच है,इस बात की परवाह किए बिना अपने संकल्प को ईमानदारी से पूरा करने लगे।

बड़ौदा के इस किन्नर समाज के पास पैसों की तंगी होने लगी थी। भूखों का पेट भरने का संकल्प लिए नूरी ने अब अपने गहने को बेचना शुरू कर दिया।

गरीबों की अन्नदाता बनी नूरी कंवर ने जिस काम को करने का बीड़ा उठाया था।वह उस कार्य को किसी भी हालत में पूरा करना चाहती थी और उसके लिए बची हुई धनराशि काफी नहीं थी।

नूरी कंवर को सोने के गहनों का बड़ा शौक था। उन्होंने एक-एक करके अपने गहनों को गिरवी व बेचना शुरू कर दिया।

मदद के पहले चरण में अपने साथियों की मदद से ढूँढ़-ढूँढ़कर गरीब परिवारों की सूची बनाई गई ।उस सूची के अनुसार उन सभी पाँच सौ गरीब परिवारों तक राशन पहुँचाया गया।

धीरे-धीरे उनकी सूची बढ़ती गई और अब उनकी लिस्ट में एक हजार के करीब गरीब परिवार शामिल हो गए थे।नूरी कंवर अपनी बहनों के साथ मिलकर जरूरतमंदो की हरसंभव मदद करने की कोशिश में लगी हुई थी।

एक इंटरव्यू के दौरान नूरी कंवर से पूछा गया कि उन्होंने अपने गहने भी गिरवी रखे हैं? तो वे कहती हैं"हमारे सामने धन की कमी एक जटिल समस्या थी!लोगों की बेबसी,उनके आँसू भी हमसे देखे नहीं जा रहे थे।

क्या बात कर रही हो दादी?उन लोगों ने दूसरों को खाना खिलाने के लिए अपने गहने बेच दिए?रूही और हर्ष दोनों आश्चर्य से पूछने लगे।

हाँ मेरे बच्चों!हम लोग उन्हें पाँच रुपए देने में भी मुँह टेढ़े-मेढ़े करते हैं,उन्हें हिकारत से देखते हैं,इन सब बातों को परे रखकर नूरी कंवर और उनकी बहनें निस्वार्थ भाव से सेवा में लगीं थीं।

हाँ दादी आप सही कह रही हो!

आगे सुनो बच्चों!!

नूरी कंवर ने कहा हमारे पास पैसे जमा करने के लिए कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था।हमें सिर्फ गहने ही दिखाई दे रहे थे। गहनों का क्या है, भगवान ने चाहा तो गहने हम बाद में भी बनवा लेंगे।

गहने हम किन्नर समाज के लिए बहुत मायने रखते हैं।यह गहने हम किन्नरों के बुढ़ापे का सहारा होते हैं। बुढ़ापे में हमको संभालने वाला कोई नहीं होता है,ऐसे में यह गहने ही हमारे काम आते हैं।

इस समय गहनों के प्रति लालच रखती तो अपने गरीब भाई-बहनों की मदद नहीं कर पाती।

कोई हमारे बारे में कुछ भी सोचता हो, हमें परवाह नहीं! हमें गरीब भाई-बहनों की परवाह है और रहेगी! हमारी आँखों के सामने कोई भूख से तड़प कर मर जाए तो हम कैसे भी सहन नहीं कर सकते। भूखें बच्चों का रोना सुनकर हम कैसे सुकून से दो वक़्त की रोटी कैसे खा सकते थे?

लॉकडाउन के कारण हमारी भी कमाई बंद हो गई है और परिस्थितियाँ ऐसी बन गई हैं, जिसे देखते हुए हमारे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूखों का पेट भरना था!

ऐसे समय में गहने बचाने से ज्यादा हमें गरीबों के लिए खाना जुटाने की चिंता थी।हम लोग यही प्रयास कर रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद कर सकें।

हमने उन गरीब परिवारों को अपने फोन नंबर भी दिए हैं। अगर कोई सामान खत्म हो जाए तो हमें पहले ही बता दें तो हम इंतजाम कर देंगे!

नूरी कंवर और उसके साथी उन सभी परिवारों को अपना फोन नंबर भी देते जा रहे थे ताकि जब उनके पास राशन-पानी खत्म होने लगे तो वो लोग फोन करके उन्हें पहले से बता दे।

नूरी कंवर और उसके साथियों ने अपनी इस मुहिम में लॉकडाउन के लिए सरकार द्वारा बनाए सभी नियमों का ईमानदारी से पालन करते हुए सामाजिक दूरी का पूरा ख्याल रख रहे थे।

नूरी कंवर के साथी लोगों को घर के अंदर ही रुकने की आवाज लगाते और राशन के पैकेट उनके दरवाजे पर रख देते थे।जिसे उनके जाने के बाद वो लोग उठा लेते थे।
नूरी कंवर ने बड़े ही चाव से गहने बनवाए थे और उन गहनों को गरीबों का पेट भरने के लिए बेच दिया।वो गहने उन्हें बेहद प्यारे थे।खासकर वो हार जिसे बनवाने के लिए उन्होंने बड़ी मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा था।

नूरी कंवर ने निस्वार्थ भाव से गरीब परिवारों तक भोजन पहुँचाकर समाज में मानवता की अद्भुत मिसाल कायम की,साथ ही साथ समाज को भी यह संदेश भी दिया, कुछ करने के लिए पैसा नहीं दिल बड़ा होना चाहिए।

आज जहाँ एक तरफ लॉकडाउन के चलते गरीब परिवार के लिए जीवनोपयोगी वस्तुएं जुटाना मुश्किल हो रहा था। वहाँ नूरी कंवर जैसे मानवता के फरिश्ते बनकर अपना सब-कुछ बेचकर उन गरीब परिवारों तक अपनी मदद पहुँचाकर उनका पेट भरने का प्रयास कर रहे हैं।

आज कोरोनावायरस के चलते देश में जो हालात बन गए हैं। ऐसे में वह इंसान बहुत भाग्यशाली है, जिसे घर बैठे पेट भर खाना खाने को मिल रहा है।

तुम दोनों को पता नहीं है! हमारे देश में कोरोना के चलते कितने गरीब परिवार दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहे हैं।उनसे उनके काम छिन गए हैं।

कोरोनावायरस एक ऐसी महामारी है जिसका अभी तक कोई तोड़, कोई दवा नहीं मिल रही है।ऐसे में हमें पता नहीं आगे और भी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ जाए?

ऐसे में समझदारी संभल कर चलने में है।जिस खाने को तुम लोग यह कहकर फेंक देते हो,वो तुम्हारी पसंद का नहीं बना है! उस खाने को पाने के लिए आज भी कितने घरों के बच्चे भूख से तड़प रहे हैं।

कुछ लोगों के पास न धन बचा न काम,वो क्या करें?हर किसी के पास तो नूरी कंवर जैसे फरिश्ते मदद के लिए नहीं पहुँच सकते?

इसलिए हम सबका फर्ज बनता है ना हम अन्न बर्बाद करें और ना करने दें! हम सभी को यह भी ध्यान रखना होगा कि हमारे आस-पास भी कोई भूखा न रहे।

दादी माँ हमें माफ़ कर दो।अब हमें खाने की अहमियत समझ आ गई है।हम समझ गए हैं कि अन्न के बिना जीवन संभव नहीं है। हमें आपकी कहानी का अभिप्राय भी समझ आ गया है।

हम लोग आज के बाद कभी भी अन्न का अनादर नहीं करेंगे।जो भी माँ बनाएगी प्यार से खाएंगे। और आज से यह भी कोशिश करेंगे कि हमारी जानकारी में अगर कोई परिवार भूख से बेहाल होगा तो उस तक भोजन पहुँचाएंगे।
***अनुराधा चौहान'सुधी'***

नोट-नूरी कंवर के सराहनीय कार्य के बारे में सभी जानकारी द बेटर इंडिया और दैनिक भास्कर ई न्यूज पेपर से लेकर अपने शब्दों में अलग रूप देकर ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचाने की छोटी-सी कोशिश है।

Sunday, June 28, 2020

नन्ही जन्नत

खूबसूरत वादियों, ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरी कश्मीर को धरती की जन्नत कहा जाता है।और कश्मीर का दिल कही जाने वाली डल झील की खूबसूरती कश्मीर आने वालों को हमेशा ही अपनी ओर आकर्षित करती है।

हर वर्ष लाखों की संख्या में सैलानी यहाँ आकर झील में मौजूद खूबसूरत हाउसबोटों में रहकर झील की खूबसूरती का आनंद उठाते हैं।

पिछले कई कुछ वर्षों से सैलानियों की बढ़ती संख्या, और हाउसबोटों से निकलने वाली गंदगी ने और डल झील पर सब्जियों की खेती करने की वजह से डल झील में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा।

डल झील की बढ़ते प्रदूषण को देख, डल झील की सफाई का जिम्मा उठाया नन्ही-सी बच्ची जन्नत ने।जन्नत अभी सात साल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है।

जन्नत ने जब इस कार्य की शुरूआत की थी।तब वह सिर्फ पाँच वर्ष की थीं और श्रीनगर के राजबाग स्थित लिंटन हॉल स्कूल में अपर केजी में पढ़ती थी।

अपने पापा को यह काम करते देख नन्ही जन्नत ने उनसे इसका कारण पूछा तो पिता ने बताया कि वो डल झील को स्वच्छ रखने के लिए यह कार्य करते है।

पिता की बात से नन्ही जन्नत के दिल पर गहरा प्रभाव पड़ता।बस तभी जन्नत ने कश्मीर की इस खूबसूरत डल झील से कचरा हटाने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
जन्नत अपनी पढ़ाई के साथ इस कार्य को बड़ी मेहनत और लगन से करने लगी।इन दो वर्षों में जन्नत अपने आस-पास के लोगों के साथ-साथ अपने साथियों को भी इस मुहीम का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित करती रहती है।

जन्नत डल झील से सटे गोल्डन डल इलाके में हाउसबोट में रहती है। जन्नत कभी अकेले तो कभी अपने पिता के साथ डल झील की सफाई करने निकल जाती है।जहाँ भी उसे कचरा दिखाई पड़ता है, उसे अपने शिकारे में जमा करती जाती है।

जन्नत डल झील से कचरा उठाकर अपनी किश्ती में जमा करती है उसे उसके पिता नगरनिगम तक पहुँचाने का काम करते हैं।

जन्नत के इस सराहनीय कार्य के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी ट्वीट कर खूब सराहा‌। उन्होंने मन की बात में जन्नत का जिक्र कर कहा कि सभी बच्चों को इस नन्ही बालिका से सीख लेनी चाहिए।

जन्नत एक इंटरव्यू में कहती है कि हर किसी को अपने आस-पास की साफ-सफाई के लिए आगे आना चाहिए। अपने आसपास सफाई रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।


जन्नत अब सात वर्ष की हो चुकी है।पर उसके नियम वही है। वह आज भी स्कूल से आने के बाद अपनी छोटी सी किश्ती लेकर नियम से डल झील की सफाई करने में जुट जाती है।

जन्नत कहती है, मेरे पापा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। और मेरी प्रेरणास्रोत भी। मैं अकसर पापा को झील से कचरा निकालते और फेंकती देखती थी। एक दिन मेरे मन में भी विचार आया कि मुझे भी यह काम करके अपनी इस सुंदर डल झील को साफ करना है।

जन्नत आने-जाने वाले जिस भी सैलानी मिलती है,वो उन्हें भी झील में कचरा न फैंकने की गुजारिश करती है।जन्नत कहती है लोगों को समझना चाहिए। वो लोग यहाँ घूमने आते हैं और गंदगी कर जाते हैं। यह हम सबकी जिम्मेदारी है।हम अपनी खूबसूरत डल झील को गंदा होते नहीं देख सकते हैं।

जन्नत ने अपने पिता के साथ मिलकर "जन्नतस मिशन डल लेक ए न्यू बिगनिंग"यह अभियान शुरू किया है।इस काम के लिए जन्नत के पिता तारिक अहमद पतलू ने डल झील को प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक रोड मैप भी तैयार किया है। तारिक अहमद इस रिपोर्ट को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को सौंपना चाहते हैं।

इंटरव्यू के दौरान जन्नत कहती है मुझे बाबा को यह काम करते देख लगा मुझे भी उनकी मदद करनी चाहिए। अपने पिता से प्रेरित होकर जन्नत दो साल से डल झील को साफ कर रही है।
जन्नत की इस सराहनीय पहल को हैदराबाद स्थित स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल कर लिया गया है।जन्नत के पिता तारिक अहमद को फोन करके इसकी जानकारी मिली तो एक पल के लिए उन्हें विश्वास नहीं हुआ था।बाद में सच्चाई जानकर उनकी आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े।

तारिक अहमद बड़े गर्व से कहते हैं ।उनकी बेटी बहुत ही प्रतिभाशाली और प्रकृति प्रेमी है। उसने केवल उनका ही नहीं, उनके साथ-साथ पूरे कश्मीर का नाम भी रोशन किया है।

खेल-कूद की उम्र में जन्नत डल झील को स्वच्छ बनाने में लगी है।जन्नत कहती है मुझे बहुत खुशी हो रही है कि सब मेरे काम की तारीफ करते हैं।और मेरे इस प्रयास को स्कूल की किताब में भी जगह मिली है।

मैं तो अपने साथियों से भी कहती हूँ,आप सब भी आगे आइए और अपनी डल झील को स्वच्छ बनाइए, और सिर्फ डल झील ही नहीं हमें अपने आस-पास भी साफ-सफाई रखना चाहिए।

नन्ही जन्नत की धरती के जन्नत को स्वच्छ बनाए रखने की यह मुहीम वाकई में काबिले तारीफ है। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते हैं।उस उम्र में जन्नत अपने छोटे से शिकारे को लेकर डल झील को स्वच्छ बनाने में व्यस्त रहती है।

जन्नत के बारे में जब मैंने न्यूज में देखा और कुछ ई न्यूज पेपर में भी पढ़ा। गूगल पर उसके विडियो भी देखे तो मैंने सोचा नन्ही बच्ची के सराहनीय कार्य के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता होना चाहिए।जन्नत के इस कार्य से सभी को सीख लेनी चाहिए।
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार